रिद्धि-सिद्धि के दातार | Riddhi-Siddhi ke Datar

रिद्धि-सिद्धि के दातार

( Riddhi-Siddhi ke datar ) 

 

हर कार्य प्रारम्भ करतें बाबा हम लेकर आपका नाम,
दीप जलाकर पुष्प चढ़ाकर शुरु करतें अपना काम।
भोग लड़वन का लगातें आपके गजानंद सवेरे शाम,
बुद्धि कौशल के देवता आपकों कोटि-कोटि प्रणाम।।

शादी हो या कोई उद्धघाटन मुंडन अथवा गृह प्रवेश,
सिद्धविनायक मंगलमूर्ति शुभम हर-लेते हो कलेश।
लंबोदर गणपत गजानंद कोई कहते आपको गणेश,
माॅं गौरी के पुत्र हो लाड़ले और पिता आपके महेश।।

रिद्धि-सिद्धि के दातार बरसाते रहना सभी पर प्यार,
आपकी माया अपरम्पार जिसका पाया न यह पार।
लम्बकर्ण गजवक्र विघ्न-विनाशक भूपति हो संसार,
सब-पर दया करतें है आप नहीं आपमें ये अंहकार।।

मात-पिता से बड़ा न कोई यें बात जगत को बताया,
श्रेष्ठ वही है जिसने अपना दृढ़ पूर्वक कार्य निभाया।
मेहनत का फल और समस्या हल स्वयं ही निकाला,
कर परिक्रमा माता पिता की चारधाम तीर्थ बताया।।

आओ करें वन्दना हम मिलकर विघ्नहर्ता की आज,
मोदक का हम भोग लगाऍं गणपत बप्पा के आज।
हम दीन-दुःखी निर्धन दुर्बल की देते वो सर्वदा साथ,
खुशियों का अमूल्य खज़ाना लुटायेगें हम पे आज।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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