Hasti

हस्ती | Kavita Hasti

हस्ती

( Hasti )

बरसती बूंदों को गिनते हो क्यों
लहराते सागर को देखिये
व्यक्तिगत मे झांकते हो क्यों
उसके परिणामों को देखिये

माना कि वह आज कुछ नहीं
उसके मुकाम को तो देखिये
कदमों को उसके देखते हो क्यों
कर रहे उसके प्रयासों को देखिये

रोक पाने की उसे हस्ती नहीं तुम्हारी
वह बिकाऊ नहीं, लक्ष्य से अपने.
तुमने खरीदी होगी बाज़ार भले
दौलत से कहीं बड़े हैं उसके सपने

परिंदा है, अंबर का जिगर रखता है
अंधेरे मे भी वो सहर रखता है
समझिये न उसे फूल किसी कोठे का
जबान मे शिला दिल में गंगा रखता है

फ़ानी जहाँ मे जीत हि मुकम्मल नही
बदल जाते हैं मौसम वक्त के साथ
गुमां रह न पायेगा तुम्हारा हि सदा
आज तुम्हारे साथ कल हमारे हाथ

मोहन तिवारी

 ( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

ईंट की दीवारें | Kavita Eent ki Deewaren

Similar Posts

  • मन की पीड़ा | Kavita Man ki Peeda

    मन की पीड़ा ( Man ki Peeda ) मन की पीड़ा मन हि जाने और न कोई समझ सका है भीतर ही भीतर दम घुटता है कहने को तो हर कोई सगा है अपने हि बने हैं विषधारी सारे लहू गरल संग घूम रहा है कच्ची मिट्टी के हुए हैं रिश्ते सारे मतलब की धुन…

  • मैं पेड़ हूँ | Ped par Kavita

    मैं पेड़ हूँ ( Main ped hoon )   मैं हूॅं एक जंगल का पेड़, फैला हूँ दुनिया और देश। निर्धन या कोई हो धनवान, सेवा देता में सबको समान।। जीवन सबका मुझसे चलता, सांस सभी का मुझसे चलता। बदले में किसी से कुछ ना लेता, सारी उम्र सबको देता ही रहता।। पहले मेरा जंगल…

  • जागो! मेरे देश के युवा

    जागो! मेरे देश के युवा आओ! हम रचे नवगीत।रचे ऐसा नवगीत, शत्रु भी बन जाए मीत॥ साधु बन घूमते रावणकरने सीता का वरण।आए दिन अब हो रहा,द्रोपदी का चीर-हरण॥करे पापियों का अब नाश, हो अच्छाई की जीत।रचे ऐसा नवगीत, शत्रु भी बन जाए मीत॥ छलावी चालें चल रहेकपटी-काले मन।नित झूठे लूट रहेंसच्चाई का धन॥बन पार्थ…

  • दिल को हारने से रोको जरा | Poem Dil ko Harne se Roko Zara

    दिल को हारने से रोको जरा ( Dil ko harne se roko jara ) मेहनत का फल होता खरा अतीत हो कितना अंधेरा भरा आशा ने देखो उजाला करा मजदूर मेहनतकश देखो जरा लगन किसान की खेत है हरा सोकर उठो जागो देखो जरा जीवन में रुकना नहीं है भला कदमों को आगे बढ़ते चला…

  • जुदाई | Judaai

    जुदाई ( Judaai )    धड़कने कभी ह्रदय से जुदा नहीं हो सकती है। परदेसी पिया जुदाई सहन नहीं हो सकती है। पलक बिछाए नयना बैठे नजरे राहें तकती है। अधर गुलाबी प्रीत बरसे पांव पायल बजती है। परदेसी पिया जुदाई काले केश घटाएं घिरती बूंदे बरसात सताती है। मन का मीत पिया परदेसी याद…

  • दर्द ए दास्तां | Hunkar ki dard -e- dastan

    दर्द – ए – दास्तां ( Dard -e- dastan )     1. दर्द – ए – दास्तां दर्द ए दास्तां लिख करके भी, दर्द बता ना पाया मैं। वो उलझा था अपने ग़म में, अपना कहाँ दिखाया मैं। दुनियादारी में उलझा वो, मेरा मन उलझा उसमे, बालसखा सी दर्द हमारी,दूर ना उससे जा पाया…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *