तारीखें

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तारीखें

 

क्या तारीखें सच में होती हैं ?? समय तो शाश्वत है न!! यह तो तारीखों में बंधा नही फिर तारीखों का क्या काम ? प्रकृति ने तो तारीखें नही बनायीं। कैलेंडर और तारीखें मनुष्य ने अपनी सुविधा हेतु ईजाद किये। इससे उसे स्वयं को, दुनिया को परिभाषित करने में आसानी होती है।
यदि तारीखें न होतीं तो ??? तब शायद जीवन ज्यादा आसान होता।हां!! संसार आज दूसरी तरह ही होता।ठीक है इतना विकास नही होता लेकिन इतनी मारामारी और गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी नही होती।
लोग कहीं जाने के लिए, कहीं पहुंचने के लिए इतने पागल नही होते। लोग घड़ी-घड़ी घड़ी देखकर इतने उतावले नही होते। कहीं जाने की न तो जल्दी होती न कहीं पहुंचने में देर होती।
आज यदि मनुष्य इतना तनाव में जी रहा है तो उसके लिए घड़ियां जिम्मेदार हैं। यदि घड़ियों और तारीखों को हमारे जीवन से निकाल दिया जाए तो फिर ख़ालिस सुबह, दोपहर, शामें और रातें ही बचेंगी। जो कि सिर्फ हमारी होंगी। शायद हम फिर से गुफाओं में पहुंच जाएं। प्रकृति के अधिक नजदीक। अधिक नैसर्गिक ।
अमेरिका जैसे मुल्कों में लोगों का 1-1 मिनट किसी न किसी काम के लिए फिक्स है।मालूम नही इतना व्यस्त रहकर वह क्या हासिल कर पा रहे हैं जबकि अमेरिका से ज्यादा तनावग्रस्त देश ढूंढना मुश्किल है। मुंबई, बेंगलुरु, दिल्ली जैसे शहर भी उसी ट्रैक पर हैं।यहां लोगों ने अपनी स्वाभाविक नींद लगभग खो दी है।
तेज इंटरनेट और प्रौद्योगिकी ने हमे सुविधाएं तो दीं लेकिन हमारी जिंदगी,हमारा सुकून छीन लिया।जितना मनुष्य आज तनावग्रस्त है उतना कभी नही रहा और शायद यह बढ़ता ही जाए।हममें से कितने लोग रात खाना खाकर तुरंत सो जाते हैं?
घड़ियों ने हमे सिर्फ तनाव दिया है।इतनी आत्महत्याएं,सड़क दुर्घटनाएं घड़ियों की ही देन हैं।घड़ियों का अविष्कार करते समय हमने सोचा था कि यह हमारा जीवन आसान बनाएंगी लेकिन इन्होने हमे मशीन में परिवर्तित कर दिया।
अपने आसपास बुजुर्गों को देखकर लगता है कि यह आखिरी पीढ़ी है जो बिना टेक्नोलॉजी और इंटरनेट के जीवन गुजार रही है।जितना सुकून और शांति इन्हें मिला शायद ही आने वाली पीढ़ियों को मुनासिब हो सके।
अब तो बच्चा स्मार्टफोन लेकर ही पैदा होता है।बोलना बाद में सीख पाता है, फोन पकड़ना और फ़ोटो कैप्चर करना पहले सीख जाता है।
20वीं सदी से पहले तक स्थिति आज से भिन्न थी।मनुष्य शांति से जीता था,समय पर सोता था।तब शामें भी होती थीं और रातें भी। या तो तनाव होता नही था या वो तनाव को बेहतर तरीके से हैंडल कर लेते थे। पिछली सदी तक मनुष्य जितना शान्त, सहिष्णु था भविष्य में अब शायद ही हो।
नींद की कमी के चलते मनुष्य धीरे धीरे चिड़चिड़ेपन का शिकार होता जा रहा है।अब तो 10 रुपये के लिए भी किसी की जान ले ली जाती है।
मनुष्य की सोच संकीर्ण होती जा रही है। आज यदि लोग प्रेम में होने की बजाय हिंसक होना अधिक पसंद कर रहे हैं तो इसके मूल में कहीं पहुंचने की जल्दी और पर्याप्त नींद का अभाव है।
अब ये तो समय ही गवाही देगा कि तारीखें और घड़ियों ने हमे कहाँ पहुंचाया…….

 

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