वशीकॄत खामोशी | Vashikrit Khamoshi

वशीकॄत खामोशी

( Vashikrit Khamoshi ) 

 

अनिश्चित
अपरिचित
भयावह सी
खामोशी
गहरे छाप छोड़
और हावी होकर
मेरे अन्तर्मन पर
मुझे धकेलने की
कोशिश करती
पश्चाताप और ग्लानि के
निर्जन कुंए में..

अनियंत्रित
अदमित
जुनूनी सी
मोहब्बत
अमानचित्रित और निषेधित करती
खामोशी के चिन्हों को
वशीकरण से
रूह को
तर जाने के लिए
प्रेेम महासागर में..

 

डाॅ. शालिनी यादव

( प्रोफेसर और द्विभाषी कवयित्री )

यह भी पढ़ें :-

भवंर | Bhanwar

Similar Posts

  • गोरैया | Poem on sparrow in Hindi

    गोरैया ( Goraya )   चहचहाती गोरैया फुदकती सबके मन को हर्षाती रंग बिरंगी डाल डाल पे जब पंख पसारे उड़ जाती   नील गगन में उड़ाने भर छत पर आकर बैठती सुंदर सी मनभावन लगती मीठी-मीठी चहकती   रौनक आ जाती घर में सब गौरैया को डाले दाना फूरर फूरर उड़ना फिर आकर घर…

  • प्रकृति का मानवीकरण

    प्रकृति का मानवीकरण प्रकृति की गोद में हम रहते हैं,उसकी सुंदरता से हमें प्रेरणा मिलती है,की उसकी शक्ति से हमें जीवन मिलता है। प्रकृति की हरियाली में हम खो जाते हैं,उसकी ध्वनियों में हमें शांति मिलती है,की उसकी सुंदरता में हमें आनंद मिलता है। प्रकृति की शक्ति से हमें प्रेरणा मिलती है,उसकी सुंदरता से हमें…

  • यादों की चुभन | Yaadon ki Chubhan

    यादों की चुभन ( Yaadon ki Chubhan ) आज फिर तेरी यादों का समंदर उमड़ आया है, हर लहर ने बस तेरा ही अक्स दिखाया है। दिल जैसे टूटकर बिखर रहा हो अंदर-अंदर, तेरे बिना इस मन ने हर पल ख़ुद को पराया पाया है। हर आह में तेरा नाम ही सिसकता है, आँसुओं में…

  • रागिनी | Kavita Ragini

    ” रागिनी “ ( Ragini ) सुमधुर गुंजार कोकिल चमक चपला सी चलन का।   रुचिर सरसिज सुमनोहर अधर रति सम भान तन का।   गगन घन घहरात जात लजात लखि लट लटकपन का।   मधुप कलियन संग लेत तरंगता खंजन नयन का।   पनग सूर्य अशेष पावत मात दुति मणि दंतनन का।   धरत…

  • राम आएंगे धरा पर | Ram Aaenge Dhara Par

    राम आएंगे धरा पर ( Ram aaenge dhara par )   राम आएंगे धरा पर, सब राम के गुणगान गाओ। भगवा धर्म ध्वज हाथ ले, नभ पताका लहराओ। चलो अवध रामभक्तों, दर्श को पलके बिछाओ। दिव्य राम मंदिर पावन, भारतवासी सारे आओ। राम का कीर्तन करो, राम की महिमा सुनाओ। आराध्य श्री रामजी, श्रद्धा से…

  • |

    Hindi Kavita By Binod Begana -कैसे-कैसे लोग

    कैसे-कैसे लोग ( Kaise-Kaise Log )     अक्ल के कितने अंधे लोग। करते क्या-क्या धंधे लोग।   मासूमों के खून से खेले, काम भी करते गंदे लोग।   रौब जमा के अबलाओं पर, बनते हैं मुस्तंडे लोग।   तन सुंदर कपड़ों से ढकते, मन से लेकिन नंगे लोग।   अपनाते दौलत की खातिर, बुरे-बुरे …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *