सुमित मानधना ‘गौरव’ की कविताएं | Sumit Mandhana Poetry
आज के हालात
देखकर आज कल के हालात।
कहनी पड़ रही है यह बात।
भारी और पीड़ित मन से कि,
दफन कर दिये अपने जज़्बात!
कहीं लड़कियाँ कट रही है।
कहीं लड़के मारे जा रहे हैं।
बेरहमी से कितने हिस्सों में,
देखो मासूम काटे जा रहे हैं।
कोई अंधा हो गया वासना में,
किसी को लालच है पैसे का।
घृणा भर चुकी उनके मन में,
ज़मीर भी मर चुका ऐसों का।
कोई विकृत मानसिकता का है,
किसी की मनोदशा खराब है।
कोई रख रहा संबंध बहुतों से,
किसी की नीयत ही खराब है।
ना किसी के बेटे सुरक्षित है,
न ही कहीं बेटियाँ महफूज है।
इन अधर्मी दुष्ट पापियों का,
सच में कैरेक्टर ही लूज है।
सीख कर सेल्फ डिफेंस टेक्निक,
बच भी सकते हैं बाहर वालों से।
घर में ही दुश्मन भरे पड़े अब तो,
भगवान बचाए ऐसे घरवालों से।
“पुलवामा अटैक-ब्लैक डे ऑफ इंडिया”
जाया नहीं जाएगी कुर्बानी
देश के जवानों की,
दुश्मनों तैयारी कर लो
अपने जनाजे उठाने की।
जवानों की शहादत पर
न खौले वो खून नहीं पानी है,
जो देश के काम ना आए
बेकार वह जवानी है।
कभी पाकिस्तान कभी आतंकियों ने कि मनमानी है,
इन्हे सबक सिखाने की
भारतीय जवानों ने ठानी है।
जाया नहीं जाएगी कुर्बानी,
मेरे देश के जवानों की।
दुश्मनों तैयारी कर लो,
अपने जनाजे उठाने की।
कभी पठानकोट उरी अब पुलवामा को निशाना बनाया है,
भरत माँ के सपूतों ने हर बार ही मज़ा चखाया है।
जवानो की शहादत पर हमने अश्रु बहाया है
मेरे वीर जवानों ने दुश्मन को मार गिराया है।
फिर होनी चाहिए सर्जिकल स्ट्राइक हर भारतवासी चिल्लाया है,
नहीं होना चाहिए लहू अब ठंडा जो इस बार गरमाया हैं।
जाया नहीं जाएगी कुर्बानी,
मेरे देश के जवानों की।
दुश्मनों तैयारी कर लो,
अपने जनाजे उठाने की।
मैं भी हो गया बुड्ढा
मैं भी हो गया बुड्ढा,
तू भी हो गई बुड्ढी।
क्या इस जन्म में,
मिलेंगे फिर कभी।
थोड़ा धैर्य मैं रखता,
थोड़ा पेशेंस तू रखती।
थोड़ा धीरज मैं रखता,
थोड़ा सब्र तू रखती।
बनी हुई हमारी बात,
इस कदर ना बिगड़ती।
मैं भी हो गया बुड्ढा,
तू भी हो गई बुड्ढी।
क्या इस जन्म में,
मिलेंगे फिर कभी।
जब 25 का था हाथ थामा,
अब हो गया हूँ प्लस फोर्टी।
तब भी थी तेरी ज़रूरत ,
अब भी है कमी खलती।
जाने किन बातों में आ,
कर बैठी ऐसी गलती।
रहती थी बनकर फेतफुल,
क्यूँ की फिर इन्फिडेलिटी?
जिसने हाथ था पकड़ा,
वो था बड़ा ही कपटी।
ले गया बच्चों संग बीवी,
उसका माइंड था डर्टी।
पति-पत्नी के झगड़ों में,
देखो पीस गए बेटा बेटी।
करते थे हम कितनी मस्ती,
मेरे बच्चे बड़े थे नॉटी।
सुधार लेते हैं बुढ़ापे में,
जवानी में जो की गलती।
भविष्य भी संवर जाएगा,
जमा की है कुछ संपत्ति।
आख़िर शुरू से रहा है,
पैसा ही तुम्हारी प्रायॉरिटी।
तलाक के साथ तुमने,
ले ली थी मेरी प्रॉपर्टी।
देखो मेहनत करके मैं,
बन गया फिर से वेल्थी।
जब तक था सेहतमंद,
कहलाता था मैं हेल्दी।
घिर चुका हूँ डिप्रेशन से,
टेंशन से हो गया सेंटी।
मैं भी हो गया बुड्ढा,
तू भी हो गई बुड्ढी।
क्या इस जन्म में,
मिलेंगे फिर कभी।

कवि : सुमित मानधना ‘गौरव’
सूरत ( गुजरात )
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