Shasan aur Prashasan

शासन और प्रशासन | Shasan aur Prashasan

शासन और प्रशासन

( Shasan aur Prashasan )

 

उग्र भीड़ सचिवालय जानिब ,
चली सौंपने ज्ञापन .

शोषित जन की आवाज बने ,
अब आक्रोशित नारे .
माँगें लेकर खड़ी याचना ,
शासन को धिक्कारे .
तीन पाँव धरती की खातिर ,
निकला जैसे वामन .

फर्जी बनकर टेढ़े चलते ,
ये सारे ही प्यादे .
सारे प्यादे घूम रहे अब ,
हक के पहन लबादे .
लगे समझने खुद को ही ये ,
शासन और प्रशासन .

लाठी – चार्ज हुआ सहसा ही ,
चले गैस के गोले .
डंडे खाकर गुस्सा भागा ,
छोड़े चप्पल झोले .
आज दमन ने अधिकारों का ,
ऐसा किया समापन .

 

Rajpal Singh Gulia

राजपाल सिंह गुलिया
झज्जर , ( हरियाणा )

यह भी पढ़ें :-

टूट गई | नवगीत

Similar Posts

  • देख बेबसी | Dekh Bebasi

    देख बेबसी ( Dekh bebasi )   लगता है कुछ होने को , मान गए इस टोने को . मन करता है कभी -कभी , पाप पुराने धोने को . याद बची एक तुम्हारी , और नहीं कुछ खोने को . अभी -अभी रोकर सोया , बच्चा एक खिलौने को . बीत गई सो बात…

  • टूट गई | नवगीत

    टूट गई | नवगीत   साँप मरा ना घुन खायी सी , लाठी टूट गई . जिनकी खातिर आँख फुड़ाई , कहें वही काना . उतना ही वह दुःख भोगता , जो जितना स्याना . चने उगें भी नहीं बतीसी , पहले टूट गई . सीना चीर दिखाया लेकिन , गई नहीं शंका . कंलक…

  • जाग रे तू जाग | Jaag re Tu Jaag

    जाग रे! तू जाग!! ( Jaag re tu jaag )   फन उठाये आ रहे हैं, वंचना के नाग। देखना अब त्याग सपना। कर प्रकाशित दीप अपना। ये गरल के सचल वाहक, दूर इनसे भाग। है अमंगल निकट आना। दूध मत इनको पिलाना। छोड़ते मुंह से सदा ये, बस विषैले झाग। केंचुलें रंगीन इनकी। कालिमा…

  • नव वर्ष पर एक नवगीत

    दीप प्रेम का जग में जलाएं दीप प्रेम का जग में जलाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं रहे न भूखा कोई कहीं परसोए नहीं मजबूर जमीं परहाथ मदद का चलो बढ़ाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं। १। लुटे न अस्मत किसी बहन कीउठे न अर्थी किसी दुल्हन कीसंस्कारों की हम जोत जलाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं।२। नशे…

  • खोया है विश्वास

    खोया है विश्वास : नवगीत फटे-पुराने कपड़े उनके,धूमिल उनकी आस।जीवन कुंठित है अभाव में,खोया है विश्वास।। अवसादों की बहुतायत है,रूठा है शृंगार।अंग-अंग में काँटे चुभते,तन-मन पर अंगार।।मन विचलित है तप्त धरा है,कौन बुझाये प्यास। चीर रही उर पिक की वाणी,काॅंपे कोमल गात।रोटी कपड़ा मिलना मुश्किल,अटल यही बस बात।।साधन बिन मौन हुआ उर,करें लोग परिहास। आग…

  • जम्हूरा मन

    जम्हूरा मन वर्षों का विश्वास तोड़कर,चलता बना जम्हूरा मन।अब तक मुझे कचोट रहा है,मेरा यही अधूरापन। धड़कन तार-तार हो जाती,सपना दिन में तारे सा,साँस गटरगूँ करता रहता,अपना बिना सहारे सा।बनी ज़िन्दगी ढोल-नगाड़ा,बाजे ख़ूब तम्बूरा मन। आओ और उड़ाओ खिल्ली,मेरे एकाकीपन की।चिन्दी-चिन्दी छीन-झपट लो,बेढ़ंगे जर्जर तन की।ओखलिया में कूट-कूट कर,बना लिया है चूरा मन। जाने कैसी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *