श्रीमती उमेश नाग की कविताएं
सुनो है! मेरी राधा रानी,
सुनो है! मेरी राधा रानी,
तुम बिन मेरा नही कोई साथी।
मौसम चाहे कैसा भी हो,
सभी प्राकृतिक समय का
मैं ही कर्ताधर्ता।
सावन भादो न ही सही,
अभी पोष माह का जोर-
सहना होगा।
हम तुम मिलकर समस्त,
जग वासीयों का शिशिर से
बचाव करना होगा।
सभी प्राणी चर अचर, मानव
एवं प्रकृति का रक्षण करना होगा।
मैं ही जगतपिता हूं,
सर्व ब्रम्हांड को सुख शांति व
स्वस्थ सुंदर स्वास्थ्य देना मेरा
ही कर्त्तव्य है
घर घर पधारे गजानन जी
घर घर पधारे गजानन जी,
सर्वत्र जहां में धूम मचाऐं ।
सुंदर सजाऐं गहने और पुष्पों
से इन्हें सजाऐं ।
मोदक प्रिय दाता को हम,
दाल बाटी चूरमा का भोग कराऐं ।
ढोल नगाड़े और मंजीरे बजाकर,
स्वागत से इन्हें घर पर लाते।
रिद्धि सिद्धि व शुभ लाभ संग लाते,
मूषक वाहन पर सवारी कर आते।
अद्भुत सजता नौ दिन मन्दिर इनका,
दसवें दिन इनको साज बाजे सहित विदाई देतें।
जय गणेश जय गणेश देवा,
माता थारी पिता महादेवा।
” अंतरिक्ष “
अंतरिक्ष असीमित एवं
विशाल है,
इसका आदि न अन्त है।
सूरज चांद व सितारें,
अंतरिक्ष में स्थित हैं सारें।
सूरज ग्रहों का केन्द्र बिन्दु है,
लगातें सभी इसका चक्कर।
चांद लगाए पृथ्वी का चक्कर,
धरा घूमती अपने पथ पर।
अन्तरिक्ष तो विशाल व अनन्त है,
इसका कोई अन्त नही है।
कोई भी इसका भ्रम न जान पाया,
न कोई ज्ञानी, ज्योतिष व संत।
मन करता है में खुद जाऊं,
अन्तरिक्ष की सैर कर आऊं।
अन्तरिक्ष की मैं मिट्टी लें आऊं,
वैज्ञानिक मैं बन जाऊं;
अन्तरिक्ष को एक मिशन बनाऊं।
धरा से इतर है कोई सभ्यता भाषा,
इनका मैं पता लगा आऊं।
मिल जाए यदि मुझे ‘ एलियन ‘
बैठ उसके साथ खूब गप्पे लगा आऊं।
अपने साथ में उसे लेकर,
पृथ्वी का परिचय करा आऊं।
उसके यान में बैठकर,
उसके घर की सैर कर आऊं।
गजानन मतवाले हो
गजानन मतवाले हो
रिद्धि सिद्धि के दाता।
पूजा तिहारी पहली आपकी,
आन भरो भंडार।
सर्व प्रथम पूजत हम आपको
करते हो सभी देवी देवता की हार।
सभी देवों के घर पहुंचे
हुकूम सुनाया सभी देवी –
देवताओं से ऊंचे हैं गणेश।
विद्या बुद्धि ज्ञान के दाता,
शुभ लाभ के हैं प्रदाता।
रिद्धि सिद्धि के हैं स्वामी,
सब देवों में अग्रणी कहलाए।
शंकर गौरा के परिक्रमा लगाई
बोले गणपति इस में आ गया –
समस्त संसार।
सुनकर ब्रह्मा जी बोले –
है! गजानन आप तो हो,
नेहरा पर देहला।
सभी देवों में पहले होगी
आपकी ही पूजा।
विश्व में नही है कोई तुम –
सा दूजा।
बुद्धि के दाता एवं विघ्न विनाशक
शुभ लाभ और रिद्धि सिद्धि,
संग हो मेरे रक्षक।
पूजित सर्व प्रथम है गणपति,
आन भरो हमारे भंडार।
” स्वागतम जय हो गणेश पधारे”
शिव गौरी के सुत दुलारे
है! गजानन विश्व दुलारे।
अति भोले व मोहक सूरत
मूषक है सवारी तिहारी।
हैं देवों में अग्रणिऐं ” ये “देव,
हर काज में इन्हें सर्वप्रथम पूजें।
रिद्धि सिद्धि के स्वामी हो दाता,
हों सबके भाग्यविधाता।
विघ्नहर्ता मंगलकर्ता-
सकल जगत का संताप भर्ता।
मोदक इन्हें अत्यंत भाते,
दाल बाटी चूरमा बड़े ही –
चाव से खाते।
शुभ लाभ दोऊ सुत को साथ-
लिये घर घर में स्थापित होते।
जय जय है! गणपति देवा
सगरे संत – मानव करें तिहारी –
सेवा।
हरतालिका तीज
सौभाग्य का मिलता आशीर्वाद,
हरतालिका का त्यौंहार।
तीज माता का है यह विशुद्ध पर्व,
महिलाओं के अटूट विश्वास का- त्यौहार।
बना रहे पति को अजर अमर
का आशीर्वाद,
हरतालिका तीज माता का – उपवास।
सदा ही बना रहे पति पत्नी
का विशुद्ध प्यार,
उम्र पति की दिन दुगनी हो
आयु का विस्तार।
शिव गौरी की करें उपासना,
चारों प्रहर करते इनकी हम- अराधना।
बड़े यश और आयु पति की सदैव,
सुख ऐश्वर्य बढ़ता रहे पति –
परमेश्वर का।
हरतालिका तीज माता का
करते हम अराधना।
” पुस्तकें”
ज्ञान का आगार होती हैं पुस्तकें,
जीवन का सजीव आधार होती
हैं पुस्तकें।
मकान और घर वह खिड़की
विहीन है,
जहां पुस्तकों को उचित स्थान
न हो।
पुस्तकों के बिना कमरा आत्मा
विहीन है,
मन अन्त:करण के लिए रत्न जड़ित
आभूषण होती हैं पुस्तकें
ज्ञान का अक्षय भंडार होती हैं –
पुस्तकें,
स्वाध्याय द्वारा विकास पाने
वालों का ,
अमूल्य साधन बनतीं है पुस्तकें।
बदल दे जो जिंदगी की रवानी को
वह, हवा का तेज़ झोंका होती हैं
ये हमारी पुस्तकें।
जो हमें अधिक सोचने को-
बाध्य करें,
सच ‘वे ‘ही हमारी अतुल्य सहायक
हैं ये पुस्तकें।
दुनिया से चले जाने वालों की
अविस्मरणीय,
बन जातीं पुस्तकें।
अमर बना देती हैं चले जाने
वालों को,
उनकी अजर अमर तोहफा हैं
यें पुस्तकें।
” मुस्कान भ्रम है “
मुस्कान ईश्वर आलौकिक छबि है,
इसके पिछे खुशी,दर्द व रहस्य
छुपी होती है।
मुस्कुराता हुआ चेहरा इंसान का
कभी खुशी और कभी गम –
दर्शाता है।
चेहरे पर मुस्कान कभी कभी
भ्रम में डाल देता है।
मीठा मीठा बोलकर व्यक्ति
चेहरे पर अपने मुस्कान लाता
हैं,
सम्भव नही कि वह कोई
अच्छा करने जा रहा है।
साजीशें भी कभी हो सकती
हैं।
कभी गमगीन व्यक्ति भी अपने
चेहरे पर मुस्कान रखता है,
क्योंकि वह गैरों से अपना ग़म
छुपाना चाहता है।
मिठी मिठी बातें बोलकर चेहरे
पर मुस्कान रखता है,
ईर्ष्या व द्वेष के भाव को छुपा
लेता है।
मित्रता में विशुद्ध मुस्कान एक
दूसरे को प्रगाढ़ रिश्ता देती है।
मुस्कुरा के हम एक दूसरे का
विश्वास जीत लेते हैं,
एक सच्ची हंसी और खुशी का
दूसरे के हृदय में रोपण करते
हैं।
अतः मुस्कान एक दिव्य शक्ति
है,
सभी में इसकी आवश्यकता है।
” जो हुआ अच्छा हुआ “
इंसान हैं हम क्यों घबराना,
हिम्मत रख ऐं! दिले जानम।
कर्म करते रहिए फल की इच्छा
मत रख,
अच्छे का फल अच्छा ही होगा।
वेद पुराणों में वर्णित हैं सदमार्ग
की विवेचना ,
ईश्वर के साक्षात दर्शन होते हैं
उनको अपनाने पर।
न कुछ हम लेकर आए दुनिया में,
न कुछ लेकर जाना है।
विसंगति में मत उलझो मित्रों,
यें रंगीन शौखियां यहां ही धरी
रह जाएंगी।
यह जो भी हुआ अच्छा हुआ,
जो भी होगा अच्छा ही होगा।
जीवन तो एक सराय है प्राणी,
सत्कर्म का लेप लगायें जा।
ईश्वर का दिया हुआ है यह –
मुकाम,
जो कुछ हुआ अच्छा हुआ
जो कुछ होता अच्छा ही होगा।
तुम क्या हो, कौन हो तुम
तुम क्या हो, कौन हो तुम
जरा तो मुझे बतलाओ।
कोई हूर या फरिश्ता या
इंसानों में कोई देव स्वरूप हो।
करूं तुम्हारी पूजा या इबादत
जरा तो मुझे बतलाओ।
रागों में तुम राग मल्हार हो-
पुष्पों में सुगंधित लाल गुलाब हो,
साजों में तुम सारंगी सी सरीले हो।
बागों में जैसे सावन की बहार हो
जरा तो बताओ तुम क्या हो।
कागजों में तुम्हें शब्द बना उतारूं
तो तुम पूरी किताब हो।
जीवन में बेहिसाब जवानी –
हो तुम
इत्र में मेरे लिए तुम केवड़े
को खुशबू हो।
बताओं तुम क्या हो।
ख्वाबों में मेरे ईश्वर के भेजे हुए
दिलरूबा फरिश्ते हो।
तुम क्या हो जनाब!
तुम जो भी मेरे लिए खुदा से
कम नही हो।
श्रीकृष्णाय नम:
त्वं नाम ही है आधार,
अखंड काव्यार्चन का-
हुआ आवाहन।
हुआ सनातन धर्म का,
पावन अनुष्ठान।
सर्व प्रतिभागी इस आयोजन में,
निष्ठा और प्रफुल्लित हो हुए,
इस हवन में सम्मिलित।
सभी ने आस्था व नमन भाव से,
किया इसको स्वीकार।
कृष्ण की महिमा का बखानकर
कृष्ण लीला के भावों से ,
ओत प्रोत किया।
ईश कृष्ण के उपदेशों का,
भागवत गीता का भी अनुसरण-
किया।
सभी के भाव एवं लेखनी ने,
कृष्णायन काव्यार्चन को एक,
भक्ति ग्रंथ बना दिया।
आदरणीय पंकज प्रियम जी,
हम सब आपको करते हैं –
कोटि कोटि प्रणाम।
अनन्त बधाईयों के हैं आप पात्र।
हम सबको कर दिया पावन,
तीर्थ यात्रा का पात्र।
” श्रीकृष्ण”
मौजूद हैं हर लम्हें
हर मंजर में।
सुरीली बांसुरी और हो या
धारदार खंजर में।
नदियों को सूखाकर,
रेगिस्तान बना देता है।
लहलहा देता है फसल भी
सूखे बंजर खेतों में।
राधा के प्रेम से जो बंधे हैं,
वही मालिक नीति- रीति से
बंधे हुए हैं।
प्रेम के विषय में जब कोई
पूछता है,
हर तरफ कान्हा संग राधा
का नाम गूंजता है।
मीरा को बस धुन लगी,
गिरधर के नाम की।
अपने चित्त में तुझको धरकर
स्वयं फिरती बेनाम सी।
आसमान में उड़ते परिंदे
आसमान में उड़ते परिंदे
दिखतें हैं अति सुन्दर।
इक स्थान से दूसरे स्थान पर
जाकर ढूंढते अपना दाना व
पानी और विश्राम स्थान।
अपने चूजों को समय पर
खिलाते पिलाते अपने साथ।
जटायु की भांति होंती इनकी
दिव्य दृष्टि,
सही- गलत क्या है उसे भांप
लेते हैं।
जीवित- मृत कौन है सहज ही
भांप लेते हैं।
आसमान में उड़ते परिंदे होते
द्विवजन समान,
सही ग़लत,सच झूठ का लगा
लेते हैं अनुमान।
नभ में उड़ते परिंदे होते सूक्ष्म
दृष्टि वालें,
अपनी भोजन एवं विश्राम –
स्थान स्वयं ढूंढ लेते हैं।
आसमान में उड़ते परिंदे भी
अपनी स्वयं की समझ –
रखतें हैं।
रक्षाबंधन
गई राखी मन हुआ उदास,
भय्या बहना के उत्साह का
त्यौहार।
मिठाईयों का आदान-प्रदान,
कलाई में रेशमी धागों का वास।
सौगात लेकर भाई आऐं ,
भाभी करें अनुपम लाड़।
सभी सदस्य कुटुम्ब कबीलें ,
बलिहारी जायें,
स्वर्ग से आया है यह त्यौहार।
हैं बहन भाई का आपस के प्यार
और बंधन का त्यौहार।
राष्ट्रीय एकता का है प्रतीक है
यह त्यौहार,
भावना- विश्वास का पालन पर्व।
स्वयं ईश्वर मनाते हैं यह त्यौहार,
कृष्ण ने बंधवाई राखी द्रोपदी से।
इन्द्र जब हुए परास्त दैत्यों से,
गुरू बृहस्पति से मांगी राय।
पाकर अभयदान गुरू से,
बंधवाई राखी इन्द्राणी से।
तभी इन्द्र पुनः पायों राजपाट
देत्यों से।
राखी पर स्मरण आते हैं श्रवण
कुमार,
रक्षाबंधन पर घर घर पूजे जाते
हैं श्रवण कुमार।
त्याग बलिदान की अमर मूरत
हैं श्रवण कुमार,
हैं जगत में अनूठा रक्षाबंधन का
श्रद्धा व सम्मान का त्यौंहार।
” आशिकी “
राह में खड़े थे हम,
सामने से मेरे वह गुजरा।
देख उसकी अदा चलने की,
नर्वस हो गये थे हम।
चाहकर भी उनको,
हम पास बुला न सके।
सपने में जब तस्वीर उसकी आई,
नर्वस हो दिल की धड़कन बढ़ गई।
सोचा उन्हें अपना बना लूँ ,
भाग्य से पर ऐसा हो न सका।
सोच में केवल नर्वस आई,
पर ऐ! प्रभु मैं कुछ कर न सका।
देखा न था कभी ऐसा तबस्सुम,
उसकी प्रणय की छाया में रह –
न सका।
क्या करें तकदीर ने साथ नहीं दिया
मैं नर्वस हुआ पर कुछ कर नहीं सका।
चाहकर भी हाले-दिल बयां कर
न सके हम,
नर्वस हो गये थे हताशा में हम।
मेरी आँखों में समंदर –
सीने में तूफान है,
न छेड़ो मुझे नर्वस हूँ मैं।
मुझे खामोश ही रहने दो,
नर्वस हूँ मैं एतबार करो।
मेरी ख्वाहिशों में उड़ान है,
और हौसलों में जान है।
रोको न मुझे मैं नर्वस हूँ,
खामोश रहने दो बहने –
दो आँसू।
मायूसी के चंद लम्हों में
छा जाते हैं,
नर्वसनेस जब कोई नारी –
आशिक को नजर आती है।
श्रीकृष्ण सुदामा की मित्रता
श्रीकृष्ण सुदामा की मित्रता,
जग सारे को भायें,
गरीबी अमीरी जहां आड़े-
न आए।
आत्मा से आत्मा का हो
सम्बन्ध जहां,
वहीं परमात्मा संग साथ में
बस जाऐं ।
दीन हीन जानकर कभी न
छोड़ा साथ,
पग सुदामा के धोय के,
कर दियों उनको उद्धार।
बोलो श्रीकृष्ण परमात्मा –
की जय।
” मित्रता “
मित्र वही जो खुलकर बोले,
हिय की बात भी मुंह पर खोलें।
नही छुपाए कोई बात,
देता हर सुख-दुख में साथ।
प्यार का मधुरस घोलें,
मित्र वही जो खुलकर बोले।
हर कष्ट में वो अपना समझे,
बनकर सच्ची राह दिखायें।
होकर निश्छल मन का भोले,
मित्र वही जो खुलकर सच बोलें।
हाथ बढ़ायें और साथ निभाऐं,
ना थकता ना ही थकने देता।
राज दिल का अपना न छुपाए,
मित्र वही जो खुलकर बोले।
खुशी में सहृदय जश्न मनायें,
हर क्षण हरदम साथ निभाऐं।
परिवार का अभिन्न अंग बनकर,
दूर कभी ना छोड़कर जायें।
दोस्तीं
भ्रमण सुबह का
ताजी बयार का
दोस्तों का साथ वाह!
क्या खुशनुमा बात है।
मिल बैठकर जब होंगे
साथ साथ,
आपसी सामंजस्य का
होगा उपहार।
दोस्ती का होता इजहार,
कभी कभी हो जाती है
छोटी सी डिब्बा पार्टी।
सभी की होती हिस्सेदारी,
वाह क्या बात है होती है
दस्तूरे-यारी।
इसी तरह निभती रहे ये
दोस्ती की रस्म अदायगी,
मिटते रहें आपसी मनमुटाव।
मिलते रहें दिल से दिल
बेइंतहा,
प्यार विश्वास बना रहे सदा
पैगाम यही दें दोस्ती।
” शत्रु ”
कभी कभी मित्र मेरा मनमीत
होता था,
आज वही मेरा शत्रु बन गया है।
शक्ल से हंसमुख है पर अन्तर में,
छुरी चलाता है।
साथ चले थे हम दोनों कभी साथ,
आज वही शत्रु बन गया है।
सामने से वो अभी भी मीत बना
रहता है,
पीठ के पीछे शत्रुता का खंजर –
घोपने को तैयार रहता है।
नियत कभी उसकी मेरे प्रति
मित्र की होती थी,
अब तो पीठ पिछे बुराई की आग
लगाने को तैयार रहता है।
वफाओं का मेला अनगिनत थीं,
अब तो जफ़ाओं का झमेला हैं
दर-ब-दर।
भरोसा नही होता है अब तो,
शत्रु ही बन जायेगा मनमीत
अपना।
ईश से प्रार्थना करते हैं कि देंदे
मित्र शत्रु बने नही कभी,
सदा सदा जिगर का दोस्त –
बना रहें।
” दिव्य मित्रता “

है!सखा इतने दिन से तुमने,
न मेरी सुध ली न अपना ही बताया।
बचपन की मित्रता की याद में तुम्हारी,
मैं सदा रो लेता था।
आज तुम आए धन्य हैं भाग्य हमारे,
बाहों में अपनी भर कंठ से लगाया।
बिठा ऊपर दीवान पर सखा को ,
स्वयं बैठे धरती पर कान्हाई।
उल्हाना देते हुए मित्र को,
छुपा न पाये टीस अपने आत्मा की।
देख घाव पांव के अश्रु न रोक –
सके रघुवीर।
धोते धोते पग सखा से बोले कृष्ण
काहे आयें तुम पैदल कटीले-
पथ से।
मोहे खबर देते मैं आ जाता-
तुम से मिलने।
आलिंगनबद्ध हो दोनों सखा,
अपनी अपनी गाथा सुनाई।
भेंट में लायें भूनें चने सुदामा,
मित्र श्याम को खिलायें।
दोनों सखा मिल आजीवन,
परम निहाल हुऐं ।
कारगिल विजय दिवस
26 जुलाई का दिन ऐतिहासिक ,जिस पर पूरे देश को गर्व है।
कारगिल विजय दिवस सेना का,मानो एक पर्व है।
1999 में हुआ युद्ध ये, 60 दिनों तक अविरत जारी था।
पाकिस्तान को किया परास्त भारत ने,26 जुलाई का दिन भारी था।
जांँबाज जवानों ने अपना,तेज बल और साहस दिखाया था।
दुश्मन को खदेड़, कारगिल पहाड़ियों पर तिरंगा लहराया था।
फ़रवरी 1999 में दोनो देशों ने,शांति घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किया।
काश्मीर मुद्दों को द्विपक्षीय वार्ता द्वारा,हल करने का वादा किया।
आपरेशन बद्र से पाकिस्तान सैनिकों को, नियंत्रण रेखा के पार भेजने लगा।
चुपके से, ठंडी के मौसम में,भारतीय चौकियों पर कब्जा करने लगा।
मुख्य उद्देश्य था उसका,काश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़ना।
कैसे भी हों भारतीय सेना को, सियाचिन ग्लेशियर से हटाकर मोड़ना।
अहसास हो गया,भारत को, पाकिस्तान की गंदी चाल का।
भारत ने भी बंदोबस्त कर दिया, फंँसाने उसको जाल का।
आपरेशन विजय के नाम से,200000 सैनिकों को भेजा था।
26 जुलाई को ही भारत ने,पाकिस्तान को वहांँ से खदेड़ा था।
कारगिल की पहाड़ियों पर सेना ने तिरंगा फहराया था।
जय जय हिन्द जय जय भारत का नारा लगाया था।
जो घायल और शहीद हुए सैनिक,उन वीरों पर गुमान है।
कारगिल विजय दिवस पर हमें
स्वाभिमान है।
” ख्वाहिश ”
सौ सौ ख्वाहिशे होती है
दिलों मे,
इनके भी चरित्र होते हैं ।
चाह नही आकाश में
उड़कर जाऊँ मैं-
चाँद पर अपना घर बनाऊँ मैं।
तारों के संग अठखेलियाँ-
कर आऊँ मैं।
चाह नहीं पंछियों के संग संग-
दूर क्षितिज तक घूम आऊँ,
डाल डाल पर फुदक फुदक कर
नृत्त्य करूँऔर मीठे मीठे —
फलों का रसस्वादन कर
आऊँ मैं ।
चाह नही मंगल ग्रह की
सैर कर आऊँ मैं ।
चाह नहीं पहाड़ों पर बैठकर
तप कर आऊँ मैं ।
ख्वाहिश हैं तो बस यही
जरूतमंदो की सेवा मे-
काम आऊ मैं ।
भूखे-प्यासे, अर्थ-हीन ,पैदल-
हजारों मील चलकर जाने वालों,
की हर सुविधाओं का भंडार;
बन जाऊँ मैं ।
चाह है आपदा की घड़ी में,
हर समाधान बन जाऊँ मैं ।
” कारगिल दिवस “
तिरंगें में लिपटा शहीद
मातृभूमि के लिए बलिदान हुए,
जो वीर जवान उनको शत शत
नमन है।
शहीद हुए जो सरहद पर,
तिरंगे में लिपट कर देखो वे-
अजर अमर हुए।
कोटि कोटि सलाम उनको हमारा।
नही दफनाई हैं यादें हमने,
क्योंकि उनकी लाशों पर चलकर
आजादी पाई है।
देश आज स्वतंत्र है,
उनकी ही कुर्बानी से।
इस पीढ़ी में गत पीढ़ी की,
भावनाओं को जगाना भी-
जरूरी है।
उनकी वीरता की गाथायें ,
आज गाना जरूरी है।
उन्हीं की कुर्बानी से आज,
देश हमारा जन मन को अति –
प्यारा है।
इस पर जो शहीद हुए,
तिरंगे में लिपट ‘ वे ‘ स्वर्ग को –
गमन हुए।
उन्हीं की शहादतों पर आज हम,
७६वां स्वतंत्रता दिवस मना-
रहे हैं।
तिरंगे ध्वज का मान और शान,
बढ़ाकर मातृभूमि पर शहीद हुए।
गणपति
गणपति राय: ने जब माता पिता की
चारों दिशाओं से परिक्रमा लगाया,
सकल ब्रम्हांड को नाप लिया।
विश्व को मिला यह ईश्वरीय संदेश,
माता पिता ही हैं मानव का – संसार।
प्रथम पूज्ये गुरु, माता पिता, तत्पश्चात-
किजिऐं सर्वधर्म सर्वकाज।
माता पिता ही होते हैं भगवान,
जीवन हमारा सुधारते देकर –
ईश्वरीय लाड़ दुलार।
नही होने देते हमें हताश,
भोर उठ सर्व प्रथम नमन करें हम;
माता पिता को, तत्पश्चात करें – दूजे काज।
मेरी ग़ज़ल
हमें तुम से प्यार कितना यह
तुम नही जानते,
दिल सम्हालते सम्हलता नही
यह तुम जानते नही।
यादें तुम्हारी हरदम सताती हैं,
भूलना भी चाहें पर भूल
नही पाते।
वो चांदनी रातें,
वो समंदर का किनारा-
तुम्हारे हाथों में हाथ हमारा।
वह इश्किया साथ हम –
भूला नही पाते।
सपनों में तुम्हारा आना जाना,
हमें खुश कर जाना हम
भूला नही पाते।
हमें तुम से प्यार कितना
यह तुम नही जानते।
दिल सम्हालते सम्हलता नही
यह तुम नही जानते।
आओ तुम अगर उजाले-
दिन के,
नही छोड़ेंगे तुम्हें यह तुम
नही जानते।
हमें तुम से प्यार कितना
यह तुम नही जानते।
” सावन में शिव श्रंगार “
श्रावण माह पावन मास,
मन हरण शिव श्रंगार मास।
भाल केश पर अर्धचंद्र है शोभित,
गले में मुंड माला धारी।
हस्त त्रिशूल और डमरू सोहे,
शंख गदा धारी।
वनवासी, दादुर,मोर, पपीहा,
पीहू पीहू टेर सुनाऐं,
सोंधी खुशबू से वन उपवन भी
महक महक जाए।
श्रावण माह प्रेम -आस्था का
हैं प्रतीक,
ले आता समस्त भक्तो को
समीप।
शिव की महिमा अपरम्पार,
समुद्र मंथन कर स्वयं ने किया
विष का पान।
माता गौरी ने कर कठोर तपस्या
शिव शंकर को किया प्राप्त।
शिव भक्त कांवड़ पर लाते हैं
गंगाजल,
शिव शम्भू को श्रद्धा से करते
अर्पित।
भाव भक्ति से समर्पित होता
अन्तर्मन,
सात्विक, वैराग्य व अनुशासित
भाव से पूर्ण रहता मन।
चहुं दिशाओं से संचारित होता
प्राण वायु ,
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड होता है मगन
व आल्हादित।
जय जय है! भोले भंडारी,
समस्त के रखवाले।
मां शारदे इतना उपकार करों
मां शारदे इतना उपकार करों,
हम अज्ञानी अल्प बुद्धि हैं।
सुबुद्धि प्रदान करों है! मां,
हम पर इतना उपकार करों मां,
ज्ञान व अच्छाईयां प्रदान करों।
हम सबके अंतर्मन में,
झंकृत वीणा तार करों मां।
अंदर ऐसा भाव जगाओं,
करें जन जन का उपकार हम।
हम से यदि त्रुटि हो जायें,
उनको क्षमा करों शारदे मां।
हम पर उपकार करों मां,
सुबुद्धि का आगाज रहें तन में,
निर्मल तन और आत्मिबल हो।
शुद्ध करके तन-मन सारा,
सकल विकार मिटादों मां।
प्रज्ञा रूपी किरण पुंज हो मां,
हम तो निपट अज्ञानी हैं।
हल्लो हमारे मन बुद्धि के विकार,
ज्ञान एवं प्रबुद्धता की जोत हम-
नादानों में जगा दो मां।
मां शारदे इतना उपकार करों,
तन मन से हमें प्रबुद्ध और –
सात्विक बना दो मां।
सकल सृष्टि का करें हम कल्याण,
ऐसी दिव्य जोत हम में जगा दो मां।
शिव महादेव
श्रावण मास है पवित्र
मनभावन मास,
शिव गौरी की भक्ति व
श्रद्धा का माह।
हिय में उमड़ता विशुद्ध
शिव शंकर की सेवा भाव।
दूध गंगाजल से करतें अभिषेक,
बेलपत्र, धतूरा और पुष्प चढ़ातें।
चंदन केसर अक्षत से करते पूजा,
भजन कीर्तन आरती भी गातें।
जय जय शम्भू शंकर अविनाशी,
कृपा करो भोले प्रभु के नायीं।
माता गौरी संग आप बिरिजै,
गणपति कार्तिकेय अशोक –
सुंदरी को साथ लिए अपरम्पार हैं शोभा न्यारी।
श्रद्धा भक्ति से करें आरती हम तिहारी,
शत शत प्रणाम करते हैं सर्व
तिन्हु लोक है आपकी।
सावन की छाई है हरीयाली,
धरा ने ओढ़ी है हरी चुनरीया।
शोभित हैं वन उपवन प्रफुल्ल
हुए सारे जल थल नभ सारे।
श्रद्धा प्रेम से नित्य स्मरण – करें गौरीशंकर का,
उद्धार करें प्रभु सकल ब्रह्मांड का।
जय जय है! शिव शंकर प्रभु अविनाशी।
जय जय शिव गौरीशंकर
जय जय शिव गौरीशंकर
जय त्रिलोकी सर्वदुख भंजन ।
स्वीकार करों मम पूजन भक्ति,
बेलपत्र,दूध व गंगा जल से करूं
पूजन आरती तिहारी।
श्री गणेश व कार्तिकेय दोऊ पुत्र,
अशोक सुंदरी पुत्री समेत ५ –
पुत्रीयों के पिता जगतदाता।
सकल ब्रह्मांड के संरक्षक हो,
भूत पिशाच निशाचर निकट-
नही आवें जब जब उच्चारण
नाम करें हम तिहारों
दिजो दान अभय निर्भीकता – को।
सावन माह का अद्भुत आस
सावन माह का अद्भुत आस,
बरखा लाती रोमांचित बहार।
गौरी व शिव की करें अराधना,
इनका और शिवालयों का होता
विशेष श्रृंगार।
सावन भोले शंकर का व्दादश,
ज्योतिर्लिंग ज्योति सावन की
है खास विशेष।
सावन का रहता है इन्तजार,
शिव शंकर के प्रिय बेलपत्र,
भांग धतूरा से करते मनुहार।
सावन में सभी मुग्ध हैं,
क्या नारी व नर,बाल – बालिकायें।
बरखा लाई है बहार,
बागों में झूले पड़े,उत्सव –
मन रहें अपार।
हरीयाली चहुं ओर हैं ,
क्या ही वृक्ष,वन उपवन।
सागर नदी ताल-तलैया सभी,
जल मंत्र-मुग्ध हुए हैं क्या ही-
मानव एवं चर अचर।
सावन के हृदय -हरण ऋतु में
वर्षा रानी अवतरित हुई हैं।
बरखा आकर सावन मास को
कर गई अतिरेक सुहाना,
क्या तो मानव और सर्व चर
अचर जल – थल – नभ ।
समग्र प्रकृति मुस्कुरा उठी है,
नव जीवन का सुख व आनंद
भोग रहीं हैं।
सद्गुरु
गुर्रू ब्रम्हा गुर्रूव विष्णु
गुर्रू देवों महेश्वरा,
गुर्रू साक्षात परब्रह्म:
तस्मै श्री गुरुवे नमः।
” गुरू ही माता है, गुरू ही पिता हैं,
गुरू ही स्वजन है, गुरू ही बंधु है,
गुरूदेव के संतुष्ट होने से कोटि-कोटि पुज्य देवता संतुष्ट होते हैं।
गु- अर्थात अंधकार यानी कि अज्ञानता रूपी अन्धकार,
रू- यह अक्षर प्रकाश, तेज़ का द्योतक है।
यानी जो हमारे अज्ञानता रूपी
अंधकार को ज्ञान के प्रकाश में परिवर्तित करता है,वही ” गुरू ” होता है।
संत गुरू के दोनों चरण आधिदैविक, अधिभौतिक एवं आध्यात्मिक इन तीनों तापों के
निवारण करने वाले हैं। यज्ञ,दान,
तप और तीर्थ इन सभी को पूज्य
गुरू की प्राप्ति के लिए करना चाहिए।
जय सदगुरुदेव
गुरू बिन ज्ञान नही मिलता,
गुरू ही ज्ञान की भागरिथी बहाते।
संस्कारों व मर्यादा का देते ज्ञान,
बुराई पर अच्छाई का पढ़ाते पाठ।
मन मस्तिष्क का तिमिर हर लेतें,
ज्ञान का प्रकाश हृदय व बुद्धि में
प्रकाशित कर देतें।
सद्गुणों को मानव में सम्माहित कर देते।
कोटि-कोटि प्रणाम सद्गुरु को,
माता पिता भी हैं गुरू समान।
माता पिता व गुरू के सिद्धांतों के बने अनुयायी,
कुबुद्धि जीवन में कभी निकट न आऐं ।
” बेटियां “
बेटियां नहीं होती हैं बोझ,
होती हैं फूलों की तरह –
खूशबू चंदन की तरह।
महकती हैं घर आंगन को,
चम्पा, चमेली पुष्पों की तरह।
स्वयं की चहल कदमों से करतीं,
आबाद गृह के सूनेपन को।
ईश्वर की दी हुईं बेटीयां बोझ नहीं,
हल्के करतीं माता पिता के –
जिम्मेदारियों को।
बेटों से कम नहीं होतीं है बेटी,
बेटों का दायित्व है माता पिता –
की सेवा,
आधुनिकता की आड़ में बेटे;
कर जाते हैं माता पिता से दगा।
बेटीयां हमेशा बोझ नहीं,
दायित्व समझती हूं माता पिता –
के प्रति।
जन्मते ही समाज में मार दी
जाती हैं,
बोझ समझकर लड़कियों को।
पुरूष या बेटे अपने कार्य क्षेत्र में,
न पसंद दायित्व को बोझ समझते हैं।
समाज में बेटी को बोझ समझकर,
कोख में ही मार दी जाती हैं।
हिन्दू समाज में दान दहेज के
भय से,
बोझ समझी जाती हैं लड़कियां।
निकम्मेपन में बोझ बन जाती है
जिंदगी,
आत्महत्या करने को आमादा –
हो जाते हैं लोग।
सक्षम व शैक्षिक होते ही संतान
स्वावलंबी बन जाता हैं,
माता पिता के लिए नही होतीं
संतानें।
जीवन में जीविकोपार्जन अति
आवश्यक है,
वरन् बोझ बन जाती है –
ज़िन्दगी
विद्वान हों या साधारण इंसान
या हों संत ,
बिना जीवन के कार्यकलापों के
बोझ बन जाती है ज़िन्दगी।
मानव जीवन में कर्मठता है
आवश्यक,
नही तो बोझ बन जाती हैं –
परिस्थितियां।
सक्रिय रहना मानव का गुण
होना चाहिए,
नही तो बोझ बन जाती है –
स्वयं की जिंदगी।
वामा
वामा अपने शैशव से आगे
गुजरते जा रहीं हैं।
एक अबोध कपोल सी,
आसमां को निहारती,
न गिरने का भय है,
न फिसलने का डर।
यौवन की दहलीज तक,
कदम ब कदम बढ़ती ही
जा रहीं हैं।।
वामा अपने शैशव…
खुद पर नाज़ करती,
कुछ इतराती कुछ इठलाती।
मन में दृढ़ विश्वास लिये,
इक अजीब सी लालसा लिए;
कदम ब कदम अपने ही अंदाज
से शिखर दर शिखर चढ़ती –
जा रहीं हैं।
वामा अपने शैशव..
