सोच की संकीर्णता
( Soch ki sankirnata )
पानी है अगर मंजिल तुम्हे,
तो कुछ फैसले
कठोर भी लेने होंगे
जिंदगी की हर ऊंचाई का
पैमाना निश्चित नही होता..
कभी कभी
सोच की संकीर्णता
स्वयं की प्रतिभा को ही
निखरने नही देता….
बढ़ाएं तो आएंगी ही
कभी अपने से
कभी अपनों से
और कभी खुद से भी
इन्हे अनुकूलता मे ढालकर ही
मुकाम तक पहुंचाना होता है….
सुविधाएं तैयार नहीं मिलती
रास्ते तो निकलते हैं घर से ही
पर, उनपर चलना तो खुद को ही पड़ता है….
फैसले आपको लेने होते हैं
की सब चाहिए या
जीवन की मंजिल
बिना संघर्ष कुछ नही मिलता
जिंदगी तो सभी जी लेते हैं…

( मुंबई )
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