वे जीवित ही मरते

वे जीवित ही मरते

वे जीवित ही मरते

कर्मशील जीवित रह कर के,
हैं आराम न करते।
नहीं शिकायत करता कोई,
मुर्दे काम न करते।

जीवन का उद्घोष निरन्तर,
कर्मशीलता होती।
कर्मक्षेत्र में अपने श्रम के,
बीज निरंतर बोती।
है शरीर का धर्म स्वेद कण,
स्निग्ध त्वचा को कर दें,
अकर्मण्यता ही शय्या पर,
लेटी रह कर रोती।

जो औरों के श्रम पर जीवित,
उनका भी क्या जीना,
कर्मशील ही अपने श्रम से,
दैन्य जगत का हरते।

भोजन है अनिवार्य कि जिससे,
कर्म शक्ति तन पाये।
अपनी रुचि सामर्थ्य शक्ति से,
कर्मशील बन जाये।
केवल अन्न नष्ट कर देना,
उसका कार्य नहीं है,
आपेक्षित निर्माण सृजन में,
अपनी शक्ति लगाये।

जग से पालित पुष्ट हुआ तन,
करे जगत की सेवा,
इसी से जग कर्तव्य समझ कर,
ऋण अपना है भरते।

हैं शरीर उपहार ईश के,
लगी समय सीमायें।
वापस करना इसे एक दिन,
इसे काम में लायें।
अधिकाधिक जो लाभ उठा लें,
वही चतुर हैं ग्यानी,
जो इसको चमकाते रहते,
उनसे भी छिन जाये।

इसकी क्रियाशीलता ही है,
उत्तमता परिचायक,
अग्यानी जन ही हैं इसको,
व्यर्थ सजा कर धरते।

लगी रहे यह जग कर्मों में,
इसकी यही इयत्ता।
पंचभूत निर्मित काया की,
होती यही महत्ता।
जीवन वही सार्थक है जो,
लगा रहे कर्मों में,
कर्मशीलता के अभाव में,
क्या है इसकी सत्ता।

अकर्मण्यता कब होती है
जीवन की परिभाषा,
जो कुछ काम नहीं करते हैं,
वे जीवित ही मरते।

sushil bajpai

सुशील चन्द्र बाजपेयी

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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