प्यार जताओ, मगर संभलकर

प्यार जताओ, मगर संभलकर

काव्या की डायरी उठाकर अलमारी में रखते समय अचानक डायरी से एक पर्ची निकलकर नीचे गिरी। काव्या की मम्मी ने उस पर्ची पर लिखा पढ़ना शुरू किया-
“तुम बेहद खूबसूरत हो। तुम्हारी आंखें, तुम्हारे होंठ, सब मुझे तुम्हारी ओर खींचते हैं। जी करता है कि बस तुम्हें देखता रहूं। तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी बातें सुनता रहूँ। तुम्हारी खूबसूरत मुस्कान मुझे बहुत आकर्षित करती है। मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ।”

काव्य की माँ ने जैसे ही यह सब पढ़ा… तो आग बबूला होकर उन्होंने काव्या को फटकार लगाते हुए कहा-

“यह सब क्या है काव्या? तुम कंप्यूटर सेंटर में कंप्यूटर सिखाने जाती हो या फिर नैन मटक्का करने?”

“क्या हुआ मम्मी? आप ऐसे क्यों बोल रही हो? मुझसे क्या गलती हुई है जो आप इस तरह चिल्ला रही हो?”

“इस तरह मासूम बनने की कोशिश मत करो। क्या सच में तुम्हें कुछ नहीं पता कि आखिर मुझे गुस्सा क्यों आया?”

“भगवान की कसम खाकर बोलती हूँ मम्मी। मुझे कुछ नहीं पता। बात बताओ.. बात क्या है?”

“तुम्हारी डायरी से यह पेपर निकला है। तुम्हें तो ये भी पता न होगा कि इसे रखा किसने है? ले पढ़ ले।”

“पेपर?” हैरानी के साथ काव्या ने उस पेपर में लिखा हुआ पढ़ा। पेपर में लिखा पढ़कर काव्या बहुत परेशान हो गई। वह सोच में पड़ गई कि आखिर यह बदतमीज व्यक्ति है कौन?… जिसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वह इस तरह की ओछी हरकत पर उतार आया है। काव्या ने अपनी माँ को पूरी तरह आश्वस्त करते हुए कहा-

“मम्मी जी, इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। जिसने भी मेरे साथ बदतमीजी की है और मेरी डायरी में पेपर रखा है। उसकी खैर नहीं है। आप विश्वास कीजिए मैं ऐसा-वैसा कोई काम नहीं करूंगी, जिससे मेरी और परिवार की इज्जत पर कोई आँच आये।

अगले दिन काव्या ने कम्प्यूटर सेंटर पर आने वाले अपने हमउम्र और अपनी उम्र से बड़े लोगों पर नजर रखनी शुरू कर दी, लेकिन हैरानी की बात यह होती कि जब वह सेंटर से घर के लिए निकलती तो उसकी डायरी में रोज एक पर्ची जरूर निकलती। जिस पर कोई प्यार भरी बात या शेरो शायरी लिखी रहती। काव्या समझ नहीं पा रही थी कि आखिर उसके साथ यह सब क्या हो रहा है और कौन इस तरह की हरकत कर रहा है?

एक दिन कम्प्यूटर सेंटर में कम्प्यूटर सीखने आने वालों की छुट्टी थी लेकिन काव्या पूरे समय कम्प्यूटर सेंटर पर मौजूद रही। कम्प्यूटर सेंटर बंद करके जब वह घर जा रही थी तो अचानक उसने नोटिस किया कि आज भी उसकी डायरी में किसी ने एक पर्ची रख दी है। काव्या सोचने लगी-

“आज तो कंप्यूटर सेंटर पर कोई आया ही नहीं, फिर मेरी डायरी में यह पर्ची किसने रख दी? उसने दिमाग पर काफी जोर लगाया। तब उसे ध्यान आया कि कक्षा 7 में पढ़ने वाला मयंक कुछ देर के लिए अपनी क्लास का कम्प्यूटर विषय का कुछ मालूम करने सेंटर पर आया था। मयंक कंप्यूटर सीखने भी आता था। हो ना हो… यह मयंक ही है जो मेरी डायरी में रोज पर्ची या पेपर पर बकवास बातें लिखकर रखता है।”

काव्या सोचने लगी कि मैंनें इस ओर ध्यान क्यों न दिया? 12 या 13 साल का एक छोटा मासूम बच्चा भी इस तरह की ओछी हरकत कर सकता है। इसकी उसे कतई उम्मीद ना थी।

अगले दिन कम्प्यूटर सेंटर पर मयंक के आने पर, काव्या ने मयंक को आड़े हाथ लिया और उससे कहा-

“मैं जान गई हूँ कि मयंक यह तुम ही हो… जो मेरी डायरी में पेपर पर उल्टी सीधी बातें लिखकर रख देता है।”

मयंक से कोई जवाब ना बना। मयंक खामोश हो गया। आगे काव्या बोली-

“मयंक, इस तरह की गलत हरकत करना बंद करो। आइंदा ऐसा ना हो। इस बात का ध्यान रखना। तुम एक अच्छे लड़के हो। पढ़ने-लिखने की उम्र में इस तरह की बदतमीजी वाली बातें करना तुम्हें शोभा नहीं देता। अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो। आइंदा इस तरह की शिकायत/बदतमीजी मुझे नज़र नहीं आनी चाहिए… नहीं तो, मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”

