जाग रे तू जाग | Jaag re Tu Jaag

जाग रे! तू जाग!!

( Jaag re tu jaag )

 

फन उठाये आ रहे हैं,
वंचना के नाग।

देखना अब त्याग सपना।
कर प्रकाशित दीप अपना।

ये गरल के सचल वाहक,
दूर इनसे भाग।

है अमंगल निकट आना।
दूध मत इनको पिलाना।

छोड़ते मुंह से सदा ये,
बस विषैले झाग।

केंचुलें रंगीन इनकी।
कालिमा पर प्रकट मन की।

डसा करते हैं उसी को,
जो करे अनुराग।

जाग रे! तू जाग!!

sushil bajpai

सुशील चन्द्र बाजपेयी

यह भी पढ़ें :-

गीले नयन | Geele Nayan

Similar Posts

  • शासन और प्रशासन | Shasan aur Prashasan

    शासन और प्रशासन ( Shasan aur Prashasan )   उग्र भीड़ सचिवालय जानिब , चली सौंपने ज्ञापन . शोषित जन की आवाज बने , अब आक्रोशित नारे . माँगें लेकर खड़ी याचना , शासन को धिक्कारे . तीन पाँव धरती की खातिर , निकला जैसे वामन . फर्जी बनकर टेढ़े चलते , ये सारे ही…

  • चतरू चाचा आए | Chatru Chacha Aaye

    चतरू चाचा आए ( Chatru chacha aaye )  शहर बसे बेटे के घर जब , चतरू चाचा आए . सहम गए थे पूत -पतोहू , बच्चे भी चकराए . लगे बहू को निशिदिन ही अब , होगी टोकाटाकी . नहीं रुचेंगी इन्हें गैस की , रोटी काची पाकी . चूल्हा खोदे खाट बिछी ये ,…

  • नव वर्ष पर एक नवगीत

    दीप प्रेम का जग में जलाएं दीप प्रेम का जग में जलाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं रहे न भूखा कोई कहीं परसोए नहीं मजबूर जमीं परहाथ मदद का चलो बढ़ाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं। १। लुटे न अस्मत किसी बहन कीउठे न अर्थी किसी दुल्हन कीसंस्कारों की हम जोत जलाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं।२। नशे…

  • खोया है विश्वास

    खोया है विश्वास : नवगीत फटे-पुराने कपड़े उनके,धूमिल उनकी आस।जीवन कुंठित है अभाव में,खोया है विश्वास।। अवसादों की बहुतायत है,रूठा है शृंगार।अंग-अंग में काँटे चुभते,तन-मन पर अंगार।।मन विचलित है तप्त धरा है,कौन बुझाये प्यास। चीर रही उर पिक की वाणी,काॅंपे कोमल गात।रोटी कपड़ा मिलना मुश्किल,अटल यही बस बात।।साधन बिन मौन हुआ उर,करें लोग परिहास। आग…

  • जम्हूरा मन

    जम्हूरा मन वर्षों का विश्वास तोड़कर,चलता बना जम्हूरा मन।अब तक मुझे कचोट रहा है,मेरा यही अधूरापन। धड़कन तार-तार हो जाती,सपना दिन में तारे सा,साँस गटरगूँ करता रहता,अपना बिना सहारे सा।बनी ज़िन्दगी ढोल-नगाड़ा,बाजे ख़ूब तम्बूरा मन। आओ और उड़ाओ खिल्ली,मेरे एकाकीपन की।चिन्दी-चिन्दी छीन-झपट लो,बेढ़ंगे जर्जर तन की।ओखलिया में कूट-कूट कर,बना लिया है चूरा मन। जाने कैसी…

  • ये सावन के अंधे हैं | Sawan ke Andhe

    ये सावन के अंधे हैं ( Ye sawan ke andhe hai )   सूझ रही है बस हरियाली , ये सावन के अंधे हैं . कोलाहल की आड़ लिए नित , मिला चीखता सन्नाटा . कंगाली ने तरस दिखा कर , दिया जिन्हें गीला आटा . आग बुझा कर गई हताशा , सपने कुछ अधरंधे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *