‘रजनी’ के दोहे | Rajni ke Dohe

पहले जैसे अब नहीं

पहले जैसे अब नहीं, घर चौबारा गेह!
गली गाँव बातें कहाँ, मुस्काता वह नेह?

नयन टुकटुकी बाँध कर, पथ को रहे निहार!
वह रिमझिम बारिश कहाँ, गया कहाँ वह प्यार?

दीपों की टिमटिम मदिर, मलिन वदन का फूल!
भँवरों का गुंजन नहीं, कहाँ सरित का कूल?

चित्र उकेरे भित्ति पर, याद करूँ हर बैन।
बरगद की शाखा सरिस, लंबी बैरन रैन।।

गुरु पूर्णिमा पर ‘रजनी’ के अट्ठारह दोहे

कच्ची मिट्टी के घड़े, गढ़ता यथा कुम्हार।
गुरुवर वैसे ही करे, निज शिष्यों से प्यार।।

जीवन के हर मोड़ पर, प्रियतम गुरु की सीख।
कदम- कदम पर थामते, हो कोई तारीख।।

गुरुवर से मिलता हमें, सदा ज्ञान – भंडार।
पूजन श्रद्धा से करें, खुशियाँ मिलें अपार।।

मातु- पिता गुरु हैं प्रथम, ईश्वर का उपहार।
सत्संगत गुरु से मिली, यही बड़ा उपकार।।

गुरु का मैं वंदन करूँ, तिलक लगाऊँ माथ।
पावन- सा अंतःकरण, हर पल देते साथ।।

गुरुवर का सम्मान जो, रखते हैं सिर माथ।
ईश्वर धरता है सदा, उन पर अपना हाथ।।

बहुत अनोखी गुरु लगें, रहती जिनके पास।
अभिवंदन उनका करूँ, वह हैं मेरी सास।।

एक बार फिर आ गया, गुरु का दिवस विशेष।
कुसुम कमल गुरु के चरण, धरें प्रेम का भेष।।

गुरु हनुमत जैसे महा, देते हैं वरदान।
तेज बुद्धि विद्या तथा, करते हैं बलवान।।

परशुराम चाणक्य गुरु, आदि शंकराचार्य।
परमहंस शौनक तथा, रामदास औदार्य।।

पग- पग पर शिक्षा सदा, देते छोटे बाल।
आँखों का पर्दा खुले, अद्भुत करें सवाल।।

जगदपिता जगदीश्वरं, कृष्ण चंद्र अवतार।
वंदन जग के गुरु परम, करते बेड़ा पार।।

कुछ गुरु द्रोणाचार्य सम, रखें राजसी ठाट।
एकलव्य के हाथ से, लिया अँगूठा काट।।

कठिन तपस्या रत हुए, जीव बृहस्पति देव।
तुम देवों के गुरु बनो, बोले शिव स्वयमेव।।

जगजननी जगदंबिका, दुर्गा मेरी मात।
शंकर गणपति साथ में, रवि गुरुवर सौगात।।

माता मेरी शारदे, करतीं कलम प्रवीण।
वही सृजन की चाशनी, गुरु बन रखें तुरीण।।

मिला सहारा ज्ञान का, दिया सदा वरदान।
गुरुवर स्वामी की करूँ, महिमा का गुणगान।।

ऋषि वशिष्ठ की अर्चना, रघुकुल में गुरु- भेष।
संदीपनि गुरु द्रोण भी, विश्वामित्र विशेष।।

दोहा छंद

मंगलमय हो वर्षनव, मंगलमय हों वार।
सजी रहें खुशियाँ सदा, पूरे साल हजार।।

स्वागत हो नववर्ष का, खुशियों की बौछार।
ईर्ष्या की बातें नहीं, दिल में हो बस प्यार।।

करना पशुपतिनाथ प्रभु, पूर्ण हमारे काज।
वंदन श्रद्धा से करूँ, आप बचाएँ लाज।।

सिकुड़ रहा है ठंड से, गोरी तेरा गात।
बिछुड़ न जाना शाम को, घात लगाये रात।।

नैन नगीनेदार हैं, कजरारे रतनार।
मत उलझो इनमें पिया, नैना करते वार।।

आया है नववर्ष

नवल किरण धारण किए, आया है नववर्ष।
सदा सहायक हों प्रभो, बना रहे उत्कर्ष।।

करना माँ नववर्ष में, हम सबका कल्याण।
हरो सकल संताप – दुख, हों हर्षित मन – प्राण।।

