सूखी दरख्तो के साये
सूखी दरख्तो के साये

सूखी दरख्तो के साये

( Sookhi Darakhton Ke Saaye )

 

 

ये जो हम में तुम में कुछ प्यार बाकी है कहीं

 दो दिलो  को बहलाने का बहाना तो नहीं

फांसलो की अपनी भी जुबानें हुआ करती हैं

तेरे मेरे करीब आने का इशारा तो नहीं

 

दिल जब भी धड़के, अफसाने बने ,सुना था बहुत

पुराने खण्डहरो में दबे खजाने तो नहीं

तकलीफ में आराम मिला ना मिला सूक

आँसूओ में डूब जाने के ठिकाने  तो नही

 

फलक, ये जमीं ,चाँद और तारे बैचेन हैं सभी

थकी साँसो के धड़क जाने का सबब तो नहीं

कहीं शोर ,कहीं अलम ,हकीकत कहीं है ,कही भरम

दम ,राहे वफा में ,तोड जाने का खतरा तो नहीं

 

ये पर्दा,ये हुस्न,ये नादानियाँ, सब धोखे की कहानी है

तेरी गलियों में भटक जाने का मतला तो नहीं

हवाऐं उडाती रही, चिलमन ,रुख से बारबार

  मेरी वफाओ को आजमाने की साजिश तो नहीं

 

हम लुटे ,लुटना ही था ,ये तय था

ऐ सितमगर कहीं ,तूने भी, गहरे जख्म खाये तो नहीं

हमे बरबाद करने की साजिश बेकार जायेगी

तूने वो नुस्खा हमपर अभी आजमाया ही नही

 

हम तो मर जाते यूँ ही ,क्यू कत्ल की साजिश की

तुने नजरो से तीर वो चलाया ही नही

तू चाहे जिसे अपना, चाहे तो पराया करदे

तेरी पनाह में बेगुनाह कोई आया ही नही

 

तुने डाली ना वो निगाह जिसकी चाहत थी हमें

शरीफों के मकाँ मे तेरा ठिकाना ही नहीं

मैं हंसी ,तू भी हँसा,  ये दिल्लगी हुई

फंसे मैना कि शिकारी ने जाल एसा कभी बिछाया ही नही

 

आहत हूँ ,तेरे आंसूओ से ही नहीं,तेरी मुस्कुराहट से भी

बात समझू ,कभी इतने नजदीक पाया ही नहीं

टूटी मुडेरों पे धूल उडती रही अब भी कहीं

बीता वक्त लोट फकत आया ही नहीं

 

आसमाँ की बुलन्दियाँ जमीं के होसलो पे भारी हुई

बेजान आईनो को तुने कभी चमकाया  ही नही

तुम्हारे हर हुनर की दाद कैसे दे ये जँमाना

भरी आँख से आँसू तूने चुराया ही नहीं

 

मोती ,नहीं बेशकीमती पत्थर की तरह

हाथ दर हाथ ,शीशे सा दिल उछाला ही नहीं

हम तो मर जाएगे ,मिट जायेंगे होंगे फनाँ हर घडी तुझपर

जाँ निसार का वो वादा सनम हमने अभी निभाया ही नहीं

 

 चली आंधियों से ,टकराने मैं ,तूफाँ से कभी

ढलती जीवन साँझ को गले लगाया ही नही

खनकी कभी चुडी कभी झनकी पायल यूं भी

सूनी राहों पे हमने ये साज बजाया ही नहीं

 

 बेजार हुई मजारे यूँ गिरती दीवार सी

हाथ दुआ में तूने कभी उठाऐ ही नही

कहीं किसी फकीर का दामन सिला होता

 सजदे में सर  तुने कभी झुकाए ही नहीं

 

हमें इन राहो से आवाजे अब भली नहीं लगती

चमन कभी फुलो के यहाँ महकाए ही नही

हवाऐं जब भी चली बेमौसमों की यहाँ

सूखी दरख्तो के सायो में गुल हमने कभी खिलाये ही नहीं

 

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डॉ. अलका अरोड़ा
“लेखिका एवं थिएटर आर्टिस्ट”
प्रोफेसर – बी एफ आई टी देहरादून

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