पूजा पाठ

वे बहुत बड़े भक्त हैं ,
रखते हैं नवरात्रि व्रत ,
और करते हैं पूजन ,
कुंवारी कन्याओं की ।
लेकिन पुत्र प्रेमी भी है ,
पुत्र प्रेम में वे ,
पुत्रियों को गर्भ में ही ,
मरवा डालते हैं ,
उन्हें नहीं चाहिए लड़कियां ,
किस काम की है यह लड़कियां,
जिंदगी भर कमा कमा कर,
इन्हें खिलाओ पहनाओं ,
शादी में भी नेक दहेज दो,
इससे तो अच्छा लड़का होता है,
जो सुबह शाम चाहे,
मारता हो चार लात,
फिर भी उसे भी वें प्रसाद समझकर,
खा पी जाते हैं ,
कभी डकार नहीं लेते,
वाह पुजारी जी,
तेरी पूजा महान है ।
जब तक तुम यह ,
लड़का लड़की में,
भेदभाव रखते रहोगे,
सुखी नहीं रह पाओगे।

 

कुत्ता और मनुष्य

अपने भाग्य भाग्य की बात,
कुत्ते रहते महलों में,
खाते रस मलाई,
वही मानव होकर भी,
किसी किसी को मिलता नहीं,
खाने पीने को जूठन भी।

कुत्ते के भाग्य सराहें या,
मनुष्य के कर्म को,
कुत्ता और मनुष्य में ,
है कौन श्रेष्ठ,
बन गई है एक अबूझ पहेली।

संतजन और सद्ग्रंथ,
मानव की महानता बताते,
परंतु आज कल के कुत्ते को देख,
लगता है कि,
बदलनी होगी परिभाषा।
लिखना होगा,
बढ़े भाग्य से हमें मिला,
कुत्ते का जन्म।

 

पगली और माडल

( Pagli aur model ) 

गांव की गलियों में,
बेतरतीब कपड़े पहने,
वह पगली टहल रही है।

गवई बच्चे ठेले फेंकते तो,
हां -हां , ही -ही करती पगली, उन्हें दौड़ा लेती ।

एक मॉडल आज,
निर्वस्त्र होने की,
सरकार से इजाजत मांगतीं, सार्वजनिक नंगी होने का।

इस खबर को सुनकर ,
उसके चहेतों की संख्या बढ़ गई, जिससे रातों-रात वह ,
मशहूर हो गई ।

पगली का नंगापन,
पागलपन कहलाया,
तो मॉडल का नंगापन ,
क्या कहलायेगा?

इस प्रश्न का उत्तर,
कौन देगा? या यह प्रश्न ही अनुत्रित ही रह जाएगा!

 

विधवा

अभी-अभी तो उसके,
सिंदूर के रंग भी नहीं छूटे थे ,
घर की खुसर फुसर को लेकर, वह कुछ चौकन्नी हो गई।

अरे क्या हुआ? क्या हुआ? इतना बड़ा हादसा कैसे हुआ? उनको तो कुछ नहीं हुआ?
अरे क्या वह मारे गए?
क्या यह सच है रानी मां!
बेटा भाग्य को कौन टाल सकता था,
लगता था इतने दिनों का ही मिलना था,
संतोष करो मेरी लाडो ,
सब ठीक हो जाएगा।

वह सोचती–
अब यह काल कोठरी ही,
उसका जीवन है।
जन्म-जन्म भर के लिए,
अब घुट घुट कर जीना होगा।
कभी मन में विचार कौंधता, पुरुषवादी समाज की देन,
सदा से यही है कि —
यदि पत्नी मर जाए तो ,
तुरंत लार टपकने लगती है।
एक तरफ अर्थी जाती ,
दूसरी तरफ नई नवेली बहू आती।

क्यों स्त्री को ?
नहीं दिए गए यह अधिकार
युग युगांतर से लेकर, आज भी स्त्री पूछ रही है यह सवाल!

 

कुंजड़िन

मैं बाज़ार से,
लौट रहा था ,
देखा,
कुछ कुंजड़िन,
बेच रही थी लोहा के बर्तन,
मैं रूक गया,
खड़े खड़े ही मोल भाव करने लगा,
उसने कहा कि,
थोड़ा बैठोगे भी तो,
और उसने,
बैठने को मजबूर कर दिया।

वह भोजन खाएं जा रही थी,
मोल भाव भी करती जाती ,
मैंने कहा —
खा लो फिर बात करना,
मैं बैठ गया ,
वह भी खा चुकी,
उसकी प्रेमपूर्ण वाणी ,
दिल को छू गई,
और आखिर उसने ,
एक तवा खरीदने को,
मुझे मजबूर कर दिया।

 

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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