न किसी सहारे की चाह,
और न किसी उम्मीद पर;
न सहानुभूति न बन्दगी की
बुनियाद पर।
अपनी ही शक्ति व आत्मवि-
श्वास को लिए,
सफलता की हर डगर पर;
अपनी ही अंदाज में कदम –
ब कदम चढ़ती जा रहीं हैं।
वामा अपने शैशव से आगे
गुजरतीं जा रही हैं।
स्वामी विवेकानंद जी
विदेश में जाकर स्वामी जी ने,
विश्व बंधुत्व का संदेश दिया,
प्रेम ही जीवन का असली मर्म ,
हो जीवन में विस्तार ,संदेश दिया।
आध्यात्मिक गुरु दार्शनिक व्यक्तित्व,
वेदांत दर्शन प्रचार प्रसार,
उठो जागो तब तक ना रुको,
लक्ष्य की कल्पना करो साकार।
खुद को कमजोर ना समझे,
दुर्बलता ही जीवन में है पाप,
सत्य कभी ना छिपे छिपाएं,
प्रगट हो जाए अपने आप।
कर्म क्षेत्र है जगत सारा,
निर्बल मन ही है निश्चित पाप।
हर समस्या का निदान है,
प्रेम ही जीवन का राज।
” श्री गुरू”
बिना ज्ञान जियूं कैसे,
अथाह ज्ञान हैं जग में।
बिन गुरु ज्ञान पाऊं कैसे,
दियो ज्ञान मोहे गुरु –
हरि गुण गाऊं मैं।
पाया ज्ञान गुरु से मैंने,
कहलाई मैं ज्ञानी।
ज्ञान मिला धर्म -कर्म करने का,
लक्ष्य बनाया अपने जीवन में –
कहलाई ज्ञानी मैं।
बंधी नही मैं प्राचीन परंपराओं से
दिखावा व झूठी संवेदनाओं से,
भ्रान्ति की डोरी से,
निरंकुश मानसिकता से,
एवं सामाजिक रूढ़िवादिता से।
हैं संस्कार मुझ में शालिनता के,
अतः मैं ज्ञानी हूं।
जो ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं,
मैं वो ज्ञानी हूं,बंधी नही मैं –
किन्हीं भ्रामक विचारों से।
दीन दुखियों के कष्टों-पीड़ाओं
का सहज और प्रेम से,
सेवा करती हूं।
उनके दिलों में बसने की –
तमन्ना रहती हैं मेरे मन में।
असहाय लोगों को सेवा देती हूं,
मैं अपने दिल व दिमाग में;
कभी अंहकार आने नही देती-
क्योंकि मैं ज्ञानी हूं।
ग्रंथो के संग्रहालयों की,
खुशबू रिझाती है मुझे।
ज्ञान का भंडार ढूंढती हूं उनमें
क्योंकि मैं ज्ञानी हूं।
ध्यान व परिश्रम से ज्ञान,
पाया है मैंने उसी ज्ञान से;
सम्पूर्ण जीवन बिताया मैंने।
मैं ज्ञानी हूं यह समझ अतिशय,
ज्ञात है मुझे,
बिना संसाधन के ही साधक
हो जाती हूं मैं।
राह असम्भव या दुर्गम हो,
उसे आसान बना लेती हूं मैं;
क्योंकि मैं मैं अज्ञानी नही,
ज्ञानी हूं मैं।
” ढूंढती हूं अपना वजूद “
भूमि पर ढूंढती मैं अपना वजूद
क्या मैं महान हूं।
मैं हिम से निकली नीर नही,
स्तम्भो पर उल्लेख शौर्य –
आलेख हूं।
धनुष से निकली श्रीराम की
तीर हूं।
मैं मुक्त हूं, सर्वसमर्थ हूं,
इंसान हूं मैं महान हूं।
मैं स्नेह स्पर्श से उपजी,
इक महानतम विशाल हूं।
मुझ पर किसी का वश नहीं,
स्वाधीन और स्वाभिमान का-
प्रारूप हूं।
मैं महान हूं, मैं स्वतंत्र हूं,
कांपते स्वरों के मध्य में –
मैं दृढ़ता अपार हूं।
हां, मैं महान हूं।
कर अखिल मानव सेवा देश में,
प्रकृति का संरक्षण भी कर;
मैंने महानता का खिताब –
पाया राष्ट्र में।
महामहिम राष्ट्रपति व ,
यूनिसेफ द्वारा सम्मान;
पाया मैंने।
ईश्वर की भक्ति, सत्य -अहिंसा
की अनुयाई व पुजारी हूं मैं।
मैं महान हूं, मैं स्वतंत्र हूं।
मैं चाहे जो भी करुं वह,
कभी अव्यवहारिक न हो;
इसका खूब ध्यान रहता है-
मुझे, क्योंकि मैं महान हूं।
यश और अपयश का रखती-
हूं ख्याल हरदम मैं क्योंकि,
मैं महान हूं, मैं स्वाभिमानी;
नारी हूं।
शुभ दिन आया आषाढ़
शुभ दिन आया आषाढ़
शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथ की
रथयात्रा का शुभदिन आया।
भगिनी सुभद्रा संग मौसी के गृह
प्रस्थान किया,
अप्रतिम मनोहारी दृश्य अवलोक
कर जन-मानस अभिभूत हुआ।
जग के उत्थान करने हेतु
अवलोकन करने जग के परम
नाथ विचरण निकले हैं।
भक्ति भाव सहित सभी नर नारी
बालक वृद्ध दर्शन हेतु निकलें हैं।
ऊंच नीच का नही यहां कोई
भेदभाव हैं,
सभी पर अभेद है आशीर्वाद।
तीन लोक समस्त ब्रह्माण्ड के
हो तुम नाथ है! जगन्नाथ स्वामी
किजै प्रेम सद्भाव की वर्षा।
राष्ट्र की सभी बाधाऐं एवं कष्ट
का हरलों ,
भारत को पुनीत पावन करदों ।
जय जय है! जगन्नाथ स्वामी
सकल ब्रह्मांड का उद्धार करदों
जय जय जग के नाथ की।
महकती बरसात
बरसात का क्या कहना है,
इसके शोख का रोमांचित
करना है।
चहकती, इतराती महकती
बरसती आई है,
हृदय में उमड़ा है जज़्बात
मिलन का,
सूने दयार में आईं खुशी के
बयार है।
बुलबुल भी चहकी पपीहा भी
पीहू पीहू गाने लगा है,
पुष्पों की टहनीयां भी आपस
में गले मिल रही हैं।
दामिनी कजरारी चमक रहीं हैं,
मतवालें मेघ रिमझिम बरस
रहें हैं।
आंगन में जल का प्रपात भर
गया है,
मतवालें बालवृंद कागज की
नाव तैरा रहें हैं।
मेढक टर्राते, बगुले खुशी से
तैर रहे हैं,
धरा भी हरित हुई,
मुदित हुए हैं सभी परिजात।
नभ भी आच्छादित हुए कारे
कारे बदरा में ,
जन जन के हृदय में जागी
प्रणय की उमंग,
इठलाती, चहकती रोमांचित
करती आई है बरसात
” अनजान राही “
राह में खड़े थे हम,
सामने से मेरे वह गुजरा।
देख उसकी अदा चलने की,
नर्वस हो गये थे हम।
चाहकर भी उनको,
हम पास बुला न सके।
सपने में जब तस्वीर उसकी आई,
नर्वस हो दिल की धड़कन बढ़ गई।
सोचा उन्हें अपना बना लूँ ,
भाग्य से पर ऐसा हो न सका।
सोच में केवल नर्वस आई,
पर ऐ! प्रभु मैं कुछ कर न सका।
देखा न था कभी ऐसा तबस्सुम,
उसकी प्रणय की छाया में रह –
न सका।
क्या करें तकदीर ने साथ नहीं दिया
मैं नर्वस हुआ पर कुछ कर नहीं
सका।
चाहकर भी हाले-दिल बयां कर
न सके हम,
नर्वस हो गये थे हताशा में हम।
मेरी आँखों में समंदर –
सीने में तूफान है,
न छेड़ो मुझे नर्वस हूँ मैं।
मुझे खामोश ही रहने दो,
नर्वस हूँ मैं एतबार करो।
मेरी ख्वाहिशों में उड़ान है,
और हौसलों में जान है।
रोको न मुझे मैं नर्वस हूँ,
खामोश रहने दो बहने –
दो आँसू।
मायूसी के चंद लम्हों में
छा जाते हैं,
नर्वसनेस जब कोई नारी –
आशिक को नजर आती है।
तुम खुश रहो, मेरे लिए यही काफी है
हमें तुम से प्यार इतना कि
तुम नही जानते,
तुम खुश रहो यही मेरे लिए
काफी है।
तुम्हीं मेरी जिंदगी हो
तुम्हीं मेरे दिलोजान हो।
खुश रहो तुम सदा,
इसी में मेरी भी खुशी है।
सदा ही जीवन में तुम्हारे
खुशीयों की बहार रहे,
कभी भी न गमों के बादल
छायें तुम्हारे ज़िन्दगी में।
तुम खुश हो तो मैं भी खुश हूं,
सदैव ही बसंत बहार रहे तुम्हारे
जीवन में।
जग की सभी खुशीयां हों
तुम्हारे साथ में,
तुम खुश रहो यही मेरे लिए
काफी है।
पहलू में मेरे तुम्हें ही देखती रहूं
नही कोई तमन्ना औरों से –
मिलूं इस जिंदगी में।
तुम खुश रहो,
मेरे लिए यही काफी है।
कौन हो तुम
तुम क्या हो, कौन हो तुम
जरा तो मुझे बतलाओ।
कोई हूर या फरिश्ता या
इंसानों में कोई देव स्वरूप हो।
करूं तुम्हारी पूजा या इबादत
जरा तो मुझे बतलाओ।
रागों में तुम राग मल्हार हो-
पुष्पों में सुगंधित लाल गुलाब हो,
साजों में तुम सारंगी सी सरीले हो।
बागों में जैसे सावन की बहार हो
जरा तो बताओ तुम क्या हो।
कागजों में तुम्हें शब्द बना उतारूं
तो तुम पूरी किताब हो।
जीवन में बेहिसाब जवानी – हो तुम
इत्र में मेरे लिए तुम केवड़े
को खुशबू हो।
बताओं तुम क्या हो।
ख्वाबों में मेरे ईश्वर के भेजे हुए
दिलरूबा फरिश्ते हो।
तुम क्या हो जनाब!
तुम जो भी मेरे लिए खुदा से
कम नही हो।
योग
है योगेश्वर है विश्वेश्वर,
तुमने दिया है यह वरदान;
करें योग दूर करें सभी रोग-
जीवन हो सुदृढ़ व आसान।
है मिला यह ईश्वर से योग,
सुधर जातें हैं लोक -परलोक।
त्रिविध संतापों से करता मुक्त,
जगाता आलौकिक शक्तियों संजोग।
आओ सब सिखें मिलकर,
स्वस्थ एवं निरोगी होकर;
अर्पण करें योगेश्वर को
अपना तन और मन।
दिव्य शरीर बनाता योग,
ईश्वरीय शक्ति का है प्रदाता।
रोग- चिंता व तनाव से देता,
मुक्ति है यह दिव्य योग।
आनंदित – प्रफुल्लित करता,
मानव को ईश्वर से जोड़ता।
दिव्य शक्ति बन परमात्मा में
मिल जाता,
आओ सभी मिलकर सिखें योग
प्रभु से मिलन का बनाऐं संजोग।
” विवाह v/s मौत “
पहले प्यार फिर शादी,
फिर कत्लेआम।
यह कैसा है दिलेयारी,
मारते समय जरा सी भी
शर्म नही आई।
बदनाम किया मोहब्बत को,
जरा सी भी ग्लानि नही आई।
छल कपट जब दिल और दिमाग
में हो,
क्यों शादी के बंधन में बंध कर
जीवन साथी के प्राणों का-
अन्त कर देते हों।
ब्याह जैसे पावन रिश्ते को
नाकाम बदनाम कर देते हैं।
यह तो छल कपट अधर्म है,
उसे विवाह जैसे पवित्र रिश्ते को
क्यूं बदनाम करते हो।
ऐसे घृणित कर्म का अंजाम तो
संगिन पाप होता है,
एक न एक दिन ईश्वर भी इसकी
संगीन सजा देता है।
बारिश
बारिश तेरे कितने नाम,
वृष्टि, वर्षों और बरसात।
बारिश न हो तो सृष्टि का
सृजन न होता,
प्रकृति के रूप में निखार
न होता।
जल का अस्तित्व वर्षों से है,
वर्षा देती हमें जल अपार।
जल से ही पूर्ण होते,
सागर,नदी और तालाब।
जीवित रहते हैं वन उपवन
और इंसान।
वृष्टि ही वन उपवन का रूप
निखारें,
खेत खलिहानों को भी
लहलहायें।
सारे उत्सव और त्यौहार
मनतें जब ‘ मेह ‘ ही दिलों में
उमंग जगाऐं।
जगह-जगह झूलें हैं डलतें
नर नारी हर्षित हो गीत गातें।
रंग बिरंगी पुष्प हैं खिलतें
तितलियों का नृत्य अनोखा:
भंवरे भी उनके साथ गुनगुना
कर मदमस्त गीत गातें।
बरसात का अस्तित्व होता
साकार,
जब इससे उल्लासित होता
हैं संसार।
श्रीकृष्णाय नमः
त्वं नाम ही है आधार,
अखंड काव्यार्चन का-
हुआ आवाहन।
हुआ सनातन धर्म का,
पावन अनुष्ठान।
सर्व प्रतिभागी इस आयोजन में,
निष्ठा और प्रफुल्लित हो हुए,
इस हवन में सम्मिलित।
सभी ने आस्था व नमन भाव से,
किया इसको स्वीकार।
कृष्ण की महिमा का बखानकर
कृष्ण लीला के भावों से ,
ओत प्रोत किया।
ईश कृष्ण के उपदेशों का,
भागवत गीता का भी अनुसरण- किया।
सभी के भाव एवं लेखनी ने,
कृष्णायन काव्यार्चन को एक,
भक्ति ग्रंथ बना दिया।
आदरणीय पंकज प्रियम जी,
हम सब आपको करते हैं –
कोटि कोटि प्रणाम।
अनन्त बधाईयों के हैं आप पात्र।
हम सबको कर दिया पावन,
तीर्थ यात्रा का पात्र।
” पिता मेरे “
पिता मेरे ईश्वर के साक्षात
प्रतिरूप हैं,
वो ही मेरे जन्मदाता
जीवनदाता हैं।
संवारा मेरे जीवन को
कोहीनूर के नगीने के तरह।
ऐसे सांचे में ढाला निकला
जग के सबसे किमती गहना बनकर।
सौभाग्य के ताज में ऐसा गढ़ा मुझे,
अनन्य चमक दमक है शान मेरी,
गौरवशाली ऐतिहासिक इक
नगीना बना मैं।
पिता
जीवन में मेरे दो ही तो महान हुए हैं,
इक माता तो दूसरे पिता हुए हैं।
पिता हैं विष्णु रूप तो माता हैं लक्ष्मी रूप।
दोनों ही हैं पुज्य दोनों की ही सेवा करें,
पाऐं आशीर्वाद जीवन में – फलें- फूलें।
धरती और नभ का यह मेल अनूठा है,
एक पालती है पोसती है
दूजा शिक्षित कर महान बनाता है।
दोनों के संगम से एक इंसान
मानव बन जाता है।
” पिता “
भगवान को तो नही देखा,
वह सारी सृष्टि का संरक्षक है।
उसकी छत्रछाया में –
सारा संसार चलता है।
वहीं तो परम पिता कहलाता है,
उसको तो नही देखा हमने।
हां, भगवान स्वरूप पिता
को देखा है,
वह हमारा जन्मदाता व
जीवन दाता है।
जीनकी छत्रछाया में हम
पलते हैं,
हम सुरक्षित अनुभव करते हैं।
वह संरक्षक है, भरण-पोषण
करता है,
ऐसे ईश्वर स्वरूप पिता को
देखा है।
मार्ग दर्शक है, गुरु है हमारा,
पग पग पर सही राह दिखाता।
मित्रवत व्यवहार है जिसका,
पृथ्वी पर है भगवान स्वरूप
पिता हमारा।
शत शत कोटि कोटि नमन
है हमारा।
सभी ने सपनों की उड़ान भरने
सभी ने सपनों की उड़ान भरने
वायुयान में आ बैठे थे,
हस्तीयां सभी उच्च कोटि की
कहीं किसी में कोई कमी नही थी।
न जाने क्यों श्रापित हो विमान
जमींदोज हुआ था।
समय को समय ने दिया ऐसा झटका,
पल भर में मानव सहित सर्वनाश हुआ।
यान सहित सभी जलकर राख हुए।
मंजिल पर पहुंचने की सभी को थी आस,
कुदरत ने अभाग्यवश बना दिया सभी को राख।
अनहोनी की साया में सौभाग्यवश
जिवित रहा रमेश विशवास,
भारतवासी बना वह सौभाग्यशाली।
मेहसूस हुआ जैसे कबीरदास की
वाणी फलीभूत हुई,
” दो पाटन के बीच में साबूत
बचा न कोय।
ने जाने इसमें सृष्टिकर्ता ने कौनसी
योजना रची थी,
पास अपने पावन आंचल में सभी
यात्रीयों को छुपा लिया।
हैं! मोक्षदाता इतना तो करना हम
पर एहसान,
सभी को अपने स्वर्ग में देना –
स्थान।
यह क्यूं हुआ कैसे हुआ
यह क्यूं हुआ कैसे हुआ
यह सब नही जानते।
रब ने किया या हम से हुआ,
यही तो, बस इतना ही जानते हैं।
कुदरत की घड़ी वो ऐसी आई,
न मानव और ईश्वर की कृपा ही
बचा पाई।
समेट कर ले गई वो हजारों जानें,
जैसे प्रकृति ने करदी हो अपनी
मनमानी।
न जहां ही मिला न रब ही मिला,
बिना सबब के मिट गयें जैसे –
आई थी आंधी।
सोचा भी नही था ऐसा होगा
सोचा भी नही था ऐसा होगा
आसमां में उड़ता विमान बाज
यूं जमींदोज होगा।
सभी सकुशल और खुश थें,
ईश्वर के यूं प्यारे हो जाएंगे।
क्या ज़िन्दगी की शाम ऐसे
निपट जाएगी,
सोचा भी न था कि सपने सजने
से पहले ही तमाम हो जायेगी।
खुशीयों के सपने संजोए थे इन
आंखों में,
सपनों के मेलजोल से पहले ही
सब कुछ उजड़ गया।
जिवित रहते मोहब्बत के खजाने
न काम आ सके,
मौत से पहले ही तमाम हो गयें।
कौन जानता था कि जिंदगी की
नाव इस तरह डूब जायेगी,
साथीयों के साथ हमारी शाम
हो जायेगी।
हजारों टुकड़ों में सिमट गई
खुशहाल जिंदगी,
जिंदा रहने के सभी ख्वाहिशें
इस तरह से दफन हो जाऐंगी।
कौन जानता था कि ईश्वर इस
तरह हजारों को एक साथ –
पेशगी में बुलायेंगा।
नमन है हमारा प्रभु को सभी को
स्वर्ग में मोक्ष का आसन प्रदान
करें।💐 ऊं शांति शांति शांति
” बालश्रम निषेध दिवस “
बाल श्रम नही होता कल्याणकारी,
नाजुक नाजुक कंधों पर पड़ता
हैं बोझ।
गरीबी के कारण परिवार के
दायित्व निभाते यह लोग।
छोटे नन्हे नन्हे हाथों व पांवों के
बल पर करते हैं मजदूरी।
सुबह उठ स्कूल से वंचित रह जाते
मजदूरी करने हैं जाते।
दिन भर पत्थर, ईंट चूना ढोते,
मासूम नाज़ुक कोमल शरीर की
दे देते आहुति।
दो जून की रोटी पानी के लिए
समस्त बाल जीवन की आहुति-
दे देते हैं।
अजब है ईश्वर की लीला,
इन बाल श्रमिकों को प्यार नही।
लोगों की गाली, पिटाई,जूठन
खाने को होना पड़ता है मजबूर।
देश की सरकार व प्रशासन इस
संकट पर करें विचार,
बाल श्रम निषेध कानून पर
गंभीरता से विचार।
भटकते बाल श्रमिकों का करें
उद्धार,
बाल श्रम निषेध कानून को
सख्ती से लागू करें
राष्ट्र के नौनिहालों का करें सम्मान और विकास।
बाल श्रम को रोकथाम के लिए केन्द्रीय सरकार ने ” बाल मजदूरी प्रणाली अधिनियम लागू किया है।
सन् १९७६ से भारत में विश्व बाल
श्रम दिवस १० जून को मनाया जाता है।
” उड़ने दो परिंदों को,
अभी शौख हवा में।
फिर लौट के बचपन के
ज़माने नही आते हैं मित्रों।”
कलम का योद्धा कवि
कवि क्या है जानिए ,
कर्म उसके भरमार हैं।
कवि एक राज है
भावों का शिल्पकार है।
साहित्य का द्वार है,
कल्पनाओं की खिड़की बेशुमार हैं।
ज्ञान का भंडार है,
कवि आसमान है,
वह कलम की उड़ान है।
कवि के कर्म खेत में जैसे,
बीज डालकर पौध विकसित –
होता है,
वैसे ही भावनात्मक क्षण को,
अपनी कल्पना से रचना को
विकसित कर्म करता है।
कवि हर्षित भाव में कविता,
रचता है,
जब रोता है उदवेग में होता है,
तब भी कविता रचता है।
कर्म ही इनकी कविता है,
चाहे विद्रोह की हों या
समाविष्ट की हों।
कवि का कर्म है काव्य,
के माध्यम से राष्ट्र का उत्थान,
विकास एवं भावनात्मक –
एकता व समानता का संदेश दें।
मेहनत व लगन से कार्य करे,
इंसान तो क्या काम है मुश्किल।
कर्म पथ पर चलें तो भाग्य तो,
क्या हाथों की लकीरें बदल-
जायेंगी।
कवि का कर्म जग को अपने,
रचनाओं के माध्यम से जन जन
में राष्ट्रीय भक्ति के भाव –
जागृत करें।
” बुढ़ापा -एक वरदान “
जाने क्यों लोग बुढ़ापे को
बोझ समझते हैं।
बुढ़ापा कोई अभिशाप नही,
यह तो जीवन का मुबारक –
मुकाम है।
जीवन भर की जद्दो-जहद् के बाद,
इंसान के जीवन में,आता है –
‘ बसंत -वृद्धावस्था।’
यहां पहुंच कर इंसान बन जाता
है सम्राट।
क्या घर वाले और क्या दुनिया वाले
सभी देते हैं सम्मान।
पूजनीय बन जाते- ‘ वे ‘ईश्वर के समान।
इन्हें से विचार विमर्श के बाद,
करते घर, पड़ोसी सभी शुभ काम।
ऐसे आज्ञा का पालन करते जैसे,
मां पिता ही नही वरन् दूसरे हैं –
भगवान।
कहते हैं लोग , बुढ़ापा है अभिशाप,
वरन्, अभिशाप नही, है वरदान।
जो लोग पा जाते हैं, बुजुर्गियत –
के लम्हें,
वें लोग होते हैं जगत में भाग्यशाली।
करता है उत्थान – आत्मविश्वास,
और आत्मबल उनका।
तो क्यूं न बांटे अपने अनुभव ‘ वे’,
अपने अनुभव समाज व राष्ट्र के-
हित में।
जियें ‘ स्वयं,’जीवन में जिंदादिली
से,
सिखायें औरों को भी जीना,
जिंदादिली से।
अच्छे संस्कारों का पोषण भी,
करते हैं हमारे बुजुर्ग,
सिखातें बच्चों – युवाओं को,
बने कर्मयोगी जीवन में।
उत्कृष्ट नागरिक बनें,
करें राष्ट्र का उत्थान।
अतः बुजुर्ग नहीं, हैं ये गुरु महान,
अकाल मृत्यु नहीं मरें तो,
मिलेगी बुढ़ापे की सौगात।
पर्यावरण
दूषित पर्यावरण करता,
मानव प्रकृति को बेहाल।
जल दूषित न हो,
रखें इसका पूर्ण ख्याल।
जल ही करता है मानव व
प्रकृति का संवर्धन।
दूषित वस्तु का जल में न करें प्रवेश,
ऐसे जल के प्रयोग से होता सभी
प्राणीयों का विनाश।
दूषित वायु का होता भयावह
परिणाम,
सदैव रखें इस पर गंभीर विचार।
अधिक केमिकल्स का प्रयोग,
करता पर्यावरण दूषित।
पर्यावरण को शुद्ध रखे सदा,
प्रदूषण को भगाना है।
वन उपवनों को संवारें,
हरे भरे वृक्ष व पौधें लगाऐं।
दूषित जल व वायु करते हैं,
प्रकृति व प्राणीयों का विनाश।
पर्यावरण को बचाऐं,
प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाऐं।
सड़ी गली प्रदूषित वस्तुओं को
नही करें एकत्रित घरों में कोई।
दूषित वातावरण का होता है
जग में होता भयंकर प्रभाव।
मानव के मानस न हों –
दूषित विचार,
इससे उपकार व सत्संग का
होता वहां अभाव।
जीवन का हो यही आधार ,
दूषित विचार व व्यवहार का
करदें पार हर इंसान।
जय हनुमत,जय कपीस गुणसागर
जय हनुमत,जय कपीस गुणसागर,
जय तीनों लोक उजागर।
अथाह ही हृदय में हर्षाऐं,
स्वागत श्रीराम के लाने आऐं।
हाथ जोड़ करें यह विनती,
विश्व के समूचे पापाचार मिट जायें।
सजी अयोध्या नगरी दुल्हन जैसी
अवध पुरी में सैंकड़ों दीप जगमगाऐं
घर घर आज बनी हैं स्वर्ग लोक जैसी।
बाजे ढोल, शहनाई ताशे,
केसरिया हो गई है अयोध्या –
अवध पुरी सारी।
जनकपुरी भी सज गई सारी,
दीपोत्सव से जैसे मन रही दिवाली।
जनक दशरथ और तीनों माताऐं,
स्वागत में नैन पांवड़े बिछाए।
झुक झुक लेत बल्लियां,
करत आरती माताऐं अनुपम –
सीयाराम की।
प्रिय हनुमत जी भी साथ पधारे,
सेवक और अंग रक्षक बन आऐं।
जय जय हनुमान गोसाईं,
कृपा करो सब पर गुरुदेव –
की नाई।
” कबीरदास जी “
कबीरदास जी ( 1398-1518 ) एक महान भारतीय एवं विश्व विख्यात कवि तथा संत थे। रहस्यवादी थे,वे भक्ति आंदोलन के निर्गुण शाखा के ज्ञानमार्गी उपशाखा के महानतम कवियों में से एक सम्मानित कवि हैं। वे हिन्दू मुस्लिम दोनों धर्मों के लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत थे।
इनका जन्म वाराणसी में नीरू और नीमा नामक जुलाहा माता पिता से हुआ था।
कबीर ने वैष्णव संत ‘रामानंद ‘ को अपना गुरु बनाया था। कबीरदास जी निराक्षर थे। परन्तु ज्ञानमार्गी शाखा व भक्तिकाल के अद्वितीय संत और कविवर थे।
