सासू मां का बहु के लिए अनमोल तोहफा

राधा की शादी एक अच्छे परिवार में हुई थी वह अपनी ससुराल में इकलौती बहू थी। बस एक छोटी नंद थी और सास ससुर। ससुराल में सभी बहुत अच्छे थे। राधा को अपनी बेटी की तरह ही मानते थे।

पति भी उसको बहुत प्यार करता था उसकी सभी जरूरतों का ध्यान रखता था। नंद तो बहुत छोटी थी राधा को अपनी मां का दर्जा देती थी। राधा का व्यवहार भी सबके साथ बहुत अच्छा था। सास – ससुर की बहुत सेवा करती थी।अपने पति का भी बहुत ध्यान रखती थी। नंद को तो वो लाड लगाती थी। राधा ने अपने घर को अच्छे संभाल रखा था।

एक बार की बात है,राधा का पति अपने दोस्तों के साथ  केदारनाथ घूमने गए थे। ये तब की बात है जब केदारनाथ में तबाही आई थी सब कुछ बर्बाद हो गया था उस वक्त राधा के पति और उनके दोस्त भी वही थे उस तबाई में वे भी नहीं बच पाए थे।कितने ही परिवार खत्म हो गए थे।इस तबाही ने राधा का हस्ता- खेलता परिवार खत्म कर दिया था।

राधा की तो मानो जिंदगी ही खत्म हो गई थी।किसी बात का उसको होश न था , सास ससुर भी बेचारे लाचारी महसूस कर रहे थे आखिर उनका इकलौता बेटा जो उन्हें छोड़ कर चला गया था।

फिर भी उन्होंने अपनी बहू को संभाला। राधा ने भी अपने पति के चले जाने के बाद अपने घर को संभाला अपने सास ससुर को भी अपने बेटे की कमी महसूस न होने दी। लेकिन राधा ने अपने परिवार को संभाला जरूर था लेकिन उसने अपनी जिन्दगी से सभी रंगों को हटा दिया था बस एक ही रंग बचा था सफेद रंग।

राधा के ससुर की फैक्ट्री थी उसी फैक्ट्री को उनका बेटा भी देखता था, लेकिन बेटे के जाने से फैक्ट्री की देखरेख कौन करता यह सोचकर राधा के ससुर ने फैक्ट्री बेचने का फैसला किया। राधा ने उनको ऐसा करने से मना किया क्योंकि फैक्ट्री में उसके ससुर की जान बसती थी।

उसके ससुर ने कहा … “बेटा इस फैक्ट्री को चलाना मेरे बस में नहीं है अब इसको संभालेगा कौन “।

राधा बोली …”पापा जी जब से शादी होकर इस घर में आई हूं तब से आपने मुझे एक बेटी की तरह रखा है और मैं इस काबिल तो हूं कि घर के साथ बाहर के काम देख सकू।

अगर आपको ठीक लगे तो मैं इस फैक्ट्री को संभालने की जिम्मेदारी लेती हूं “।

उसके ससुर बहुत खुश हुए और फैक्ट्री की चाबी राधा के हाथों में सौंप दी। राधा ने दोनों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और तब से घर की बाहर की जिम्मेदारी खुद संभालने लगी। अब उसके पास खुद के लिए समय बचा ही नहीं था।

एक दिन  राधा के सास ससुर आपस में बात करने लगे ….. कितने साल हो गए हमारे बेटे को गए लेकिन राधा ने हमें उसकी कमी महसूस न होने दी। उसने अपने सारे दुख दर्द भुलाकर वो हमे देखती है अपनी तो चिंता करती नहीं।

सास बोली …… हां जी आप बिल्कुल सही कह रहे हो। अभी तो इसकी उम्र भी नहीं है। इसने तो मानों अपने लिए जीना छोड़ ही दिया।

हमारी उम्र भी हो गई है कब भगवान के पास से बुलावा आ जाए कुछ नहीं पता ।

दोनों सोच में पड़ गए। फिर कुछ देर बाद दोनों के मुंह से एक ही बात निकली …..क्यों न हम राधा की जिंदगी से सफेद रंग मिटा दें और दोनों एक दूसरे के मुंह को देखने लगे ।

हमारी बेटी की तो शादी हो गई है अब हमें अपनी दूसरी बेटी की भी शादी की सोचनी चाहिए। कम से कम उसका ध्यान रखने वाला तो कोई होगा।

दोनों ने अपना मन बना लिया था और उन्होंने राधा के लिए एक अच्छा लड़का भी ढूंढ लिया था लेकिन अब एक बात की पेरशानी थी कि राधा को कौन तैयार करेगा इस बात के लिए।

फिर एक दिन दोनों ने हिम्मत जुटा कर राधा को बुलाकर कहा ……”बेटा तुने हमें अब तक बहुत कुछ दिया है मानों अपनी जिंदगी हमारे नाम कर दी ”

“अब हम भी कुछ देना चाहते हैं तुझे, लेकिन एक वादा करो मना नहीं करोगी “।

राधा बोली…  मम्मी पापा मैने कभी किसी बात को मना किया है???

राधा की सास उठकर अपने कमरे की ओर जाती है और अपनी अलमारी में रखा एक बॉक्स लाती है।

राधा से कहती है.…… “राधा बेटा मैं तुम्हारे लिए ये तोहफा लाई हूं ” और वो बॉक्स उसके हाथों में थमा दिया।

राधा ने वो बॉक्स खोलकर देखा तो वो देखती रह गई…. उस बॉक्स में लाल रंग की साड़ी थी।

राधा ने कहा.….”मम्मी ये क्या तोहफा लाई हो ? मैने इस रंग को अपनी जिंदगी से कब का मिटा दिया है अब इसकी कोई जगह नहीं है।” और रोने लगी।

सास बोली…. “तूने हमारे लिए बहुत कुछ किया है अब मैं तुझे ये लाल रंग की साड़ी तोहफे में देना  चाहती हूं । ये इच्छा हम दोनों की है “।

ससुर भी बोले…..” हां बेटा हम चाहते हैं कि हम तुझे इस घर से बेटी की तरह विदा करें ”

दोनों ने कहा.….. बेटा तूने हमसे वादा भी किया है अब तू मना नहीं कर सकती।

राधा अपने सास ससुर के गले लगकर रोने लगी। फिर उसकी शादी करके उसे विदा कर दिया।

हर ससुराल बुरी नहीं होती और न ही सभी सास ससुर बुरे होते। काश सभी लड़कियों को ऐसी ससुराल मिले। सभी सास ससुर को ऐसी बहू मिले जो एक बहू बनके नहीं बल्कि एक बेटी की तरह रहे। सास ससुर को अपने मां बाप की तरह समझे  ।

पूजा विशनोई

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