सारी विपदा अब टलें, भागें सारे रोग।
हिल – मिल कर हम सब रहें, बना रहे संयोग।।

‘रजनी’ के भक्तिमय दोहे

बुद्धिप्रवर बुधवासरः, पूजूँ गणपति देव।
मंगलछवि शुभदायकः, जपता उर अतएव।।

दोहा लिखने मैं चली, गणपति देना साथ।
रहें भवानी दाहिने, लिए कमल- दल हाथ।।

गुरु को चिट्ठी में लिखा, हरें कलुष-संताप।
मैं अज्ञानी पातकी, पथ के दीपक आप।।

कहते देवी ज्ञान की, हंसवाहिनी मात।
बुद्धि विमल रहती सदा, यथा पंक जलजात।।

वन्दन है माँ शारदे, पुस्तक-वीणा साथ।
वरदहस्त शुभदायिनी, जगमग कर दो माथ।।

सदा रहे मम तूलिका, शारद माँ के हाथ।
हे विद्या-वरदायिनी, कभी न छोड़ें साथ।।

वरदहस्त वरदायिनी, वर्णातीत बखान।
व्याख्याती विरदावली, माँ वल्लरी महान।।

‘रजनी’ के १९ राम-भक्तिमय दोहे

पावन तेरा धाम है, पुरुषोत्तम है नाम।
हो जग के आदर्श तुम, हृदय विराजो राम।।

तुम सम जग में कौन है,दुखभंजन हे राम।
जगवंदित स्वीकार लो,मम करबद्ध प्रणाम।।

दुखहर्ता हे राम तुम,करना भव से पार।
सरयू का तट जब मिले,तब होगा उद्धार।।

सुखद राम का नाम है,रहूँ शरण श्रीराम।
दया करो अब तो प्रभो,रटती आठों याम।।

लगन लगी है राम की,राम राम अरु राम।
‘रजनी’ मनका फेरती,राम तुम्हारा नाम।।

बैठीं उपवन में सिया,हृदय बसे श्री राम।
तिनके को ही देख कर,पग ले रावण थाम।।

रावण रावण ही रहा,बन न सका श्री राम।
एक मुक्ति की चाह में,लिया बैर को थाम।।

गृह-भेदी भी क्या करे,बसा हृदय में राम।
लगन लगी थी राम में,चला छोड़ कर धाम।।

रावण जैसी साधना,रावण-सा उद्धार।
मुक्ति-धाम के हाथ ही,मिला मुक्ति का द्वार।।

१०

दंभ-द्वेष अरु लोभ ही,रावण के प्रतिकूल।
पुरुषोत्तम श्रीराम ने,क्षमा किया हर भूल।।

११

राम सदा से जानते,भरे भले हुंकार।
रावण अंतस् से करे,उनका ही उच्चार।।

१२

कुंभकर्ण के हृदय में,बसा राम से नेह।
उठ कर देखूँ तो जरा,जब तक है यह देह।।

१३ 

लिखी हुई थी भाग्य में,मुक्ति राम के हाथ।
शरणागत-वत्सल सदा,बनते दीनानाथ।।

१४

पछताया था अंत में,बच जाते कुलदीप।
दंभ छोड़ कर राम के,होता अगर समीप।।

१५

राम सदा ही राम थे,रावण का क्या काम।
अपने सद्गुण से हुए,पूजित जग में राम।।

१६ 

काम राम के आ सके,जीवन है वह धन्य।
सुरगण मुनिगण पूज्य हैं,रखना प्रीति अनन्य।।।

१७

रावण को रावण कहा,रूठ गया था मित्र।
खड़ा हुआ फिर सामने,संकट बड़ा विचित्र।।

१८

पाहन हो यदि यह हृदय,तरल करें रघुनाथ।
जयकारा प्रभु राम का,देंगे फिर वह साथ।।

१९ 

चित्र हृदय में राम का,मुख से निकले राम।
ऐसे रावण को किया,भ्राता सहित प्रणाम।।

रजनी गुप्ता ‘पूनम चंद्रिका’

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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