हिंदी कविता

  • रक्षक

    रक्षक जन्म लेकर जब वह आंख खोलती है देख कर दुनिया जाने क्या सोचती है   भरकर बाहों में है प्यार से उठाता शायद इसे ही मां कहा जाता   चारों तरफ है लोगों की भीड़ किससे कौन सा रिश्ता नाता   कोई भाई, चाचा कोई तो कोई मेरा पिता कहलाता मैं तो ढूंढूं उसे…

  • दर्द ग़म

    दर्द ग़म (हाइकु )   1 दिल मेरा बेज़ार है जिंदगी से ही ख़ुशी आजकल दरकार है    2 नींद लूटी इश्क़ ने ऐसी मेरी देखिए  आंखें अब  बेदार है   3 थी जहां हर रोज बस प्यार की बातें ही प्यार अब वो खार है 4   फूलों की मानिंद हर पल मुस्काता  था…

  • निद्रा

    निद्रा     शांत क्लांत सुखांत सी पुरजोर निद्रा। धरती हो या गगन हो हर ओर निद्रा।।   विरह निद्रा मिलन निद्रा सृष्टि निद्रा प्रलय निद्रा, गद्य निद्रा पद्य निद्रा पृथक निद्रा विलय निद्रा, आलसी को दिखती है चहुंओर निद्रा।।धरती०   सुख भी सोवे दुख भी सोवै सोना जग का सार है, सोना ही तो…

  • नवरात्र

    नवरात्र (नवरात्र पर विशेष )     भूलो मत अपना नाता । माता-पिता जिसे भुला दे बालक जग में चैन कहां पाता।।   ममतामयी तुम करूणामयी तुम प्रेम तुम्हारा विख्याता। कपूत को भी गले लगाती शरण तुम्हारी जो आता ।।   रक्तबीज हो या महिषासुर सामने तेरे जो जाता। महाकाली के तेज के आगे कोई…

  • सत्यमेव जयते

    सत्यमेव जयते     विजय   सत्य   की  होती है, आए कठिनाई कितनी भी।।   सत्य   ही   जीवन  का  सार शक्ति       इसकी     बेशुमार महिमा    इसकी    अपरंपार कुंद   पङे  ना  इसकी   धार लङ   के   हार   जाती   सब है  यहां   बुराई   जितनी भी। विजय    सत्य   की  होती है, आए  कठिनाई कितनी भी।। l   ‘राम’-‘कृष्ण’ का जीवन देखा…

  • तुम न जाओ

    तुम न जाओ   सूने उपवन में गहन घन प्रीति गाओ तुम न जाओ।। मेरे अन्तर्मन अभी तुम रुक भी जाओ तुम जाओ।।   स्वाती बिन प्यासा पपीहा देखा होगा, रात भर जगती चकोरी सुना होगा, मैं तना हूं तुम लता बन लिपट जाओ तुम न जाओ।।तुम न०   प्रेम तो एक हवा का झोंका…

  • उम्मीद

    उम्मीद   शांत सी जिंदगी में फिर से शोर होगा इस अंधेरी दुनिया में फिर कोई भोर होगा। इसी उम्मीद में देखो कितनी बड़ी हो गयी मैं थोड़ी मासूम तो थोड़ी नकचढ़ी हो गयी मैं। कुछ अपनों को जाते देखा तो परायों को आते देखा। जिंदगी क्या है, लोगों से सुनते देखा पर असल जिंदगी…

  • सड़क

    सड़क   पहुंच सुदूर क्षितिज धरा तक सुंदर रेखा मात्र दिखती हूं, श्याम वर्णी स्वस्थ सलोने गात दिन रात अटखेलियां खेलती हूं, पकड़ पगडंडी की राह पाया चतुर्भुज रूप चंचला आगे बढ़ती,संवरती हूं अनुपम अवतरित छटा, अव्यवस्थित पर अति आर्द्र शीत की उष्णता में तपती हूं।। अवस्थापन से हर्षातिरोक्ति हुयी कब जब मेरे कतरों की…

  • डर के आगे जीत है (दोहे)

    डर के आगे जीत है (दोहे) **** (मंजूर के दोहे) ****** १) डर से हम डरते नहीं , ना इसकी पहचान। डराओ ना जग मुझको, मैं भी अब शैतान ।। २) डर कर जीया अभी तक,पकड़ लिया अब कान। जैसे को तैसा करूं,देख जगत हैरान।। ३) डरोना कभी किसी से,अक्ल से लो तुम काम। डराने…

  • कुछ दिन पहले

    कुछ दिन पहले     कुछ दिन पहले मैं आकर्षित हो गया था उसके गौर वर्ण पर उसके मदहोश करते लफ़्ज़ों पर उसके उभरे उरोजों पर……   उसने कहा था-   तुम भी मुझे अच्छे लगते हो मैं जुड़ तो सकती हूं पर…… कैसे तेरे साथ आ सकती हूं.? शंकाओं ने घेरा हुआ है आऊँ…