Geeton ki Gagari

गीतों की गगरी | Geeton ki Gagari

गीतों की गगरी

( Geeton ki Gagari )

गीतों की गगरी छलका कर,सर्वत्र सुधा बरसाता हूँ।
अपने अधरों पर प्यास लिये, औरों की प्यास बुझाता हूँ।।

मैं सोम-सुधा पीने वाला ,खाली है मेरा घट-प्याला ।
सजती रहती है नयनों में ,मेरे सपनों की मधुशाला ।
साँसों की तालों पर छेडूँ ,मधुरिम गीतों की स्वर माला ।
अनुनय विनती मनुहार लिये ,वीणा के तंत्र बजाता हूँ ।।
गीतों की गगरी—–

वैरागी हूँ अनुरागी हूँ ,क्या जानूँ मैं दुनियादारी ।
मेरी तृष्णा को पीती है ,मेरे ही उर की फुलवारी।।
जलता हूँ अपनी ज्वाला में ,सब कहें गयी है मति मारी ।
मन की पीड़ा को वरण किये ,मदमस्त हुआ मुस्काता हूँ ।।
गीतों की गगरी——

मैं निपट निर्क्षर अज्ञानी ,पढ़ सका नहीं मन की पाती ।
कब समझ सका उर-कंपन को ,कब जली स्नेह दीपक बाती ।
किसके संकेतों को पाकर ,किसने लूटी जीवन थाती।
अपनी ही धुन में मगन रहा ,अपनी ही धुन में गाता हूँ ।।
गीतोँ की गगरी——-

तोता मैना तरुवर कलियाँ,सब साथी यह अलबेले हैं।
राधा-मोहन से हम अक्सर ,अपने आँगन में खेले हैं ।
वंशीवट यमुना तट जैसे, अब तक आँखों में मेले हैं ।
जो भी मैंने पाया साग़र,उस पर ही शीश नवाता हूँ।।
गीतों की गगरी——
अपने अधरों पर——-

Vinay

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003
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