तुम्हारे बाद का दुख

तुम्हारे बाद का दुख | Tumhare Baad ka Dukh

तुम्हारे बाद का दुख

मैं ये समझा की पल भर है तुम्हारे बाद का दुख
मगर अब तो मुकर्रर है तुम्हारे बाद का दुख

मेरे चहरे पे रौशन हैं उमीदें लौटने कीं
मेरी आँखों के अंदर है तुम्हारे बाद का दुख

तुम्हारी डायरी भी है वो छोटी मूरती भी
सभी तोहफ़ों से बढ़कर है तुम्हारे बाद का दुख

कोई दुश्मन नहीं था बाल भी बांका करे जो
मगर क्या ख़ूब नश्तर है तुम्हारे बाद का दुख

मुहल्ले में सभी की लाडली बन कर रही थीं
गली कूचे में घर घर है तुम्हारे बाद का दुख

कभी भी हो कोई भी हो ख़ुशी रहती हो तुम भी
दुखों के साथ अक्सर है तुम्हारे बाद का दुख

असद ने खुद को औरों को भी ख़ुशफहमी में रख्खा
जताता तो नहीं पर है तुम्हारे बाद का दुख

असद अकबराबादी 

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