भाषा अवधी, सुधक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी भाषा थी।
इनका विवाह लोई नामक महिला से हुआ था। इनसे ‘ कमाल ‘व कमली नामक दो संतानें हैं।
अधिकांश विद्वानों के अनुसार का स्वर्गवास 1575 के आस पास मगहर में हुआ था।
कबीरदास जी अशिक्षित थें। उन्होंने अपने लिये स्वयं लिखा है।
” भारी कागद छूयो नही,
कलम गहयो नही हाथ। “
मुख्य रचनाऐं इनकी : –
साखी, सबद , रमैनी…
कुछ प्रसिद्ध दोहे
१.ऐसी वाणी बोलिए मन का
आपा खोये,
औरों को शीतल करें आप ही
शीतल होय।”
२.जहां दया तहां धर्म है,
जहां लोभ वहां पाप।
जहां क्रोध यहां काल है,
जहां क्षमा वहां आप। “
३.कबीरा नौबत आपणी,
दिन दस लेहु बजाइ।
ए,पुर पाटन ए गली,
बहुरी न देखै आइ।”
४.तीरथ गये से एक फल,
संत मिले फल चार।
सतगुरु मिले अनेक फल,
कहे कबीर विचार।
५.निंदक नियेरे राखिये,
आंगन कुटी छावायें ;
बिन पानी साबुन बिना,
निर्मल करे सुहाए।
६.गुरू गोविंद दोऊ खड़े,
काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविन्द दियो मिलाए।”
७.माटी कहे कुम्हार से,
तू क्या रौंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा,
मैं रोंदूगी तोहे।
मुझे मोह गया
भोर का आलम मुझे मोह गया,
अपनेपन का नकाब तब उठ गया।
वक्त का आलम जब हमारे पक्ष-
में होता है,
अपने लोगों का साथ सम्भव होता है।
हर बार हम करते रहे मिन्नतें,
रूख का आलम था कि वो नही लौटे।
मयकशी के आलम में जलते हम
ताउम्र,
ज़िन्दगी झुलस गई पर वो नही लौटे।
अंगारों पर चलना सिखा हमने,
आलम यह रहा कि हम सुरक्षित –
लौट आए।
आलम ऐसा बना कि बर्बाद हुए हम
बर्बादी ने चार चांद लगा दिए हम पर और हम मशहूर हुए।
सारी शिकायतें दूर करदी हमने,
आलम यह रहा कि हम दानदाता –
बन गयें।
खोज में तुम्हारी भटकते रहे,
आलम यह है कि खुद को हम-
खोते रहें।
अंधेरे में भी सिर्फ तुम्हारी तलाश थी
आलम यह हुआ कि दीप सा हम –
ही जलते रहें।
खोज में तुम्हारी हम भटकते रहे,
आलम यह रहा हम खोज में खुद –
को मिटाते रहें।
गीत लिखती हूं मैं तुम्हारे लिए,
आलम यह है कि खुद गाता –
फिरता हूं।
कसमें खाईं थीं हमने संग रहेंगे साथ
आलम यह है कि संग में मरते रहे।
लिख रहे हम प्रेम ग्रंथ अभी,
आलम यह कि तुम संग आ गये और हम अजर अमर हो गए।
गुलाब
गुलाब पुष्पों में राजा,
रंगत इसकी है लाल गुलाबी।
हर कली इसकी होती न्यारी,
रंगों में जैसे सुर्खियां बटोरतीं।
कांटों के बीच यह खिलखिलाती,
हमें पुरजोर आकर्षित करतीं।
प्यार और मोहब्बत की निशानी,
हृदयों को मिलाती बनाती रूहानी।
हर अवसर पर बढ़ाता शांन है,
जश्न में लुटाता मान व शान है।
ईश्वर की पूजा हो या संकीर्तन,
गुलाब पुष्प सबों में शोभा बढ़ाता।
फूलों का राजा है महफिलों की –
शान है,
लोग इसे करते भरपूर इस्तेमाल।
चाचा नेहरू का था चहेता गुलाब,
रखते इसे हरदम अपने अचकन
में।
गुलाब तू है पुष्पों का बादशाह,
जग में है तेरी शोभा न्यारी।
सिंदूर की किमत
सिंदूर की किमत तुमने नही
जानी बाबू,
इस तरह इसे फैलाने से नही
होगा आंतकवाद काबू।
चाहे रग रग में इसे फैला लों,
चाहे पेकिंग में इसे घर घर
पहुंचा दो।
इसकी शोभा तो नारी के
मांग में,
जीवन साथी के हाथों से
नारी के सुहाग का प्रतीक है।
इस भांति इसे जन जन में
बांटना,
जग में हमें शोभा नही देता।
श्री गुरू
बिना ज्ञान जियूं कैसे,
अथाह ज्ञान हैं जग में।
बिन गुरु ज्ञान पाऊं कैसे,
दियो ज्ञान मोहे गुरु –
हरि गुण गाऊं मैं।
पाया ज्ञान गुरु से मैंने,
कहलाई मैं ज्ञानी।
ज्ञान मिला धर्म -कर्म करने का,
लक्ष्य बनाया अपने जीवन में –
कहलाई ज्ञानी मैं।
बंधी नही मैं प्राचीन परंपराओं से
दिखावा व झूठी संवेदनाओं से,
भ्रान्ति की डोरी से,
निरंकुश मानसिकता से,
एवं सामाजिक रूढ़िवादिता से।
हैं संस्कार मुझ में शालिनता के,
अतः मैं ज्ञानी हूं।
जो ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं,
मैं वो ज्ञानी हूं,बंधी नही मैं –
किन्हीं भ्रामक विचारों से।
दीन दुखियों के कष्टों-पीड़ाओं
का सहज और प्रेम से,
सेवा करती हूं।
उनके दिलों में बसने की –
तमन्ना रहती हैं मेरे मन में।
असहाय लोगों को सेवा देती हूं,
मैं अपने दिल व दिमाग में;
कभी अंहकार आने नही देती-
क्योंकि मैं ज्ञानी हूं।
ग्रंथो के संग्रहालयों की,
खुशबू रिझाती है मुझे।
ज्ञान का भंडार ढूंढती हूं उनमें
क्योंकि मैं ज्ञानी हूं।
ध्यान व परिश्रम से ज्ञान,
पाया है मैंने उसी ज्ञान से;
सम्पूर्ण जीवन बिताया मैंने।
मैं ज्ञानी हूं यह समझ अतिशय,
ज्ञात है मुझे,
बिना संसाधन के ही साधक
हो जाती हूं मैं।
राह असम्भव या दुर्गम हो,
उसे आसान बना लेती हूं मैं;
क्योंकि मैं मैं अज्ञानी नही,
ज्ञानी हूं मैं।
वृक्ष
हमारे तुम संरक्षक हो
हरे भरे हो खड़े हो सीना ताने।
भव्य शस्यश्यामल है रूप तिहारा,
लगते कोई हमारे शुभ चिंतक हो।
घने घने हरे भरे पत्तों से सुशोभित,
थलचर -नभचर को आश्रय देते-हो।
शीतल छांव तुम्हारी देती आश्रय,
हर प्राणी हर चर अचर को।
सकल ब्रम्हांड में हो जय जयकार तुम्हारी,
वृक्ष तुम मित्र हो, है तुम्हारी शान निराली।
फल, साग व फूल देते खाने को,
पत्ते खाने देते तुम पशुओं और कीट पतंगों को।
मत काटो को कोई इनको,
देते रहो सदा पानी इनको।
पर्यावरण की संजीवनी है यह,
मौसम को भी रखते वश में।
तुम ही वर्षों लाते, देते जल- जीवन -जग को,
रहते तुम्हीं से हरित वन उपवन।
आकर्षित करते जन के मन को,
लगते लुभावने मत काटो इनको।
वृक्ष हमारे तुम संरक्षक हो,
हरे भरे रहो सदा सीना ताने।
श्रीमान भास्कर
विदित हम आपके ओजस्व से
मगर ना आओ इतने आवेश में।
रूपवान हो ओजस्वी हो,
फिर क्यूं करते क्रोध इतना,
बिगाड़ देते हो सारा चेहरा अपना।
सुंदर गोल मटोल सा चेहरा
टेड़ा- मेड़ा तिरछा कर लेते हो
अपने ही कर्मों से।
अपने ही ताप से कभी जलते
उष्णता से स्वयं भी हैरान होतें।
सम्भव हो तो ताप अपना कम
करों,
तुम्हें भी शीतलता मिलेगी,
हम भी पा जायेंगे राहत।
धरा है बेहाल ५०डिग्री से,
उसको भी तो मिलेगी।
वन उपवन,चर- अचर सभी
बेहाल हुऐं हैं,
ताल तलैया, नदी नाले सभी
सूख रहें हैं
जल बिन तड़प रही हैं मछलीयां।
कृषक सभी भी आस लगाए
बैठें हैं,
कब होगा ताप तुम्हारा पक्षधर
कब होगी कृपा वर्षों रानी पर –
तिहारी।
शिध्र करो है! दया की मूरत,
अपनी तेज कम करो।
हम सजीव- निर्जीव पर एहसान
करो,
अपने ताप को संतुलित रखो।
नारी सक्षम है
ज्यूं हजारों फूल चाहिए
एक माला बनाने में,
ज्यूं हजारों दीपक चाहिए
दिपावली सजानें में,
हजारों बूंदे चाहिए
समंदर बनाने के लिए।
परन्तु एक नारी ही काफी है
घर को स्वर्ग बनाने के लिए।
नारी नही तो सृष्टि लापता,
न नभ का पता न बल का पता।
न प्रकृति का होता नजारा,
न समुद्र में नीर की पहचान – होती।
जब नारी ही ‘ ईश ‘ बन आई,
तब ‘ एडम ‘ संग मिल सृष्टि – रचाई।
दिलों में जो बस जाये वो,
ही सूत्रधार है नारी।
नारी से ही ‘ कायनात ‘ जवान है
मां, बेटी, बहन बहू रूप में,
इनके कदमों में ही जन्नत – मुमकिन है।
“याद आने वाले लम्हे जाने वाले लम्हे”
लम्हे लम्हे लम्हे,
यादों के लम्हे।
कुछ लम्हे जीवन के,
यादगार बन जाते हैं।
लम्हे कुछ जाते जाते,
नयें रिश्ते जोड़ जाते हैं।
ज़िन्दगी रूकती नही,
किसी के आने जाने से।
कुछ लम्हे खामोश हो जाते हैं,
कुछ लम्हे आनंदित कर देते हैं
किन्हीं के आने से।
कुछ लम्हे आनंदित करतीं है,
कुछ लम्हे जीवन में यादें –
छोड़ जाती हैं।
बिछुड़ने वाले लम्हे हमें,
रूला जाती हैं,
आगमन किसी का हमें खुशी
का लम्हा दे जाता है।
ज़िन्दगी अपनों में ही बसती है,
इन्हीं के स्मरण में लम्हें हमारे
गुजरते हैं।
आने वाले लम्हे व जाने –
वाले लम्हे,
सुख दुख का जोड़ा है प्रिय।
कुछ अधूरे किस्सों को हम,
नयी कहानीयों से जोड़ते हैं।
कुछ लम्हे ज़िन्दगी के,
यादों से जोड़ दिए जाते हैं।
चाय
चाय के गौरव का क्या कहना,
नाम आते ही चेहरे पर शबाब आया।
पिलाने वाले साकी की बात
नही टाली जाती,
करके तौबा इसे पीली जाती है।
नीलगिरी की वादियों में हैं,
चाय के बागान।
सुहाना था इसकी आन शान,
रहें थे इक दिन हम इस बाग के –
आशियाने में।
देखें सुबह की धुंध,
बालकनी पर दो गर्मागर्म चाय
की प्यालियां।
हरित पहाड़ियों पर ज़मीं
थी बर्फ की चुनरिया।
देखते ही बनता था,
ईश्वर के मनोरम दृश्य का-
करिश्मा।
साथ में साथी संग गर्मागर्म,
चाय की चुस्कियां।
गरम सांसों के बीच पिघलते
वक्त के सायों में याद आता था,
परिवार और मित्रों का संग।
अहिल्याबाई
मातृभूमि की रक्षा हे हेतु ,
जीवन भर संघर्ष किया।
देश धर्म के खातिर उन्होंने,
अपना पुन्य हर कर्म किया।
प्रजा के हितों को सर्वोपरि
रखने वाली,
रानी अहिल्याबाई होलकर
जगदंबा स्वरूपा थीं ।
अपनी संस्कृति पर गर्व करने वाली,
वो विरांगना परिवर्तन का
सच्चा रूप थीं।
विश्व परिभाषित नही कर
सकता आज भी,
इस आदर्श महिला के अस्तित्व को,
संसार झुठला नही सकता है
यहां, नारी शक्ति के न्यायप्रिय
प्रभुत्व को।
“क्या खूब लिखा है”
आहिस्ता चल जिंदगी, अभी
केई कर्ज चुकाने बाकी हैं।
कुछ दर्द मिटाना बाकी है,
कुछ फर्ज निभाना बाकी है।
रफ़्तार में तेरे चलने से
कुछ छूट गए कुछ रूठ गए,
रूठो को मनाना बाकी है,
रोतों को हंसाना बाकी है।
कुछ रिश्ते बनकर टूट गयें,
कुछ जुड़ते जुड़ते छूट गए।
उन टूटे-छूटे रिश्तों के ज़ख्मों
को मिटाना अभी बाकी है।
कुछ हसरतें अभी अधूरी हैं
कुछ काम और जरूरी है।
जीवन की उलझ पहली को
पूरा सुलझाना बाकी है।
जब सांसो को थम जाना है,
फिर क्या खोना, क्या पाना है।
पर मन के जिद्दी बच्चे को –
यह बात बताना बाकी है।
आहिस्ता चल जिंदगी अभी
केई कर्ज चुकाना बाकी हैं,
केई दर्द मिटाना बाकी है।
कुछ फर्ज निभाना बाकी हैं।
भारत मां को समृद्ध खुशहाल
बनाना बाकी है।
जरा आहिस्ता चल जिंदगी
अभी केई कर्ज -फर्ज चुकाना –
निभाना बाकी है।
देश में छाई अराजकता व,
संवेदनहीनता का उन्मूलन –
करना बाकी है अभी।
जरा आहिस्ता चल जिंदगी
अभी केई कर्ज चुकाने – बाकी है।
कुछ फर्ज कर्ज बाकी हैं,
कुछ दर्द मिटना बाकी है।
जरा आहिस्ता चल ऐ! जिंदगी,
अभी केई कर्ज चुकाने बाकी है।
खुशहाली का जशन मनाना – बाकी है,
रामराज लाना बाकी है।
अतिथि
ईश्वर हो अगर मेहरबान,
अतिथि भी है भगवान।
हर आत्मा है अंश परमात्मा का,
तो अतिथि में भी हैं दर्शन ईश का।
इस पावन धरती पर,
ऐसी पावन भावना का।
प्रभु ने दिया जन जन को संदेश,
‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ‘ हो विश्व का
उद्देश्य।
कौन है अपना कौन पराया,
सब है यह सोच की सरमाया।
सभी हैं एक ईश्वर के बन्दे,
सभी में एक ही ईश्वर समाया।
क्यों ना हो? आत्मा से आत्मा
का सत्कार,
‘ अतिथि देवो भव:’ का नारा
हो साकार।
वसुधैवं कुटुम्बकम् बना मजाक
आज जमाने में,
भागम भाग की जिंदगी में,
महंगाई के दौर में;
इंसान तन्हा व ठगा सा रह गया है –
किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है।
एकल परिवार की परंपरा भी,
आज जीवन का सुख शांति
निगल रही है;
हर शख्स परेशान सा नजर आता है।
भूल गया है संयुक्त परिवार का
चलन,
सबका साथ सबका हाथ;
सबका सहयोग सबका प्यार।
बनाता है जीवन को आसान एवं
खुशहाल,
जाने क्यों भूल गया इंसान।
आत्मिकता का यह रिश्ता,
ममता व सांझेदारी का यह
एहसास।
यही जीवन को सहज व सरल
बनाता है,
सम्बंधो का अपनापन बड़ा ही
काम आता है।
बोझिल व बेरंग जीवन को भी
हल्का व रंगीन बनाता है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,
एकल कुटुम्ब की बोझ तले घुट-
घुटकर मर जाता है।
संयुक्त कुटुम्ब में रहकर जिंदादिली
से जीवन व्यतीत करता है।
दिल और दिमाग

दिल ही तो है मेरे दिमाग चलाता है,
मैं यह कर लूं या वह कर दूं।
हर क्षण कुछ न कुछ सोचता है
दिल ही तो है, दिमाग पर हुकूम- चलाता है।
अच्छे बुरे की उसको कोई परवाह नहीं,
बस दिल ने जो चाहा वह कर लिया।
दिमाग के सोच का उसे कोई
लेना देना नही।
पर कभी सोचा भी नही था,
यह तो ‘ बोस बनकर ‘समस्त
शरीर व जीवन को चलाता है।
दिल की सुनता पर करता
अपने मन की है।
कहा जाता है कि दिल व
दिमाग का जब सही हो – दोस्ताना,
हर बात और व्यवहार बन
जाता है प्यार का खजाना।
व्यवहार एवं प्रमाण है कसौटी दिमाग की,
प्यार और रूचि है तराजू दिल की।
दिल से चलने वाले अक्सर
का जातें हैं धोखा,
सावधानी का उपयोग करते हैं
अक्सर दिमाग वाले।
दिमाग से काम लेते हैं जो इंसान,
दिल से काम लेने वालों पर
पड़ जातें हैं भारी
यूं तो दिल और दिमाग रहते
हैं इक शरीर में साथ साथ,
परन्तु चलते हैं एक दूजे के अभिन्न।
दोनों हैं एक दूसरे के पूरक,
दिमाग जो कहता है वह
दिल करता है।
परिवार दिवस
परिवार से बढ़कर कुछ भी नही,
यह छोटा सा संसार हमारा देता
हैं खुशीयां अपार।
सुख दुख सभी हैं इसमें,
नही है कोई अनजान।
सुख की बेला में रहते हैं सभी
खुश व चिंता से अपार।
दुख की घड़ी में न होता है कोई
अकेला सभी होतें हैं साथ।
सुख दुख लाभ हानि सभी की
होती संवेदना परस्पर एक।
सभी मिलजुल कर रहते हैं,
स्वर्ग बन जाता है वहीं परिवार।
सत्य व शौर्य के लिए
तू युद्ध कर तू युद्ध कर,
प्राण की तू न परवाह कर;
सत्य व शौर्य के लिए –
तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
नही झूका है कभी कोई
देश का वासी,
शत्रु को ही मारकर सांस
लें रहें हैं हमारे सेना वासी।
तू युद्ध कर तू युद्ध कर ,
झुका है कभी न यहां कोई
ना झुकेगा कभी।
राष्ट्र के उत्थान और सम्मान
के लिए तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
शत्रुओं को मारकर सांस ले रहे
हैं हमारे सेनानी,
झुका है ना कभी झुकेगा –
देशवासी।
तू युद्ध कर तू युद्ध कर,
प्राण न परवाह कर।
पाक के नापाक हरकत को
तू नेस्तनाबूत कर,
हिन्द के तिरंगे का आज तू
मान बढ़ा।
तू युद्ध कर तू युद्ध कर
प्राण की न परवाह कर।
देश के शौर्य और पराक्रम
के लिए,
तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
प्राण की न परवाह कर,
राष्ट्र के उत्थान व मान के
लिए तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
मां मेरी त्रिदेवी
मां साक्षात त्रिदेवी स्वरूपा,
सरस्वती लक्ष्मी व दुर्गा।
सरस्वती रूप में शिक्षित
करतीं,
लक्ष्मी रूप में अन्न,धन वैभव
संचित रखतीं।
दुर्गा रूप में हर आपत्ति एवं
विपत्तियों का विघटन करती हैं।
घर गृहस्थी सभी उसकी कायल,
पूज्यनीय होती है वह गृहस्वामीनी।
हर क्षेत्र जीवन में होती वह निपुण
दायित्वों व सेवा में बिताती है
अपना सब कुछ सम्पूर्ण।
बंधी नही है गृहकार्यो में अब,
जीवन के सकल क्षेत्र में भी
प्रमुख नायिका बन निभाती
अपना रोल।
गृह, शिक्षा, सामाजिक और
राजनीति अब नही इससे दूर।
हर क्षेत्र में निभाती अपना दायित्व
जैसे स्वयं हो त्रिदेवी और –
त्रिदेव।
मां मेरी है अनुपम उपहार
सारा जग इससे जाता है हार।
” गौतम बुद्ध और उनकी शिक्षा “
गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई०पू० कपिलवस्तु में लुम्बिली में हुआ था।
यह स्थान नेपाल में है। बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में घर गृहस्थी को त्याग दिया था। अपनी पत्नी व बेटा
राहुल का परित्याग कर दिया था।
दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में ही
राजपाठ का मोह त्याग दिया था।
संसार को जरा,मरण व दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य
ज्ञान प्राप्त लिए संन्यास ले लिया।
वन में जाकर अनेकों वर्षो तक कठोर तप किया। तत्पश्चात बिहार के बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया।तब से वह सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गयें। इतिहासकारों के अनुसार बुद्ध का जन्म 1887 में हुआ था।
बुद्ध की शिक्षाऐं -( पंचशील शिक्षाऐं )
1.श्रेष्ठ होना मनुज तो,शील सब पालन करो।
2.दुख नही जीवन में बचेगा,धैर्य तुम धारण करों।
3.झूठ, हिंसा,वासना के निकट रहना नही,मत करो चोरी, नशा तुम।
4.दुख रहे तो बचना नही,
व्यस्त हिंसा में रहें जो,
मिल उसे समझायें।
5.डाकू अंगुलिमाल गाथा,
सब उन्हें बतलाइए।
6.जान कुदरत ने दिया है ,
कोई को होए शक नहीं।
7.दे नही सकते जो सांसें,
छीनने का हक भी नही।
8.पाप हो जग में चोरी करना,
हम सभी पढ़ते रहे।
पर सजा पाते नही जग में ,
कम नहीं अपराध है।
9.खा रहे हक गैर का जो,
अति खराबी साध है।
10.वासना सागर उफनता,
फिर लहर उठती रहे।
नर नारी संसार में हों
सब नियम का पालन करें।
11.जग में जो मिथ्यावादी रहतें
अन्त में पछताते रहें।
12. सब धरा के मुसाफिर हैं,
यहां टिकना नही।
13.झूठ में सत्ता जगत की
पर तुम्हें बिकना नहीं।
14. नशा जग में सबसे बुरा,
15. हो दुराचारी अधिकता,
गलतियां करते फिरें;
यदि सुधरा नही जगत में –
एड़ियां घिसता मरें।
आदि आदि अनेक शिक्षाऐं दी हैं संसार को बुद्ध ने।
मां ओ प्यारी मां
मां ओ प्यारी मां
मुझे अपनी कंधों के
सहारा दे सुलाती हो।
मधुर मधुर लौरी गाती हो
मेरी पीठ पर हल्के हल्के हस्त
से थपथपाती हो।
मैंया सपनों की दुनिया में मुझे
सुंदर सुंदर दृश्य दिखाती हो।
स्वप्नों की आलौकिक दुनिया में,
विचरण कर मंत्रमुग्ध हो जाता हूं।
मां ओ प्यारी मां,
मुझे अपनी कंधों का
सहारा दे सुलाती हो।
तुम जग की सबसे प्यारी,
न्यारी मेरी दौलत हो-
ओ! मां तुम मेरी सर्वस्व हो।
मां
पृथ्वी पर है अनमोल आत्मा
होती हैं मां,
रचियता,रक्षक और गुरु
होती हैं मां।
असत्य से सत्य की ओर
ले जाती है मां
बुराईयों से अच्छाई को ओर
ले जाती है मां।
मां है तो घर में रौनक होती है,
घर का अस्तित्व है मां।
मां घर आंगन की धड़कन है,
घर में एक दिव्य फरिश्ता
है मां।
दैवीय शक्ति का एहसास
देती है मां,
पृथ्वी पर ईश स्वरूप
प्रतिनिधि है मां।
ईश्वर करूणा सागर है तो
करूणामयी व ममतामयी,
होती हैं मां।
संतान के कष्ट व दर्द को
स्वयं अनुभव करती है मां।
हर दुख पीड़ा में मुख से मां,
ही निकलता है।
करूणा और ममता के एक
स्पर्श से कष्ट व दर्द हर –
लेती है प्यारी मां।
त्याग की मूरत होती है मां,
अपने हिस्से का भी सब
कुछ न्यौछावर कर देती –
है सम्माननीय मां।
स्वयं गीले पर सो जाती है
सूखे में शीशु को सुलाती
है मां।
हमारा देश
दूर हटो ऐं! दुनिया वालों
यह देश भारत हमारा है।
जिसने भी की इसके साथ
गद्दारी उसे नही बख्शा हमने।
उलटे पांव भागा या फिर वो
मरा यहां दी अपने प्राण की- बली।
बच्चा बच्चा इस देश का सिपाही है,
चौकस रहता करता राष्ट्र की- रखवाली है।
दूर हटो ऐं! दुनिया वालों
यह देश हिंदुस्तान हमारा है।
आंच न आने देंगे इस पर,
सप्राण समर्पित हो जायेंगे,
दूर हटो ऐं! दुनिया वालों यह देश हमारा है।
तू युद्ध कर तू युद्ध कर
तू युद्ध कर तू युद्ध कर,
प्राण की तू न परवाह कर;
सत्य व शौर्य के लिए –
तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
नही झूका है कभी कोई
देश का वासी,
शत्रु को ही मारकर सांस
लें रहें हैं हमारे सेना वासी।
तू युद्ध कर तू युद्ध कर ,
झुका है कभी न यहां कोई
ना झुकेगा कभी।
राष्ट्र के उत्थान और सम्मान
के लिए तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
शत्रुओं को मारकर सांस ले रहे
हैं हमारे सेनानी,
झुका है ना कभी झुकेगा –
देशवासी।
तू युद्ध कर तू युद्ध कर,
प्राण न परवाह कर।
पाक के नापाक हरकत को
तू नेस्तनाबूत कर,
हिन्द के तिरंगे का आज तू
मान बढ़ा।
तू युद्ध कर तू युद्ध कर
प्राण की न परवाह कर।
देश के शौर्य और पराक्रम
के लिए,
तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
प्राण की न परवाह कर,
राष्ट्र के उत्थान व मान के
लिए तू युद्ध कर तू युद्ध कर।
सिन्दूर
सिन्दूर नही है यह है आग का प्रतिबिम्ब है
आकाश से समापन हो जायेगा
यह पाक का आतंकी अड्डा।
भारत के पराक्रमी योद्धा झटके से,
रूला देंगे घुसे पाकिस्तानी चोर,
अभिमान इनका हो जायेगा चूर।
रोकेंगे तब जनता इनकी मुनीर-
शरीफ और मुशर्रफ के संग।
नमन है नारी के सिन्दूर का
जिसकी शक्ति से आज हमारा
दुश्मन पाकिस्तान डर गया।
ऑपरेशन सिन्दूर
वाह वाह क्या बात है,
ऑपरेशन सिन्दूर बन आई है।
अब नही है हमारी विजय दूर
दुश्मन हमारा हो अब चूर चूर।
भारत महान है दूरद्रष्टा है जग में
शत्रु पर करता प्रहार धड़ विहीन कर देता है।
बुजदिल नही जो करें निहत्थों पर प्रहार,
सश्स्त्र रणभेरी बजाकर करता वार।
दहल उठी अब ‘ पाक ‘की चाल,
चहुं दिशाओं में मचा है हाहाकार।
हिल गई पाकिस्तानी आर्मी –
ठिकाने जनता हुई बेहाल।
आत्मिक शांति हुई है अब,
उन छब्बीस निर्दोष प्राणों की।
नही छोड़ा उन बुजदिल नकारा आतंकीयों को,
घात लगाकर चुन चुनकर
संहार किया उन बहिशीयों का।
यह आजाद राष्ट्र भारत है,
इस पर हमें अभिमान है।
हम देशवासियों से न लेना पंगा,
शूरवीर हम हैं महाराणा की संतान।
एक एक से लेंगे बदला भूला- देंगे,
तुम्हें करना संहार और करना अमर्यादित दंगा।
त्रेतायुग और द्वापरयुग में क्या अन्तर है
स्वर्णिम युगों हमारे तीन युगों की गाथा,
अद्भुत है कलयुग की स्वार्थप्रत कथा।
त्रेतायुग में श्रीराम पधारे
मर्यादा पुरुषोत्तम ईश बन
द्वापर युग में श्रीकृष्ण पधारे
लीला पुरुषोत्तम बन।
ईश्वर ने पृथक पृथक युग में
अवतरित हुए त्याग व कपट के प्रतीक बन।
सती व मर्यादित नारीयों का अस्तित्व को ठाना ,
त्रेतायुग में सीता जी के हरण की चर्चा,
द्वापर युग में चीर हरण की हुई लीला।
त्रेतायुग में रहा अयोध्या में शांत
राज अभिषेक में हुआ त्याग –
भाई श्रीराम ज्येष्ठ का।
द्वापर युग में हस्तिनापुर में
सिंहासन की कश्मकश,
कुरूक्षेत्र में गढ़ा महायुद्ध।
द्वापर में हड़पें सम्पत्ति कूट- चाल से,
हुई पराजय कौरवों की कृष्ण
के कूटनीतिक चाल से।
सत्यवाद, पाखंड सभी हैं ईश
के संयुक्त भक्तों में।
अतः कलयुग में भी इन सभी
के कृतियों का संगम।
मां मेरी मां
मां है तो जहान है,
क्या तो शिक्षा,
सारा जीवन ही उनकी
हमारी प्रतिछाया है।
मां न केवल शिशु को पालती है,
जीवन में पहले पाठ से अंत तक
के ज्ञान पढ़ाती हैं।
ऊंगली पकड़ चलना सिखाती है,
कलम पकड़ाकर लिखना एवं
पढ़ना सिखाती है।
हैं प्रथम गुरू जीवन में है मां,
जीवन के हर पहलू की ज्ञाता
है मां।
संस्कारों में प्रणय, धैर्य और
संयम सिखाती है,
मां मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व
को बनाती व संवारती है।
मां
पृथ्वी पर है अनमोल आत्मा होती हैं मां,
रचियता,रक्षक और गुरु होती हैं मां।
असत्य से सत्य की ओर ले जाती है मां
बुराईयों से अच्छाई को ओर ले जाती है मां।
मां है तो घर में रौनक होती है,
घर का अस्तित्व है मां।
मां घर आंगन की धड़कन है,
घर में एक दिव्य फरिश्ता है मां।
दैवीय शक्ति का एहसास देती है मां,
पृथ्वी पर ईश स्वरूप प्रतिनिधि है मां।
ईश्वर करूणा सागर है तो
करूणामयी व ममतामयी, होती हैं मां।
संतान के कष्ट व दर्द को
स्वयं अनुभव करती है मां।
हर दुख पीड़ा में मुख से मां,
ही निकलता है।
करूणा और ममता के एक
स्पर्श से कष्ट व दर्द हर –
लेती है प्यारी मां।
त्याग की मूरत होती है मां,
अपने हिस्से का भी सब
कुछ न्यौछावर कर देती –
है सम्माननीय मां।
स्वयं गीले पर सो जाती है
सूखे में शीशु को सुलाती है मां।
भानु आया, भौर हुई

भानु आया,भौर हुई
नभ में हुआ उजियारा।
सभी के मन को भाया है,
देखो भानु उग आया है।
चिड़ियों के चह चाहकर,
मुर्गों ने कुक की बांग देकर;
भानु के स्वागत में गीत गाया।
हुआ ओझल अंधियारा,
नभ में छा गया उजियारा।
उठो ओ! सोने वालों,
सकल जग जाग गया है।
कोई कर रहा सूर्यदेव को,
कर रहा कोई प्रभु को नमन।
बागों में रंग बिरंगे पुष्प खिले हैं,
तितलियां ने भरी हर्ष उड़ान,
भंवरें भी फूलों का कर रहे रसपान।
सकल विश्व करता सत्कार,
सभी चर अचर व प्रकृति –
करते इससे प्यार।
भानु में है उर्जा अपार,
प्रकाश है यह भंडार।
भानु है सौर उर्जा का राजा,
लगता है सबको विचित्र आला,
देता है दिन परन्तु छिपकर,
रात्रि का सुकून भी है देता।
नही लेता कभी किसी से कुछ,
देता उर्जा,ताप प्रकाश उपहार।
सोनार धरती
ओह ये म्हारी छै सोनारी धरती
रेगिस्तान री धरती।
ओर छोर इसके नही हैं लगते हैं,
समूची धरती है निराली।
मिट्टी इसकी इतनी बारीक ज्यूं
पिसी हुई चीनी।
दूर दूर तक फैला हुआ है इसका सरमाया,
न जल का कोई स्तोत्र न ही कोई
नदी न ही कोई नाला।
रेगिस्तान है कहलाता है यह,
मरूधरा है इसे जग ने जाना।
चल पड़ा है यहां कारवां इंसानो का
मरूधरा के जहाज ऊंटों का।
रह गया है यहां इक राही अकेला
उसे भी साथ लेना है।
तपती धूप में आसमां तप्ता,
तप्ती धरती उगलती आग है।
साथ में पानी के मश्क बुझाते
उनसे प्यास सभी राही हैं।
रातें हैं यहां बर्फीली,
सिकुड़ सिकुड़ सब सोते हैं।
उठ सबेरे सभी खानाबदोशी,
परिवार व काबिलों संग ग्रहण
हंसते गाते भोजन खातें।
केर सांगरी बाजरा ज्वार मक्का
की मोटी मोटी रोटी,
या बाटी दाल चूरमा के स्वाद लेते।
सभी राहगीर हिल मिल रहते,
नही किसी को अकेला छोड़ते।
बिना मतभेद के आपस में रखतें हैं मेल।
संस्कृति के यें बड़े ही धनी,
सभ्यता इनमें है कूट कूट की भरी।
यहीं तो हैं मरूधरा के असली –
सभ्यता के धनी।
कलम और कागज
दिव्य आलौकिक उपहार जगत में
कागज और कलम दवात।
बिन कलम के होय न कागज पर इजहार।
इक बिन दूजा कागज रहे बेकार,
कलम चले जब उस पर तब वह-
बन जाए नौनिहाल।
कलम व कागज दोनों हैं,
एक दूजे के पूरक व हमसफ़र।
कलम ही इतिहास बनाता,
स्वर्ण अक्षरों में कागज पर – छपकर।
आदिकाल से वर्तमान तक,
विज्ञान, भूगोल, इतिहास, ग्रंथ,
अन्वेषण पौराणिक व वैज्ञानिक
सभी का रखती है हिसाब।
भावी पीढ़ीयों को देती है ज्ञान,
भविष्य के लिए देती हैं अनुमान।
कलम और कागज का है रिश्ता,
आदिकाल से वर्तमान तक –
रहेगा इनका शबाब।
मजदूर
मजदूर नही किसी समय से मजबूर,
अपनी जीवन की मजबूरी को सहर्ष निभाते हैं।
स्वयं और कुटुम्ब की पेट की ज्वाला को बुझाने,
रात दिन कसके मेहनत करता है।
चिलचिलाती धूप हो या वर्षा का प्रकोप,
कड़कड़ाती ठंड में भी ललाट पर
ओस से पसीने की बूंदें होतीं हैं।
गगन चुंबी इमारत एवं पहाड़ो का काट मार्ग बनाना,
परिवार व स्वयं की भूख को शांत करते हैं।
गरीबी के आलम में बाल बच्चों के अध्ययन,
कुटुम्ब का भरण पोषण से वंचित रह जाता है।
रोजगारी के अभाव में कभी –
कभी जवानी में भी बुढ़ापे की
शिकन झलक आ जाती हैं।
शुकून भरी नींद सो नही पाता,
फिर भी धन्यवाद हैं इनकों कि
बिना किसी को गिला शिकवा – नही करते,
ईश्वर को अपना भाग्य समझकर
बारम्बार भजता व प्रसन्न रहता।
” स्तम्भ हूं आज मैं यारों “
लिखा न जाए क्या लिखूं ,
आतंकीयों का दिया हाहाकार लिखूं या
निरीह प्राणीयों का त्रासदी लिखूं।
सदीयों से दे रहें फिजाओं में घुमते
मासूमों के लहू के फुहार लिखूं।
चहुं ओर हाहाकार मचा है दिलों में
भय और चेहरों पर आक्रांत छपा हैं।
मासूमों के पिता के खून का रोना,
विवाहितों के उजड़े कंगनों का- टूटते फैंकना।
माताओं का और बंधुओं के शोक
से होते हुए चित्कार लिखूं।
चहुं ओर हाहाकार मचा है,
जन जन ही नही प्रकृति का
बदला हुआ रूप लिखूं।
बहुरूपिये शत्रु की नापाक इरादों को,
अपने ही खून से आज इनके
पाप की गाथा लिखूं।
किंकर्तव्यविमूढ़ हूं आज मैं
क्या क्या लिखूं।
नापाक पाकिस्तान
बंद करो अब पाकिस्तान का हुक्का पानी,
किया है जो इसने भारत के साथ गद्दारी।
कश्मीर में की है जो इसने हम से शैतानी,
पहलगाम में हमसे की है धोखेबाजी।
निर्दोष नादान नागरिकों की हत्या,
पाप का जमकर घिनौना रास रचाया।
बंद करो पाकिस्तान का हुक्का पानी,
तभी याद आयेगी इनको अपनी खूसड़ नानी।
नही भूले हैं हम उरी अटैक और पुलवामा के मंजर,
पाकिस्तान को अब पहलगाम में खून का चस्का।
नही सहेंगे अब पाकिस्तान की यह मनमानी,
बंद कर देंगे अभी इसका हुक्का पानी।
छीना इसने भारत की मां बहनों
और बेटीयों का सुहाग,
नवविवाहिता के हाथों की मेहंदी छूटी,
मांग का सिंदूर छूटा और मंगल – सूत्र छूटा।
माता पिता के बेटे छूटे,
बहनों के लाडले भाई छूटे
छूट गयें शिशुओं के पालनहार।
धर्म जात पूछकर आतंकियों ने निर्दोषों की हत्या,
इंसानियत की सीमा पारकर
देहशतगर्दी का नंगा नाच नचाया।
बंद करो पाकिस्तान का अब हुक्का पानी।
सबक सिखाना है इनको देखो
कैसी की है इन्होंने शैतानी,
बंद करो अभी ही पाकिस्तान का हुक्का पानी।
” आतंकवाद “
बंद करो अब पाकिस्तान का हुक्का पानी,
क्यों नही देता वो बेकसूरों को,
जीवन और खाना पानी।
आंतकवाद के आकाओं को
फांसी एवं एक तीर से पहुंचा दे काला पानी।
हैं हम वीर राणा व झांसी की रानी के वंशज,
शौर्य व साहस दिखाना होगा।
आंतकीयों के आकाओं के छक्के छुड़ा देना होगा।
नही भूलेंगे हम पहलगाम की घाटी में,
निर्दोष यात्रीओं का निर्मम संहार किया।
इन निर्मोही अखड़़ जल्लादों
को हमें सबक सिखाना होगा।
आतंकवाद का कोई धर्म या मजहब हो न हो,
इसी को हम झूठलाकर दम – लेकर रहेंगे।
पहलगाम व आतंकी असुर
पहलगाम में आतंकीयों ने की
कायराना हरकत,
धर्म -जाति पूछकर मार रहे थे गोली।
खूबसूरत फिजाओं और धरती को
कर रहे हैं रक्त से लाल।
प्रतिज्ञा अभी करों कि इनका
हिसाब सूद सहित हम चुका देंगे।
है! बुजदिल आतंकी तू कहीं भी
छुपकर हम पर वार कर,
तेरे रहनुमा व तूझे हम तेरे ही –
घर में घुसकर मारेंगे।
सजा मिलेगी एक एक कतरे लहू की,
जिन मासूमों के पिता को-
पहलगाम में खोया है।
नफ़रत और भय का बीज जो
तुमने बोया है ,
अंजाम तुम्हें भुगतना होगा यही
कुदरत का करिश्मा है।
यह वीरों व सनातनीयों की भूमि है,
जितना तू भाग सके तो भाग।
हिंद की सेना नही है नपुंसक,
एक एक को चुन चुनकर खत्म
कर देगी तुम आतंकीयों को।
पहलगाम आबाद रहा है,
पुनः सुख शांति समृद्ध ही- रहेगा।
धरती की सौगात -मिट्टी
मिट्टी का कोई मोल नहीं,
यह तो अनमोल है।
पैरों तले रौंदी जाती है,
पर वीरों के माथे के तिलक है।
मिट्टी के होते भिन्न भिन्न रंग,
कहीं भूरी, पीली और काली।
अनेक रूपों में भी दिखती है,
कहीं बालुई, कहीं दोमट व
कहीं बारीक सुहात।
मिट्टी की ही गोद में होतीं फसलें,
अन्न,साग, सब्जी,फल और दालें।
मेवें, मसाले और वन उपवन सभी
प्रकृति में ही है साख।
मिट्टी है अनमोल फिर भी,
लगता है इसका मोल।
सौंधी सौंधी महक है इसकी,
बस जाती है जन जन के मन में।
मिट्टी से ही बनते हैं बड़े बड़े पुतले
फूक देते हैं जैसे इनमें प्राण।
एक बीज मिट्टी में बो दें तो,
बन जाते हैं जैसे पालक एवं जन्मदात्री।
सकल सृष्टि का पालन करती है,
समदृष्टि से करती सभी का-उपकार।
मिट्टी के बूंद बूंद में है तृण,
तृण से ही तृप्त होते पशु पक्षी।
कहीं यह ईंट बन महल बनाते,
कहीं वन उपवन में सुंदर सुंदर –
पौध पुष्प खिलाते हैं।
मिट्टी से ही बनते रंग बिरंगे-
खिलौनें सलोने,
चूल्हे चक्की और घड़े सुहाने।
जीवित सी मूर्ति बन जातीं,
राम सिया व कृष्ण राधा के- जैसे।
मिट्टी है बहुत ही काम की,
अनेक रूपों और शानदार है।
मिट्टी का अस्तित्व अमिट है,
कहें कुम्हार से यह ‘ कुम्हार से
तू क्या रौंदे मोय,
इक दिन ऐसा आएगा कि मैं रौंदूंगी तोय।
फूलों की महक
फूलों की महक जैसे
मीत के प्रीत की चहक।
विरान जीवन में रौनक आई,
जैसे फूलों की महक आई है।
सूने जीवन में जीना दुश्वार है,
उनका आना जैसे फूलों की –
महक छाई है।
जीवन में मेरे मनमीत आया है,
जैसे जीवन की सूनी बगिया में
महक फूलों की आच्छादित है।
घर आंगन को मेरे शोभित है फूल,
सुसज्जित हैं और महक रहें हैं।
पतझड़ में भी पीत पत्ते झड़ गये,
सावन के आगमन से बागों में आई
फूलों की बरात दुनिया के कोने को
महका गईं।
फूलों की महक सारी जीवन को
खुशहाल बना गई।
मैं सफर में हूं
ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना,
मुझे न छेड़ो अभी मैं सफर में हूं।
कभी खुशी तो कभी गम का यारों सफर है,
अच्छी बुरी सभी को स्वीकार – करता हूं।
आत्मियता व परोपकार का सेवक हूं,
जीवन के सफर में मैं विश्वास करता हूं।
स्वावलंबी बनना ही मेरी प्राथमिकता है,
इसी प्रयोजन में अभी मैं सफर में हूं मुझे न छेड़ो।
सभी मुश्किलों से दद्वं करते हुए कुछ समय पाया है,
मुझे अभी न छेड़ो मैं सफर में हूं।
धैर्य और संयम रखना ही है मेरा सपना,
हर मुश्किलों को प्रभु के चरणों में
अर्पित कर जीवन को सार्थक हूं –
कृपया मुझे न छेड़ो मैं सफर में हूं।
तुम क्या हो
तुम क्या हो, कौन हो तुम
जरा तो मुझे बतलाओ।
कोई हूर या फरिश्ता या
इंसानों में कोई देव स्वरूप हो।
करूं तुम्हारी पूजा या इबादत
जरा तो मुझे बतलाओ।
रागों में तुम राग मल्हार हो-
पुष्पों में सुगंधित लाल गुलाब हो,
साजों में तुम सारंगी सी सरीले हो।
बागों में जैसे सावन की बहार हो
जरा तो बताओ तुम क्या हो।
कागजों में तुम्हें शब्द बना उतारूं
तो तुम पूरी किताब हो।
जीवन में बेहिसाब जवानी –
हो तुम
इत्र में मेरे लिए तुम केवड़े
को खुशबू हो।
बताओं तुम क्या हो।
ख्वाबों में मेरे ईश्वर के भेजे हुए
दिलरूबा फरिश्ते हो।
तुम क्या हो जनाब!
तुम जो भी मेरे लिए खुदा से
कम नही हो।
तिरंगें में लिपटा शहीद
मातृभूमि के लिए बलिदान हुए,
जो वीर जवान उनको शत शत नमन है।
शहीद हुए जो सरहद पर,
तिरंगे में लिपट कर देखो वे- अजर अमर हुए।
कोटि कोटि सलाम उनको हमारा।
नही दफनाई हैं यादें हमने,
क्योंकि उनकी लाशों पर चलकर
आजादी पाई है।
देश आज स्वतंत्र है,
उनकी ही कुर्बानी से।
इस पीढ़ी में गत पीढ़ी की,
भावनाओं को जगाना भी- जरूरी है।
उनकी वीरता की गाथायें ,
आज गाना जरूरी है।
उन्हीं की कुर्बानी से आज,
देश हमारा जन मन को अति – प्यारा है।
इस पर जो शहीद हुए,
तिरंगे में लिपट ‘ वे ‘ स्वर्ग को – गमन हुए।
उन्हीं की शहादतों पर आज हम,
७६वां स्वतंत्रता दिवस मना- रहे हैं।
तिरंगे ध्वज का मान और शान,
बढ़ाकर मातृभूमि पर शहीद हुए।
कर्मवीर हो तुम धर्मवीर हो तुम,
कर्मवीर हो तुम धर्मवीर हो तुम,
ना कोई भूलाया है इस यशस्वी को।
संविधान का निर्माता है वो,
कानून विधी का विधाता है वो।
अज्ञानता का अंधकार था जब,
विधी का विधान न था तब।
आया था तब इक विधी का ज्ञाता,
बना वह संविधान का निर्माता।
राष्ट्र में प्रजातंत्र की जोत जगाई,
विश्व में जनतंत्र की बात समझाई।
सभी में जातिवाद का भैद मिटाई,
ना कोई पिछड़ा, ऊंच नीच और न
कोई भेद -अभेद है भाई।
सभी को समान अधिकार प्राप्त है
सभी को है अपना कर्तव्य है -निभाना।
मनुस्मृति की सोच विलुप्त हुई,
लौकतंत्र की आंधी चली है भाई।
भीमराव अम्बेडकर जी का जन्म
अप्रैल माह में हुआ था,
श्रेष्ठ शिक्षा शास्त्री बने सभी को
शिक्षित हों जन यही था ध्येय।
किया संघर्ष संगठित करने को,
समाज व राष्ट्र के जन जन को।
विश्व का कल्याण
धर्म नही सिखाता आपस में लड़ना,
गंगा जमुनी तहजीब हैं हमारी,
हिन्दू, मुस्लिम सिख ईसाई सभी हैं भाई भाई।
मानवता का है यही तकाजा
मिलकर सभी रहकर राष्ट्र का करें उत्थान।
क्या रखा है आपसी मतभेदों में,
देश की संस्कृति का होता – भारी नुक्सान।
सभी धर्म मानवता का देते यही संदेश,
आपसी ईर्ष्या द्वेश को भूलकर
एक होकर राष्ट्र पर हम करें विचार।
मानवता का संदेश यही है
सभी इंसान भाई भाई हैं।
न कोई छोटा न कोई बड़ा,
सभी एक ईश्वर की हैं संतान।
मिलजुल कर रहें सभी लोग
बनाऐं अपना जीवन अनमोल।
सभी धर्म का है एक संदेश
जग में सभी जाति रहें एक होकर
मानवता के संदेश का करें – प्रचार।
कलम से कलाम तक हम
राष्ट्र का उत्थान करें,
जात-पात बाल-विवाह से
ऊपर उठकर विश्व का कल्याण करें।
जय जय हनुमंते
महावीर हनुमान का सुमिरन करिए मित्र।
भक्ति भाव मन में बढ़े, बढ़ता जीवन इत्र।
अंधकार मन का मिटे , बढ़े प्रीति हनुमान।
सुमिरन सीताराम का , महामंत्र है जान।।
जन्मोत्सव है मन रहा, होती जय जयकार।
