चाय
जब मैं छोटा था, 12 वर्ष का रहा होऊंगा। मैंने तब चाय बनाना सीखा ही था। तब घर में कोई भी मेहमान आता, चाय मैं ही बनाता था। मुझे चाय बनाने में खुशी मिलती थी, बड़ा मजा आता था। इसी बहाने मुझे भी चाय पीने को मिल जाती थी।
एक दिन घर पर सीताराम अंकल जी अपनी पत्नी के साथ आए। मम्मी ने मुझे दो कप चाय बनाने के लिए कहा। मैं खुशी-खुशी चाय बनाने रसोई में चला गया। चीनी, चाय की पत्ती, अदरक को पानी में अच्छे से खौलाकर… जब मैंने चाय में दूध डालने के लिए, दूध का भगोना प्लेट हटा कर देखा… तो पाया कि उसमें ढेर सारी मलाई की परत जमी हुई है।
दूध पर मलाई की मोटी परत देखकर मेरे मुंह में पानी आ गया। मैंने चाय में दूध डालने से पहले एक चम्मच ली और उस चम्मच से दूध को ऊपर की सारी मलाई मजे लेकर खाने लगा। उधर चाय खौलती रही। इत्तेफाक से जब मैं दूध के ऊपर की मलाई खा रहा था, तभी सीताराम जी रसोई में हाथ धोने आए। उन्होंने मुझे चम्मच से दूध के ऊपर की मलाई खाते देख लिया। उन्हीं के सामने मैंनें उस दूध को चाय बनाने में इस्तेमाल किया। सीताराम जी ने उस समय मुझे कुछ नहीं कहा। जब मम्मी चाय नाश्ता लेकर उनके सामने पहुंची, तो उन्होंने चाय पीने से साफ इनकार कर दिया और बोले-
“आज हमारा सोमवार का व्रत है।”
मां ने कहा- “व्रत में तो चाय पी लेते हैं। आप नाश्ता मत कीजिए लेकिन चाय तो पी लीजिए।”
“हम चाय भी नहीं पियेंगे।” सीताराम जी बोले।
“क्यों? चाय से भी व्रत में परहेज है क्या?”
“नहीं ऐसा नहीं है। हम चाय पी लेते लेकिन आपके बेटे ने झूठे दूध का प्रयोग चाय बनाने में किया है। मैंने इसे अपनी आंखों से दूध के ऊपर की मलाई चम्मच से खाकर, उसी दूध को चाय में डालते देखा है। हम व्रत में झूठे दूध से बनी चाय का सेवन नहीं करेंगे। हमें माफ कीजिए।” सीताराम जी ने पूरी बात बताई।
मम्मी ने उनके सामने ही मेरी खूब खबर ली। खूब डाँट लगाई। कुछ देर रुककर बेचारे सीताराम जी और उनकी पत्नी बिना चाय पिए ही चले गए क्योंकि सारे दूध को मैंने झूठा कर दिया था तो दूसरी चाय कहाँ से बनती? उनके जाने के बाद मम्मी ने मुझे समझाया-
“अगर तुझे मलाई खानी थी तो मलाई को किसी बर्तन में कर लेता, लेकिन उसी दूध के बर्तन में चम्मच डालकर मलाई खाने की क्या जरूरत पड़ी थी? सारा दूध तो झूठा हो ही गया था। आज तेरी इस गन्दी हरकत से मुझे उनके सामने कितना शर्मिंदा होना पड़ा। बेचारे बिना चाय के ही चले गए। अब तेरी इस हरकत को वो किसी से कहेंगे तो कितना गलत होगा। समाज में तेरी इमेज भी खराब होगी और हमारी भी। सब यही कहेंगे कि हमने ही तुझे कुछ न सिखाया और न ही अच्छे संस्कार दिये। इतना बड़ा हो गया है लेकिन हरकतें बिल्कुल बच्चों वाली हैं। सुधर जाओ। आइंदा इस तरह की गन्दी हरकत की पुनरावृत्ति न हो। ध्यान रखना।”
मैंनें भी माँ को आश्वासन दिया कि आइंदा ऐसा नहीं होगा। लेकिन उस दिन के बाद से मुझे चाय बनाने के काम से हटा दिया गया और मुझे सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहा गया। माताजी खुद ही मेहमान आने पर चाय बनाती। वो अब बिल्कुल भी मेरे द्वारा मलाई खाने का रिस्क नहीं ले सकती थी। जैसे ही दूध पर मलाई आती, मुझे बिन मांगे मिल जाती।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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