हाय रे बेरोजगारी | Kahani Berojgari

एक पुस्तक की दुकान पर बहुत से बच्चे जाब का फॉर्म देख रहे थे। उसी में एक फॉर्म डोम की भर्ती का भी निकला हुआ था। बच्चों ने सोचा यह डोम क्या होता है ?

एक ने कहा-” तुम डोम नहीं जानते-समझते। अरे भाई जो मुर्दों को जलाते हैं । जिसमें हर समय मुर्दों के बीच रहना पड़ता है।”

दूसरे ने कहा -“मुर्दे को जलाने की नौकरी। कौन मुर्दों को जलाने जाएगा? कौन इसमें फॉर्म भरेगा ?।”
फिर एक तीसरे ने कहा -“तुम लोगों की बातें तो ठीक है लेकिन पता है कि नहीं यह नौकरी सरकारी है सरकारी । कौन देखता है तुम क्या करते हो? सबको सरकारी नौकरी वाला लड़का चाहिए । चाहे वह गटर की सफाई वाला हो या मुर्दों की सफाई वाला क्या फर्क पड़ता है ?।”

पहले ने कहा-” तुम्हें कोई फर्क पड़े या ना पड़े लेकिन हमें पड़ता है। एक तो हमने बीटेक किया हुआ है । अब बीटेक करने के बाद डोम की नौकरियां करेंगे।”
दूसरे ने कहा -“तुझे बीटेक दिख रहा है । मैं भी तो पीएचडी कर चुका हूं । दर दर भटक रहा हूं। बालों में सफेदी आने लगी है ।गाल सुसुक गये हैं । यदि डोम के नौकरियां भी मिल जाए तो कम से कम मेहरियां के मुख तो देख लेब । बिना नौकरियां के मेहरियां भी नहीं मिल रही है।”

वही पर कुछ और बच्चे थे उन्होंने सोचा कि जब बीटेक पीएचडी करने वाले डोम का फॉर्म भर रहें हैं तो हम क्यों पीछे रहे उन बच्चों ने भी ले लिया था।

उनमें से एक बच्चे ने कहा –“यार! इसमें तो योग्यता आठवीं पास लिखी है। फिर बीटेक एवं पोस्ट ग्रेजुएट करने वाले क्यों फॉर्म भर रहे है?”

दूसरे ने कहा -” बीटेक किया हो या पीएचडी। फॉर्म नहीं भरेंगे तो और क्या करेंगे ? सरकारी नौकरी मिलती कहां है? भला डोम के मिल जाए बहुत बड़ी बात है।”

एक तीसरे ने कहा -” यार बात तो ठीक है लेकिन घर कैसे बताएंगे कि हम डोम बनई के फॉर्म भरई के हैं। पैसा दे दीजिए ।”
फिर एक बच्चे ने कहा – ” का हमार माई बाबू डोम बनने के लिए शहर में पढ़ने भेजे रहे।”

लड़के आपस में वार्तालाप कर रहे थे। वहां कुछ लड़कियां भी थीं। उनमें से कई पोस्ट ग्रेजुएट थी। कई वर्षों से नौकरी के लिए ट्राई कर रही थी लेकिन नौकरी थी कि मिलने का नाम नहीं ले रही थी।

नौकरी नहीं मिली तो विवाह कैसे होगा। माई बाबू तो करत रहे लेकिन हमही मना कर देत रहे कि अभी पढ़ाई लिखाई करना है।” उनमें से कई लड़कियों ने भी फार्म भर दिया।

दूसरा दृश्य
सरकारी अधिकारी ने देखा कि तो फार्मो का ढेर लग गया था । बाप रे बाप 6 पद पर 8000 फॉर्म। उसने सभी फार्मो को अलग-अलग कैटेगरी में बंटवाया।

उसने जब फार्म भरने वाले बच्चों की योग्यता के बारे में फार्म अलग अलग करने वाले लोगों से पूछा तो उन्होंने कहा -” साहब उसमें 100 इंजीनियरिंग के , 500 पोस्ट ग्रेजुएट के ,2200 ग्रेजुएट के फॉर्म थे। ८४ लड़कियों के भी है वह सभी की सभी उच्च शिक्षित हैं।”

वहां के सभी अधिकारी और कर्मचारी यह देखकर हतप्रभ थे की देश में कितनी संख्या में बेरोज़गारी फैला हुई है।
इंटरव्यू के दिन अधिकारियों ने एक बच्चे से जो कि बीटेक किया हुआ था पूछा -” अच्छा बाबू यह बताओ पहले कि तुमने तो बीटेक किया है फिर यह फॉर्म क्यों भर दिया पता है इसमें क्या करना पड़ेगा।”

लड़के ने कहा -” पता है साहेब! मुर्दों को उठा कर जलाना पड़ेगा। कई सालों से बहुत ट्राई किया लेकिन नौकरी मिली नहीं अब क्या करें ? सोचा कुछ नहीं तो डोमेन के नौकरियां मिल जाए तो भी अच्छा है। जो बेरोजगारी का कलंक है वह तो मिट जाई। राजा हरिश्चंद्र भी तो डोम बना रहे । हमहो बन जाब तो का बात है।”

अच्छा ठीक है तुम जाओ। इस प्रकार से अधिकारियों ने बच्चों से प्रश्न पूछे तो देश में व्याप्त बेरोजगारी का आलम देखकर उन्हें वास्तविकता का भान हुआ।

इसके पहले डोम की नौकरी के लिए अक्सर वही बच्चे फॉर्म भरते थे जिसके घर में पहले इस प्रकार के काम कर रहे लोग होते थे । ऐसा पहली बार था कि इतनी बड़ी मात्रा में उच्च शिक्षित लोग डोम की नौकरी के लिए फॉर्म भरे हुए हैं।

अधिकारियों का लगा कि सरकार युवाओं की समस्या को न समझते हुए देश को धर्म के नशे में डुबो रहे हैं। आखिर इस देश का क्या होगा जिस देश में इतनी बड़ी मात्रा में बेरोजगारी हो कि डोम की नौकरी का फॉर्म भरने के लिए इंजीनियर पोस्ट ग्रेजुएट आदि बच्चे भर रहे हो। फिर हमें क्या? हमें तो छह को ही सेलेक्ट करना है। आखिर ७९९४ बच्चों का भविष्य क्या होगा?

बात दरअसल यह थी कि कोलकाता में मुर्दों को जलाने एवं प्रवाहित करने के लिए एक सरकारी डोम की जरूरत थी। जिस देश में डोम बनने के लिए इतनी मात्रा में बच्चे टूट पड़े हो तो क्या यही राम राज्य है? हम कैसा राम राज्य लाना चाहते हैं एक बार हमें यह सोचना होगा?

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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