दुआ रही सबकी

दुआ रही सबकी | Kavita Doa Rahi Sabki

दुआ रही सबकी

ये दुआ रही हम सबकी,
हो जाए सारी जहां आपकी।
यह खुशी का दिन सदा,
आते रहे आपके जीवन में रोजाना।

बनिए खिलकर सुगन्धित फूल।
हो रोशनमय आपसे ,आपका कुल।
जन्म का सद्फल है आपको पाना।
माया के तम में ना हो कभी डगमगाना।
नित गुणगान हो आपके व्यक्तित्व की।
ये दुआ रही हम सबकी।

परम प्रकाश में रहिए आप।
सारे तम नित रहे साफ।
न रहे खुशियों का आपकी ठिकाना।
नित्य परमानंद का हो आपके जीवन में आना।
बराबरी ना कर सके कोई, आपकी कामयाबी की।
ये दुआ रही हम सबकी ।

सबके हृदय में हो आपका वास।
रहना हो सदा प्रभु के पास।
बनिए प्रभु का ऐसा प्यारा।
चमकिए बनकर सूरज, चांद ,तारा।
वृद्धि हो सदा आपके यश की।
ये दुआ रही हम सबकी।

Suma Mandal

रचयिता – श्रीमती सुमा मण्डल
वार्ड क्रमांक 14 पी व्ही 116
नगर पंचायत पखांजूर
जिला कांकेर छत्तीसगढ़

यह भी पढ़ें :-

हिन्दी की बिंदी | Kavita Hindi ki Bindi

Similar Posts

  • धरती की व्यथा | Kavita Dharti ki Vyatha

    धरती की व्यथा ( Dharti ki Vyatha ) मैं खुश थी जब धरती न कहला कर सूरज कहलाती थी तुममें समा तुम्हारी तरह स्थिर रह कर गुरुग्रह जैसे अनेक ग्रहों को अपने इर्द गिर्द घुमाती थी पर जबसे तुमने मुझे पृथक अस्तित्व में लाने का प्रण किया तभी से एक नित नया अहसास दिया ।…

  • हमारे पूर्वज | Hamare Purvaj Kavita

    हमारे पूर्वज ( Hamare purvaj )   परिवार  की  नींव  है पूर्वज, संस्कारों के दाता है। वटवृक्ष की छांव सलोनी, बगिया को महकाता है।   सुख समृद्धि जिनके दम से, घर में खुशियां आती। आशीशों का साया सिर पर, कली कली मुस्काती।   घर के बड़े बुजुर्ग हमारे, संस्कारों भरी धरोहर है। धन  संपदा  क्या …

  • फूलों सी कोमल नारी | Poem nari

    फूलों सी कोमल नारी ( Phoolon se komal nari ) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की विशेष प्रस्तुति     सोनू!फूलों सी मासूम हो फूलों में सिक्त शबनम की बूंदे हो देखूँ तुम्हें जी भरके भी जी भरता नहीं बस तेरी तस्वीरों को ही देखता रहता हूँ     पूरी कायनात जैसी हो तुम तुम्हें देख खुदा…

  • बचपन की यादें | Bachpan ki Yaadein

    बचपन की यादें  ( Bachpan ki yaadein )    बचपन की यादों का अब तो मैं दिवाना हो गया क्या शमा कैसी फिजाएं,मन मस्ताना हो गया।   मासूमियत की है लरी,मस्ती का फ़साना क्या कहें प्यार था पहले का जो अब वह तराना हो गया।   वह खेलना वह कूदना उस खेत से खलियान तक…

  • पाषाण युग | Pashan Yug par Kavita

    पाषाण युग ( Pashan yug)    स्वर्ण युग बीता रजत युग वो ताम्र युग चले गए। कलयुग में नर भांति भांति पग पग पे छले गए। पत्थर दिल लिये लो आया अब पाषाण युग। प्रस्तर ही पूजे जाते हैं शिलालेखों में बीते युग। दुख दर्द भाव भावना पीर पराई जाने कौन। वक्त खड़ा चुप्पी साधे…

  • योगेश की कविताएं | Yogesh Hindi Poetry

    इंसानियत मर रही कितना क्रूर होता जा रहा अब मानव,मानवता क्रूरता में बदलती जा रही,अपने स्वार्थ की हर सीमा लांघ रहा,बुद्धिमत्ता, समझदारी क्षीण होती जा रही,रिश्ते – नाते,अपने – पराए,सब भूल रहा,इंसानियत भी अब शर्मसार हुए जा रही,दोष इन सबका हालातों को दिया जा रहा,मगर झांककर देखो ये नशे की लत हर घर अपना आतंक…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *