संभालते क्यों हो | Ghazal Sambhalte Kyon Ho

संभालते क्यों हो

( Sambhalte Kyon Ho )

हजारों ऐब वो मुझ में निकालते क्यों हैं
मैं गिर रहा हूँ तो मुझको संभालते क्यों हैं

दिखा है जब भी अंधेरा उन्हें मेरे घर में
चिराग़ आके हमेशा वो बालते क्यों हैं

किसी की बात चले या किसी से हो शिकवा
हरेक तंज़ वो मुझ पर ही ढालते क्यों हैं

जवाब आप ने अब तक नहीं दिया मुझको
मेरे सवाल को हर बार टालते क्यों हैं

ज़माने वालों की फ़ितरत समझ नहीं आती
ज़रा सी बात को इतना उछालते क्यों हैं

वो जब भी लड़ते हैं हमने ये उनसे पूछा है
हमारे ख़्वाब निगाहों में पालते क्यों हैं

वो जब भी मिलते हैं मुझ से कहीं तो ऐ सागर
मेरी निग़ाहों को पहले खंगालते क्यों हैं

Vinay

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003

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