“मैडम, मैं आपसे प्यार करता हूँ। आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो। जब जब आप प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरती हो.. मेरे गालों को प्यार से खींचती हो तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। तुम्हारे स्पर्श से मैं किसी और दुनिया में ही पहुंच जाता हूँ। मैं दिन रात अब बस आपके बारे में ही सोचता रहता हूँ। मैं आपके बिना नहीं रह सकता। आई लव यू।” बेशर्मी के साथ मयंक बोला।

“क्या बक रहे हो? तुम होश में भी हो? तुम अभी 13 साल के बालक हो और मैं तुम्हारी टीचर। अपनी टीचर से इस तरह की बातें करते तुम्हें शर्म नहीं आ रही? तुम्हें बच्चा समझकर प्यार से एक दो बार तुम्हारे गाल क्या खींच दिए, सिर पर हाथ क्या फेर दिया? तुम इसे प्यार समझ बैठे।”

“इसमें शर्म की क्या बात है मैडम जी? आप भी तो मुझसे प्यार करती हो।”

“मेरे भाई, जो प्यार मैं करती हूँ उस प्यार में और जो तुम करते हो या करना चाहते हो… उस प्यार में जमीन-आसमान का अंतर है। मैंने तुम्हें अपना छोटा भाई समझकर, एक छोटा सा क्यूट बच्चा समझकर, थोड़ा सा लाड-प्यार क्या जता दिया.. तुम तो हद से बहुत ज्यादा आगे बढ़ गए। तुम कहाँ और मैं कहाँ? कभी सोचा है। मैं उम्र में तुमसे लगभग 8 साल बड़ी हूँ।” समझाते हुए काव्या बोली।

“मैडम, शायद आपको पता नहीं। आजकल प्यार में/शादी में उम्र मायने नहीं रखती। बहुत सारी सेलिब्रिटीज जैसे सचिन तेंदुलकर, शिखर धवन जैसों ने अपने से बड़ी लड़की को जीवनसाथी(पत्नी) के रूप में चुना। आज वे एक सफल, सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। मैं आपसे प्रेम करता हूँ। एक दिन मैं आपसे शादी भी करूँगा। आप निश्चिंत रहो।”

इतने छोटे बच्चों के मुंह से वयस्कों वाली बातें सुनकर काव्या सकपका गई। काव्या बहुत तेज मयंक पर चीख पड़ी। काव्या का गुस्सा देखकर मयंक साइड से निकल लिया। काव्या जिस मयंक को बच्चा समझकर व्यवहार कर रही थी, वह तो परिपक्व व्यक्तियों जैसी सोच/नज़रिया रखने वाला निकला। इस घटना ने/मयंक के बर्ताव ने काव्या को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया।

उसे समझ मे आ गया था कि आखिर उससे चूक कहाँ हुई जो ऐसी स्थिति पैदा हुई कि एक 13 साल के छोटे बच्चे ने उससे प्यार करना… और यहाँ तक कि उससे शादी करने के बारे में सोच लिया। काव्या के इस निश्छल प्यार को मयंक गलत समझेगा। इसकी उसे कतई उम्मीद ना थी। वह समझ गई कि सच में जमाना बहुत तेजी से बदल रहा है। बच्चे समय से पहले जवान हो रहे हैं। उनमें कम उम्र में ही बड़े-बड़े जैसे हार्मोन्स विकसित हो रहे हैं। इंटरनेट, यूट्यूब पर विभिन्न वीडिओज़ देखकर उनकी सोच बड़ों जैसी होने लगी है।

काव्या के समझाने/फटकार लगाने के बावजूद, अगले दिन मयंक अपनी बदतमीजी से बाज नहीं आया। अब भी काव्या के समझाने के बावजूद, मयंक कुछ भी सुनने/समझने को तैयार नहीं था। अब काव्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि इस मयंक के दिलों-दिमाग से प्यार का भूत कैसे उतारा जाए? मयंक काव्या को पाना चाहता था, शादी करना चाहता था। उसने काव्या के सामने विभिन्न उदाहरण देकर उसको कन्वेंस करने की भरकस कोशिश की। इससे काव्या बहुत परेशान हो गई।

काव्या मयंक को अब समझाना भी नहीं चाहती थी। उसके मन में भी आया कि मयंक के माँ बाप से बात करे लेकिन फिर काफी सोच समझ कर काव्या ने.. भविष्य में होने वाले इसके दुष्प्रभावों को सोचकर, नासमझ टीनएज मयंक से दूरी बनाना ही उचित समझा। अगले 7 दिनों के अंदर, काव्या ने हमेशा हमेशा के लिए कंप्यूटर सेंटर छोड़ दिया।

लोग सच कहते हैं कि किसी के चेहरे-मोहरे से हम, किसी को जज नहीं कर सकते कि उसके अंदर क्या चल रहा है या उसकी सोच कैसी है? उसकी सोच बच्चों वाली है या वयस्कों वाली? वह हमारा अच्छा सोच रहा है या बुरा? कौन हमारा अपना है या कौन अपना बनने/शुभचिंतक बनने का ढोंग कर रहा है? ऐसे कपटी लोगों से जितना सम्भव हो, दूरी बना लेना ज्यादा जरूरी है।

इनसे उलझना बेकार है। हर व्यक्ति हमें ही कहेगा कि तुम तो समझदार थे? सब जानते हुए भी तुमने दूरी क्यों न बनाई? समय के साथ बदलते मूल्यों और व्यवहारों को समझना और उनसे निपटना बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ स्थितियों में दूरी बनाना और खुद की सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक हो जाता है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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