Shri Krishna Prem 

श्री कृष्ण प्रेम | Shri Krishna Prem 

श्री कृष्ण प्रेम

( Shri Krishna Prem )

 

श्री कृष्ण प्रेम सुगंधि,श्री मद्भागवत में
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तीन सौ पैंतीस दिव्य अध्याय,
बारह प्रेरणा पुंज स्कंध ।
अठारह हजार श्लोक अनुपमा,
शब्द आभा आनंद बंध ।
कथा श्रवण परम सुअवसर ,
सुषुप्त सौभाग्य जगावत में ।
श्री कृष्ण प्रेम सुगंधि,श्री मद्भागवत में ।।

हिंद वांग्मय मुकुटमणि प्रभा,
संपूर्ण वेदांत सार सरिता ।
पटाक्षेप उग्र आवेश मूल
मनुज चरित्र उन्मुख नमिता ।
प्रसंग दैनिकचर्या समावेशी,
परिवेश स्पंदन शोभा शाश्वत में ।
श्री कृष्ण प्रेम सुगंधि, श्री मद्भागवत में ।।

परित्राण बिंदु सहज सरस,
सुख समृद्धि वैभव वृष्टि ।
सद्गुण सदाचार श्री वंदन,
स्नेह वत्सल आगार दृष्टि ।
कल्प वृक्ष सम ओज उपमा,
भक्ति शक्ति कान्हा रिझावत में ।
श्री कृष्ण प्रेम सुगंधि, श्री मद्भागवत में ।।

पारिवारिक सुख शांति सागर,
सनातन धर्म संस्कृति विश्वकोश ।
अमिय धार मानवता उत्संग ,
अंतःकरण महा शुद्धि परितोष ।
विमल मन स्थिर चितवन संज्ञा,
साध्य असीम खुशियां बिछावत में ।
श्री कृष्ण प्रेम सुगंधि, श्री मद्भागवत में ।।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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