Kavita Maa ki Yaadein

माँ की यादें | Kavita Maa ki Yaadein

माँ की यादें

( Maa ki Yaadein )

( 3 )

जिनकी मां स्वयं,
वृद्धाश्रम की चौखट पर,
बेटे को याद करते हुए,
जीवन गुजार दिया था ।

देख रहीं थीं मां अपलक,
बेटे को दूर और दूर जाते,
मां को यू अकेले ही छोड़ते,
‌‌बेटे को थोड़ी दया नहीं आई।

आज उसके बेटे ने,
अपनी मां को बोला,
हैप्पी मदर्स डे तो,
अंजाने ही आंसू छलक पड़े।

उसे मां की याद आने लगी,
कैसे मां बिना उसे खिलाएं,
चारों कितना भी नखरे किए,
बिना उसे खिलाएं, कभी नहीं खाई थी।

मां को याद करते हुए,
एक संकल्प उसे उभरा,
वह वृद्धाश्रम पहुंचकर,
मां को वापस घर ले आया।

मां बेटे दोनों के आंसू,
मिलकर एक हो गए,
आज मां बहुत खुश थी
अपने परिवार में पुनः आकर।

( 2 )

मां ही चंपा चमेली थी ,
मां ही तुलसी केसर थी ,
मां के ही पूजा पाठ से ,
महकता घर आंगन था ।

मां ही काशी मथुरा थी,
मां ही भोले भंडारी थी,
मां ही कृष्ण कन्हैया थी,
मां ही मंदिर की मूरत थी।

मां ही घर की खुशियाली थी,
मां थी तो घर मंदिर था,
वो मां ही थी जो हमको,
हर गलती पर डाटा करतीं थीं।

हम भाई बहन की लड़ाई,
प्यार से सुलझाया करतीं थीं।
घर में सबसे छोटा था मैं,
इसलिए कुछ ज्यादा दुलार वो करतीं थीं।

जिम्मेदारी से बेपरवाही पर,
अक्सर मां तू डांटा करतीं थीं।
मैं बच्चों जैसे रोता हूं,
जब तेरी याद सताती है।

तेरे संग बिताए गए पल,
मेरे लिए हीरे मोती हैं।
तेरी यादें जब आती हैं तो,
अक्सर आंखें छलक जाती हैं।

( 1 )

अम्मा याद आईं

अबकी पुण्यतिथि में ‌

न जाने क्यों
अम्मा याद आईं,
मेरे पास कोई ऐसा भी नंबर होता,
जो उससे भी बात हो पाती ,
उस देश का पता होता,
जहां वो चली गई है,
तो जरूर उसे,
एक चिट्ठी लिखता,
उसे लिखता कि,
तेरे बिन यह जिंदगी,
बड़ी सूनी सूनी सी हो गई हैं मां ।
उसे लिखता कि ,
तेरे जाने के बाद
तेरी बहू भी,
तेरी तरह बिन भोजन किए,
कभी भूखे पेट नहीं जाने देती हैं।
बताता कि,
तेरे जाने के बाद,
एक प्यारी सी गुड़िया ने,
जन्म लिया है,
जो आपको बहुत याद करती हैं,
बाबू तो तेरी सूरत,
हर बूढ़ी मां में देखता है,
कही वह हमारी माई तो नहीं हैं।
जिंदगी में आज सब कुछ है,
बस तेरी सूरत नहीं दिखाई देती हैं मां।
मैं लिखता कि,
तेरे जाने के बाद,
छोटी दीदी की मांग सूनी हो गई,
रो रो कर,
उसके चेहरे का रंग उतर गया है।
उसे लिखता कि,
भैया, भाभी, बच्चे सब
बहुत याद करते हैं।
उसे लिखता कि,
जिस आशियाने को बनाने में,
तूने सारी जिंदगी लगा दी थी,
जिसका गृहप्रवेश देखें बिना,
तू चली गई,
वह विकास के नाम पर,
टूटने वाला है।
उसे लिखता कि,
जब से तू गई है,
कुछ कुछ सुधरने का,
प्रयास कर रहा हूं -मां!
जब जब भी जीवन में,
दुःख बढ़ जाता है,
तू ही याद आती है मां।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

यह भी पढ़ें :-

https://thesahitya.com/kavita-ye-kaisa-ram-rajya-hai/

Similar Posts

  • मंदिर बनने वाला है | Kavita Mandir Banne Wala Hai

    मंदिर बनने वाला है ( Mandir banne wala hai )    मन धीर धरो क्यो आतुर हो,अब शुभ दिन आने वाला है। साकेत की दिव्य धरा पर फिर से, मंदिर बनने वाला है। अब हूक नही हुंकार भरो, श्रीराम का जय जयकार करो, तुम पहन लो केसरिया साँफा, घर राम का बनने वाला है। राजा…

  • दर्द अपने सनम | Kavita Dard Apne Sanam

    दर्द अपने सनम ( Dard Apne Sanam ) दर्द अपने सनम पराए क्यों हो गए। रिश्ते हमने है निभाए क्यों खो गए। पीर पर्वत से भारी हुई क्यों सनम। खुशियां बांटी हमने छुपाए है गम। खिल जाता चेहरा देख हमको जरा। दिल दीवाना कहो कहां वो प्यार भरा। बदली दुनिया तुम ना बदलना सनम। कैसे…

  • फागुन | Kavita phagun

    फागुन ( Phagun )   फागुन की दिन थोड़े रह गए, मन में उड़े उमंग। कामकाज में मन नहीं लागे, चढ़ा श्याम का रंग।   रंग  बसंती  ढंग  बसंती,  संग  बसंती  लागे। ढुलमुल ढुलमुल चाल चले,तोरा अंग बसंती लागे।   नयन से नैन मिला लो हमसे, बिना पलक झपकाए । जिसका पहले पलक झपक जाए,…

  • भोर की किरण | Kavita

    भोर की किरण ( Bhor ki kiran )   भोर की पहली किरण उर चेतना का भाव है उषा का उजाला जग में रवि तेज का प्रभाव है   आशाओं की जोत जगाती अंधकार हरती जग का जीने की राह दिखाकर उजियारा करती मन का   कर्मवीरों की प्रेरणा हौसलों की उड़ान है योद्धाओं की…

  • शर्मनाक स्थिति | Kavita

    शर्मनाक स्थिति ( Sharmanak sthiti )   ऐसे पिट रहा है साहेब का विदेशों का डंका, आग लगा के रख दी स्वयं की लंका। शवों पर चढ़ शान से सवारी करते रहे, आॅक्सीजन के अभाव में भले हम दम तोड़ते रहे। बिछ गई लाशें चहुंओर, पर थमा ना चुनाव और नारों का शोर। अब मद्रास…

  • आकर्षण है पाप में | Akarshan hai Pap Mein

    आकर्षण है पाप में ( Akarshan hai pap mein )   जीवन की सुख-शान्ति, दग्ध हो जाये न अनुताप में। सदा सजग होकर रहना है, आकर्षण है पाप में। कुत्सित छलनायें आती हैं, कृत्रिम रूप संवार कर। सहज नहीं स्थिर रह पाना, मन को उन्हें निहार कर। एक-एक पग का महत्व है, पथिक सशंकित रहना!…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *