तू मेरा आसमान

तू मेरा आसमान

तू मेरा आसमान

मैं वो चाँद, जिसका तेरे बिन ना कोई आसमां,
तेरी बाहों के बिना हर रात लगे बेजुबां।
सितारे भी बुझने लगे मेरी तन्हाइयों से,
तेरी हँसी के बिना अधूरी है ये दास्तां।

बादल भी अब मुझसे सवाल करते हैं,
क्यों गुमसुम से रहते है, किसे याद करते हैं?
मैं कहूँ क्या उनसे, कौन समझेगा दर्द मेरा,
तेरी बिना अधूरा हूँ, ये सितारे भी अब सिसकते हैं।

हवा जब तेरी ख़ुशबू लेके गुज़रती है,
दिल में एक नई तड़प सी उतरती है।
तू जहाँ भी हो, लौट आ, ए मेरी दिकु,
बिन तेरे ये दुनिया भी बेरंग लगती है।

चमक मेरी तेरी आँखों से थी, वो अब बुझ रही,
तेरी छुअन के बिना ये रूह भी अब सिमट रही।
सजदे में हूँ, बस इक दुआ माँग रहा,
आ लौट आ, मेरी साँसें भी तुझ बिन बिखर रही।

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तेरी यादों की तपिश

तेरी यादों की तपिश में जल रहे हैं,
ख़्वाब मेरे सारे चुपके से पिघल रहे हैं।

सवालों का जवाब किससे माँगें हम,
ख़ामोशी के साए ही अब मन में जल रहे हैं।

मिलन की आस में ये दिल बेचैन है,
धड़कनों में तेरा ही नाम पल रहे हैं।

खुद को संभालना अब मुमकिन नहीं,
तेरी चाहत में मेरे अरमान मचल रहे हैं।

जो बीज बोया था प्रेम के बाग़ में,
फिर वही रंग बनकर निकल रहे हैं।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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