Shramik
Shramik

श्रमिक

( Shramik ) 

 

सारा दिन उहापोह मेंं गुजर गया

मजदूर कौन है कौन नहीं

इसी में मन उलझ गया

श्रम तो रिक्शा चलाने में भी  है

मजदूरी करता दिहाड़ीदार भी  है

मगर अब तो सफेद कॉलर वाले भी

देखा जाए तो इनको पढ़ाने वाले भी

हर जन हर गण खुद को श्रमिक कहता है

और 1मई  की छुट्टी मनाने

आराम से घर बैठता है

शारीरिक हो ,या  मानसिक, कहता

श्रम तो श्रम है, दिवस मनाने का पूरा हक़ है

सारा दिन तो सोच सोच कर

सोचा, मैंने भी तो है काम किया

दिखता नहीं मगर बैठे बैठे सांस भी लिया

दिल धड़कता रहा तमाम उम्र

कभी मोहब्बत में, कभी रकाबत से

इस रंग बिरंगी दुनिया में ,खुद  को पन्नों सा

कभी सफेद किया ,कभी स्याह किया

दिन के उजालों में ‘गर कई महल उबारे

रात के अंधेरों में उन्हीं ख़्वाबों को फना भी किया

मुझसे बड़ा कोई नहीं  हो सकता श्रमिक,

मज़दूर, जो बिना वेतन, बिना पगार

जिंदगी , तुझे ढोने का यह काम सुबह किया

हर शाम किया…

 

लेखिका :- Suneet Sood Grover

अमृतसर ( पंजाब )

यह भी पढ़ें :-

उफ़ | Uff

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here