रिश्तों की डोर | Kavita Rishton ki Dor

रिश्तों की डोर

( Rishton ki Dor )

घरौंदे टूटकर फिर बनते हैं
बदलते हैं महल खंडहर और
खंडहर महल में
सतत चलती ही रहती है यह प्रक्रिया

हार के बाद कभी जीत न मिली हो
ऐसा नहीं होता किसी के साथ
कोशिश तो करिये और एक बार
शायद सफलता इसी मे हो

होती नहीं कमजोर उम्मीद की डोर
धैर्य और प्रयास बनाये रखिये
मकान रहे न रहे
रिश्तों की गर्माहट मे जान जरूर होती है

न बनाइये कच्ची मिट्टी का घडा इन्हे
पके गागर मे रखा जल हो या भोजन
स्वाद उसका अद्वितीय होता है

काम आते हैं रिश्ते हि हर हाल में
जरूरत तो होती है हर किसी को
माना कि आज उनकी है
नहीं होगी कल तुम्हें कैसे कहें

मोहन तिवारी

 ( मुंबई )

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