उस चाॅंद ने बहुत तड़पाया

उस चाॅंद ने बहुत तड़पाया

उस चाॅंद ने बहुत तड़पाया

आज आसमानी उस चाॅंद ने मुझे बहुत तड़पाया,
रोज़ाना जो जल्द आता आज वक्त पर न आया।
पाॅंव में पाज़ेब हाथ में चूड़ी ये मेहन्दी मैंने रचाया,
ऑंख लगाएं बैठी रही ये इन्तज़ार ख़ूब कराया।।

क्यों करते हो हर बार ऐसा करवा चौथ की शाम,
भूखी प्यासी रहकर गृहणियां लेती तुम्हारा नाम।
बहुत नाज़ुक है जीवन की डोर ज़रा हमको थाम,
प्रेम से नीर पिलाएं साजन आएं अच्छे अंज़ाम।।

दीया जलाओ मेरे हृदय में होगा आपका उपकार,
निर्जल व्रत रखकर मैंने किया जिसको स्वीकार।
सज-धजकर बैठी हूं मैं आज बनकर नवेली-नार,
ख्वाइश तपन में न जलाओ स्वप्न करों साकार।।

चली लेखनी आज हमारी देखकर नारी की दशा,
कैसे अपने दिल को समझाएं क्या है चाॅंद मंशा।
ढल रही रात बढ़ा अन्धेरा करों खुशियों की वर्षा,
गुज़र रहा है लम्हा लम्हा हमको ना अब तरसा।।

जुग-जुग जिएं यह जोड़ी हमारी ऐसा दो वरदान,
महक उठें घर-घर का ऑंगन बनें ऐसी पहचान।
हंसी ख़ुशी संग बीतें जीवन न आएं कोई रुझान,
सपने सबके हो साकार व बढ़ें साजन सम्मान।।

रचनाकार : गणपत लाल उदय

अजमेर ( राजस्थान )

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