राह तेरी ओर

राह तेरी ओर

राह तेरी ओर

ढूंढ रहा हूँ अब भी वो रास्ता,
जिससे तुम तक अपने शब्द पहुँचा सकूं।
दिल में जो दर्द दबा रखा है,
वो तुम्हारे सामने बता सकूं।

कोई एक आशा की किरण मिल जाए,
जिससे अपनी मोहब्बत तुम्हें जता सकूं।
तेरी यादों के अंधेरे में जो खो गया हूँ,
वहां से उजाले में फिर लौट आ सकूं।

लौट आओ दिकु, उसी प्यार के साथ,
कि बची हुई हर सांस तुम संग बिता सकूं।
तेरी बाहों में सुकून मिले ऐसा,
कि हर अधूरा ख्वाब पूरा कर तुम संग निभा सकूं।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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