गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व

गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व

आज गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व है
आज गुरु महिमा पर पावन गर्व हैं

बिना गुरु जग में कौन मेरा अपना
गुरु के चरणों मे अभिनंदन गर्व है

प्रथम गुरु मेरी माता दूसरा गुरु पिता
तीनों को सिर झुका कर गर्व है

नाल काटा नाभि से दाई बाई ने
बंधन टूट गया दाई पर गर्व है

गुण चोर मत बन रख लेखा जोखा
दूध नहींं लजाना मां पर गर्व है

चूल्हा चौका पर मां पिता धूप में
ख़ून पसीना बहाया दोनों पर गर्व है

गुरु से ज्ञान ग्रहण किया बना प्रवीण
देहिक भोतिक आत्मिक शांति दी गर्व हैं

गुरु गोवींद भव सागर पार करे ‘कागा’
चिंतन मनन नमन मन से गर्व हैं

—0—

गुरु बिना गति नहीं

गुरु ज्ञान की खान बिना गुरु गति नहीं
गुरु ज्ञान का भंडार बिना गुरु गति नहीं

गुरु देता विधा विधि विधान शुभ सरल संस्कार
गुरु गोविद ज्ञान ज्ञाता बिना गुरु गति नहीं

गुरु मार्ग दर्शन करे निर्मल जल गंगा जान
गुरु बिना जग अंधेरा बिना गुरु गति नहीं

गुरु दीपक बाती तेल मिटाये घनघोर अंधेरा दूर
गुरु बिना जीवन जंजाल बिना गुरु गति नहीं

गुरु तन मन बुद्धि चित्त चंचल चमक दमक
गुरु चांद बिखेरे चांदनी बिना गुरु गति नहीं

गुरु गंध फल फूल गुलाब की महक महान
गुरु तेज ताप आप बिना गुरु गति नहीं

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु शिव सुंदर सुक्ष्म
गुरु की महिमा निराली बिना गुरु गति नहीं

गुरु अमृत रस पान कराता निचोड़ सार ‘कागा’
गुरु तीन ताप हरे बिना गुरु गति नहीं

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा

पूर्व विधायक

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