तुम बिन अधूरा प्रेम

तुम बिन अधूरा प्रेम

तुम बिन अधूरा प्रेम

आंखों में भरा घना सा अंधेरा,
पर तुम्हारे बिना मैं सो ना सका।

दिल में बंद असह्य पीड़ाओं का समंदर,
फिर भी उछलती लहरों जैसा रो ना सका।

कमी रह गई शायद मेरे प्यार में कुछ,
जो ईश्वर ने जुदा कर दिया हमें।

टूटकर बिखर गया हमारे इश्क का हार,
शिद्दत से संभाले हुए एहसासों के धागों को
प्रेम के मोतियों में मैं पिरो ना सका।

तुम्हारे इंतज़ार में तड़पता ये अंतर्मन,
सिर्फ तुम्हारा ही रहकर चल दिया,
अब यह उम्रभर किसी और का हो ना सका।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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