दिवाली आई

ये दिवाली है निराली

ये दिवाली है निराली

जगमग-जगमग करती आई प्यारी ये दिवाली,
कोना कोना साफ़ करों बजाओ सब ये ताली।
कार्तिक माह की अमावस है इसदिन निराली,
जेब हमारी ख़ाली है पर पकवान भरी थाली।।

साफ़ करों घर का ऑंगन एवं बाहर की नाली,
दोस्तों के संग ख़ूब खेलो राम-श्याम मिताली।
बयां नही किया जाता अलोकित यह दिवाली,
मालपुआ शक्करपारा संग दाल बनें निराली।।

तरह तरह के व्यंजन बनते घर के द्वार रंगोली,
नए नए कपड़े पहनते ये स्टाईल वाली जाली।
ख़ूब पटाखे चला-चलाकर जेबें करदेते ख़ाली,
कोई अंगूठी लाएं घर में कोई लाते यह बाली।।

साॅंझ समय दीपक जलाते पग-पग उजयाली,
गणेश कुबेर संग लक्ष्मी पूजन थाल सजीली।
घर ताक गाय बैल वाहन सबों जगह दिवाली,
खेतों में जो फसले लहराती होती खुशहाली।।

देख ख़ुशी होती सबको खिल जाती है लाली,
विद्युत खम्भों पर लाईटे लगती हर एक गली।
तमस मिटाता है ये पर्व कहलाता जो दिवाली,
धन समृद्धि दर आती है दरिद्रता जाती चली।।

रचनाकार : गणपत लाल उदय

अजमेर ( राजस्थान )

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