सड़क
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पहुंच सुदूर क्षितिज धरा तक
सुंदर रेखा मात्र दिखती हूं,
श्याम वर्णी स्वस्थ सलोने गात
दिन रात अटखेलियां खेलती हूं,
पकड़ पगडंडी की राह पाया चतुर्भुज रूप
चंचला आगे बढ़ती,संवरती हूं
अनुपम अवतरित छटा, अव्यवस्थित पर
अति आर्द्र शीत की उष्णता में तपती हूं।।

अवस्थापन से हर्षातिरोक्ति हुयी कब
जब मेरे कतरों की कुचलायी बढ़ती रही
मैं चुपचाप कुढ़ती हुयी,
उज्ज्वल भविष्य के लिए कराहती रही
स्वरूपवती सुंदर काया हुयी
स्वधन्य मान मन में मचलती रही
गगन गम्भीरता मन माया हुयी
अस्फुटित निनाद में खिलखिलाती रही।।

कलुषित कुसंग,कुरुप करते रहे,
एक दो नहीं सहस्रों पार उतरते रहे,
घाव थे बदन को,रूह तार तार करते रहे,
अबला सी बिलखती,सपने यूं ही बिखरते रहे,
बेरहम बहुबोझिल भार पार उतरते रहे,
कीचड़ और गरल, गर्त में भरते रहे।।

मुझे गंदगी कचरा वाहन पशु स्थल बना दिया,
मेरे दोनों बाजुओं को बंदी बना लिया,
मेरी नाली को गाली दे देकर जाली हटा दिया,
प्रवाहित बदबूदार लहू,मेरे ऊपर डाल नहला दिया
स्वविस्तारण से मेरा संकीर्णन करवा दिया,
श्रापित रहेगा हे मानव तुम,पराया भी अपना लिया।।

मैं अवतरित हुयी तेरे विकास के लिए
ऐ नासमझ पछतायेगा अपनों के लिए,
औ मर्माहत मन उद्वेलित वतन के लिये,
खण्ड का अखण्ड योग बने,बजट पुनरोद्धार के लिए,
जनता समझे, विवस करे अधिकारिक आबंटन के लिए
सजग रहना आर0बी0अपनी कमाऊ सड़क के लिए।।

 

🐾

लेखक: राम बरन सिंह ‘रवि’ (प्रधानाचार्य)

राजकीय इंटर कालेज सुरवां माण्डा

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश )

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