जो मुमकिन हो | Ghazal Jo Mumkin ho

जो मुमकिन हो

( Jo Mumkin ho )

मिलो जिनसे कभी, लहजा नरम रखना,
जमीं पर तुम सदा अपने कदम रखना ।।

बहक जाए नहीं इकदाम इशरत मे,
अदावत में ज़रा अपना करम रखना ।।

मुलाक़ातों का होगा सिलसिला कायम,
मिलें नजरें तो आँखो मे शरम रखना।।

बनाकर दूरिया चलना मुहब्बत में,
फसाने मे हकीकत का भरम रखना ।।

नसीहत आज करता है ‘धरम’ सब को,
जो मुमकिन हो मिजाज अपना नरम रखना ।

डी के निवातिया

डी के निवातिया

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