पवनपुत्र के नाम को, जपता यह संसार।।
भक्तों के दुख सब हरें, संकट मोचन नाम ।
अंजनी माँ के लाल है , पूरण करते काम ।।
बल बुधि विद्या दे रहे, मिटते कष्ट अपार।
हनुमत जी के जाप से , होते दूर विकार।
सभी विचारों का कर उलंघन,
जय जय हनुमत जपे जा।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,
तीहुं लोक उजागर।
जय हनुमत

जय हनुमत,जय कपीस
गुणसागर,
जय तीनों लोक उजागर।
अथाह ही हृदय में हर्षाऐं,
स्वागत श्रीराम के लाने आऐं।
हाथ जोड़ करें यह विनती,
विश्व के समूचे पापाचार मिट जायें।
सजी अयोध्या नगरी दुल्हन जैसी
अवध पुरी में सैंकड़ों दीप जगमगाऐं
घर घर आज बनी हैं स्वर्ग लोक जैसी।
बाजे ढोल, शहनाई ताशे,
केसरिया हो गई है अयोध्या –
अवध पुरी सारी।
जनकपुरी भी सज गई सारी,
दीपोत्सव से जैसे मन रही दिवाली।
जनक दशरथ और तीनों माताऐं,
स्वागत में नैन पांवड़े बिछाए।
झुक झुक लेत बल्लियां,
करत आरती माताऐं अनुपम –
सीयाराम की।
प्रिय हनुमत जी भी साथ पधारे,
सेवक और अंग रक्षक बन आऐं।
जय जय हनुमान गोसाईं,
कृपा करो सब पर गुरुदेव –
की नाई।
यूं चितवनि से न देखो कान्हा
यूं चितवनि से न देखो कान्हा
प्रेम गली है अति साकरी,
घुस गई तो निकल नही पाऊंगी;
सदा तेरी बन जाऊंगी।
मुरली ऐसी बजाओ कान्हा
जग के सारे कष्ट -संकट हो,
जाऐं अन्तर्ध्यान ।
देश की मान मर्यादा खंड खंड
हो रही है,
स्वतंत्रता, सम्प्रभुता का-
हो रहा है मर्दन है।
गणतंत्र पर लगा है दाग,
राष्ट्रवाद जर जर हुआ है।
हो रहा अपमान राष्ट्र ध्वज का,
और प्रजातंत्र शर्मसार हुआ है।
नही होता अब बर्दाश्त,
बंसी ऐसी बजाओ कान्हा;
सारे अपवाद हो जाऐं अन्तर्ध्यान।
ठुमक चलत श्री बाल राम
ठुमक चलत श्री बाल राम
दौड़ते गिरत लट पटाय,
बाजत छुन छुन छम – पैजनियां।
मायें सभी दौड़ीं सम्भाल पायीं,
नटखट बाल लाल राम को।
अंग पुनीत जनेऊ सुशोभित,
है अंचल रज धूसित।
अरूण अधर गुलाब से गुलाबी,
बोलत मधुर मधुर मुख से वाणी।
सुभग कमर में चारु लटकन,
मोतीयन की लटकनीयां।
बाजुओं में बंधे हैं अति मोहक,
मोती पन्ना की बाजुबंध बधंनिया।
शोभा अति न्यारी लख लख ,
तन मन सभी जाऐं वारि वारि।
जनक दशरथ अवलोक कर कर,
विभोर हो रहे हैं मन ही मन।
गौरिया चैरियां तुम तो हो

गौरिया चैरियां तुम तो हो
मानव की चहेती चिड़िया।
नन्ही कोमल फुर्र फुर्र करती,
उड़ती फिरती डाल डाल।
आंगन चौक में फुदकती हैं
जैसे नृत्य करतीं राग मल्हार – सुनातीं।
तुम हो हमारी सोन चिरैया
फुदक फुदक कर नृत्य करतीं- जैसे ताताथैया।
दाना पानी रोज रखूं मैं,
तेरे आने का हरवक्त करूं – मैं प्रतिक्षा।
अब क्यों तुम लुप्त होती सी जा रही हो,
तुम्हारे मधुर प्यारी मीठी कलरव
को तरस हैं अब हमारे कान।
अब नील गगन में भी तुम नही दिखाई देती,
क्यों छोड़ा है हमारा साथ।
छोटी छोटी नन्ही कोमल कद वाली ,
आकर्षित करतीं हमरी गोदी में समा जातीं।
आज भी हम प्रतिक्षा करते,
दाना पानी हम अभी रखते –
तुम्हारी राह हैं तकते।
तुम तो आज भी हमारी
प्यारी चहेती सोन चिरैया,
हमारी दुलारी गौरिया।
बधाई हो बधाई
बधाई हो बधाई आज खुशखबरी आई,
अन्तरिक्ष की परी सुनीता –
विलियम जी धरती पर पधारी हैं।
आरता सजाओं चौक पुराओं
फूलों से धरती सजाओ अंतरिक्ष
से पधारी लक्ष्मी का स्वागत गान
गाओं। नृत्य करों ढोल नगाड़े ताशे
बजाओं ।आज सुनीता विलियम्स का स्वागत करें हम।
मातृभूमि हर्षाई चहुं दिग हैं
हर्षाए,
सभी देवलोक हर्षाया जन जन
हृदयतल हर्षाया।
सुस्वागतम का नारा चहुं दिशाओं
मैं गूंजा।
बधाई हो बधाई आज देखो शुभ
घड़ी आई।
मुझ पर चढ़ा हैं रंग
होली आई रे होली आई
रंगों की बौछार साथ लाई।
झूम रहे मतवालों की टोली,
साथ लिए रंग गुलाल और- पिचकारी।
रंगों से सभी हो रहे हैं लाल पीले
और हरे गुलाबी,
दिखत सभी हैं रंगों के धनी।
सभी नवल जोड़ी बने हैं जैसे,
राधा गोविंद की छैल छबीली – जोड़ी।
गली गली मौहल्ले मौहल्ले में
डोल रहें हैं रंगीन नर नारी की- जोड़ी।
बाल-बालाऐं वृद्ध लोग सभी
नाच रहे ढोल मंजीरे हारमोनियम के संग।
उड़ रही है बयार संग लिए अबीर गुलाल,
सभी हुए हैं बहुरूपिये देखों आज।
होली है आपसी प्रेम एकता का त्यौहार,
न काऊ से बैर न काऊ से मतभेद
सभी हैं एक ईश्वर की संतान,
आओं सब मिल खेलें होली चाहे
हों हम हिन्दू, मुस्लिम सिख ईसाई।
देखो होली के रंगों का मुझ पर चढ़ा है रंग।
होली गीत
कन्हैया घर चलो गुंइयां,
आज ब्रज में खेलें होली।
बिरज में होली रे रसिया,
बरजोरी रे रसिया।
इतते श्याम सखा संग आये,
उतते राधा प्यारी रे रसिया।
बाजत ताल मृदंग झांझ ढप
और मंजीरे जोड़ी रे रसिया।
उड़ते गुलाल लाल भयें बादल
अट गयी अटा अटारी रे रसिया।
कोरे कोरे कलश भरायें,
भरि पिचकारी मारी रे रसिया।
बीच डगर में होली मचावत,
और करत बरजोरी रे रसिया;
आज बिरज में होली रे रसिया।
कन्हैया संग आज गुंइयां खेले
होली।
अपने अपने मन्दिर से निकसी,
कोई कोई सांवली कोई गौरी ।
एक से एक मदमाती सभी उम्र
की भोरी,
कन्हैया घर चलो गुंइयां, खेले होली।
कोई चटकती कोई मटकती आवें
कोई आवें अंग मरोरे।
सास ननद की चोरी चोरी निकस,
चली सभी गौरी,
कन्हैया संग खेले गुंइयां आज-
रंग होली।
अबीर गुलाल अगरजा चंदन
केसरी से भरी कटोरी,
श्याम सुंदर संग खेलें सभी सखा
सखी आज ब्रज में होली।
होली आया
होली आया होली का त्यौहार,
नाचे गायें धमाचौकड़ी मचायें।
हुड़दंग मचाऐं और फिर खुश – करने को,
गले मिलकर एक दूसरे को माफ करेंगे।
भिन्न भिन्न रंगो से लाल हरा पीला
गुलाबी से सभी सखी सखा को खूब रंगेंगे।
धमाचौकड़ी मचायेंगे भेदभाव नही
होगा किसी के दिलों में,
गीत फाग गायेंगे नृत्य करेंगे।
मृदंग ढोल नगाड़ो व हारमोनियम
पर धुलंडी का रास रचाऐंगे।
फागुन के दिन चार सखि सब
मिल होली खेल रचायेंगे।
धरा का आंचल सतरंगी हो जाए
करना ऐसा करना अच्छा लगता हैं।
रूठी सजनी या रूठा साजन
आज नहीं बच पायेंगे,
होली के हुड़दंग में उन्हें नचायेंगे
खूब धूम मचाऐंगे।
होली से पहले स्नेह मिलन मैं
गले मिलना अच्छा लगता है।
आपस में भेदभाव छोड़कर
गले मिलकर माफी मांगना – अच्छा लगता है।
फाग-होली
फाग व होरी और रसिया की,
मदमाती राग व उन्माद है।
कलियों पर झूमते, गुनगुनातें गीत,
सज गईं बौरौं से अमुआ की डालीयां।
गेहूं और सरसों की बालियां,
झूम रहीं हैं फागुनी बयार में।
कोयला कूहक रहीं सखी री,
गूंज रही है मधुरिम तान सें।
गरमाने लग गई है सूर्य की रश्मियां
तन मन में भरनें लागी है सखी –
मस्तीयां हर्षोल्लास से।
रंग गुलाबी से भीग गए रंग गुलाल से,
कण कण उल्लास भरा भीग गया, भांग से।
पकवान गुंजीया, पापड़ी से करतें,
मनुहार सभी नर नारी हर्षोल्लास से।
रंग बिरंगी होली आई है ,
फाग में मस्ती छाई है।
स्त्री मन
स्त्री मन दिव्य अनुभूति है,
नारी सदा ही महान रही है।
पैदा किया ईश्वर ने सर्वगुण संपन्न,
अपना लक्ष्य चुनना उसका होता है मन।
प्रभु ने उसे सहज भाव दिया,
दूसरे की खुशी में अपनी खुशी देखना।
अपने पुरूष के अस्तित्व के लिए,
स्वयं का अस्तित्व गौड़ कर देतीहै।
स्त्री के मन में होती है शांति, प्रेम,
सहिष्णुता का भाव जन्मजात।
पुरूष के अंह को अपनी स्त्रीत्व – गुणों से,
अपनेआप में सहज समेट लेती है।
स्त्री त्याग की मूर्ति कहलाती है,
उसे खुशीयां चाहिए क्लेश नही।
इसमें जीवन की सार्थकता को समझती हैं,
अतएव जीवन का प्रयोजन यही,
होना चाहिए स्त्री के मन में।
नारी तू महान है
नारी तू महान है,
भगवान नही जहां,
तू उसका पर्याय है –
नारी तू महान है।
वृक्ष की भांति ठंड छांव है,
छांव की तेरी,हर इंसान लेता-
सुख शांति की सांस है।
हैं नारी गुरु,मित्र और संरक्षिका,
अभाव में इनके हैं इंसान अधूरा।
सिखा है इसने वृक्ष की भांति,
सुख की छांव वाला दुलार।
ज्यूं धूप व वर्षा सहना है
वृक्ष की प्रकृति,
कष्ट पाकर भी सब कुछ सहना
है इसकी नियति।
हैं! नारी अपार शक्ति,
बेटी,बहू मां और पत्नी;
हर स्वरूप में रिश्ते निभाती है।
सखी रूप में अत्यंत कल्याणी,
नही है इसका कोई सानी।
नारी है जहां, भगवान है वहां,
दिव्य शक्ति,रखती दूर दृष्टि –
पुज्यनीय और सम्मानित है।
परिवार, समाज एवं संसार की,
आन,मान व शान है।
नारी तू महान है,
भगवान नही जहां,
है उसका पर्याय वहां।
नारी सक्षम है
ज्यूं हजारों फूल चाहिए
एक माला बनाने में,
ज्यूं हजारों दीपक चाहिए
दिपावली सजानें में,
हजारों बूंदे चाहिए
समंदर बनाने के लिए।
परन्तु एक नारी ही काफी है
घर को स्वर्ग बनाने के लिए।
नारी नही तो सृष्टि लापता,
न नभ का पता न बल का पता।
न प्रकृति का होता नजारा,
न समुद्र में नीर की पहचान – होती।
जब नारी ही ‘ ईश ‘ बन आई,
तब ‘ एडम ‘ संग मिल सृष्टि – रचाई।
दिलों में जो बस जाये वो,
ही सूत्रधार है नारी।
नारी से ही ‘ कायनात ‘ जवान है
मां, बेटी, बहन बहू रूप में,
इनके कदमों में ही जन्नत – मुमकिन है।
” कवियों का आध्यात्म और मेरी लेखनी “
आध्यात्मिकता साहित्य के प्रति नैसर्गिक भाव है,
प्रेरित हो इस भाव से कलमकार
लेखक एवं साहित्यकार बन- जाता है।
अक्षर से अक्षर जोड़ते हुए इंसान
कवि और साहित्यिकार बनता है।
जादूई सम्मोहन होता इनके लेखन व सृजन में,
आध्यात्मिक ताने बाने से लेखक
शिरोमणि रचनाकार उपाधि – पास जाता है।
कवियों का आध्यात्मिक होना ही
इन्हें लेखनी का चितेरा बनाता है।
मेरी लेखनी कुछ इसी तरह है,
आध्यात्मिक पुट भी है एवं इक कुशल रचना।
जमाने वो गुजर गयें
जमाने वो गुजर गयें,
जब सभ्यता – शिक्षा के –
खजाने हुआ करते थें।
पुराने लोग जो दावेदार थे,
आज नहीं हैं,वे गुजर गए।
शेष जो भी हैं,केवल भीड़ ही हैं।
इंसानियत के दावेदारों को,
तो गुजरे जमाने बीत गए।”
नारी
इनमें इतनी क्षमता
आंधी को पी जाऐं।
तूफानो में भी मुस्कराना
आता है इनको।
युगों युगों से नव निर्माण का
सृजन करती हैं वों।
इन हाथों का कौशल दिखाना
है हमकों।
नारी बिना विकास है अधूरा
संसार में,
जैसे पति-पत्नी पूरक होते हैं
जीवन में।
नारी समाज का उध्दांग है,
आधे अंग से विश्व अस्वस्थ व
अविकसित रहता।
यदि नर शिव है तो नारी शक्ति,
यदि पुरुष विश्वास है तो हैं
श्रद्धामयी।
नर यदि पौरूषमय है तो
नारी लक्ष्मी, शारदा व दुर्गा है।
किसी भी दृष्टि से कम नहीं,
यही शाश्वत सत्य है।
मैं कैसे खेलूं होली
बिन श्याम मैं कैसे खेलूं होली,
रह गई ब्रज और मथुरा की होरी।
पैंजनीयां भूली और ना मुरलीधर,
माखन मटकी संग गुजरिया भूली।
प्रभु की ऐसी लागी नजरिया
भूल गई मैं कृष्ण की डगरिया।
गृह द्वार,अटारी सभी सूने पड़े हैं,
नृत्य गान होरी के सब भूल गऐं हम
कृष्ण तुम बिन बताओं यह कैसी होली।
सभी ग्वाल गोपीयां टेरे है राह- तेरी,
आओ श्याम तो खेलें होली।
खत
” यादों में एक खत”
मुझे याद है,लिखे खत तुम्हें
कागज कागज शब्द सजाऐं,
दिल ने मेरे, तेरी याद में।
प्यार में गमजदा हूं मैं-
तेरी गैरहाजिरी में।
मेरे अरमान तो मेरे दिल में-
ही जल गयें,
याद तेरी दिल में ही दफन हो गईं।
कितनी भी खुश रहने की कोशिश –
करुं मैं,
सच कहूं तो बहुत रूलाती हैं यादें
मुझे दिन और रातों में।
हर पल जब भी खुश होती हूं मैं
मेरी हर हंसी होती है यह सोचकर –
कि अभी भी हूं मैं तेरे साथ यादों में।
यही मानकर यादों को तेरी मैंने,
पनाह दे दी है अपने दिल जिगर में।
आखिर हमने मोहब्बत की थी,
तेरी मासूम शख्सियत से।
” प्रदूषण “
दूषित पर्यावरण करता,
मानव प्रकृति को बेहाल।
जल दूषित न हो,
रखें इसका पूर्ण ख्याल।
जल ही करता है मानव व
प्रकृति का संवर्धन।
दूषित वस्तु का जल में न करें प्रवेश,
ऐसे जल के प्रयोग से होता सभी
प्राणीयों का विनाश।
दूषित वायु का होता भयावह
परिणाम,
सदैव रखें इस पर गंभीर विचार।
अधिक केमिकल्स का प्रयोग,
करता पर्यावरण दूषित।
पर्यावरण को शुद्ध रखे सदा,
प्रदूषण को भगाना है।
वन उपवनों को संवारें,
हरे भरे वृक्ष व पौधें लगाऐं।
दूषित जल व वायु करते हैं,
प्रकृति व प्राणीयों का विनाश।
पर्यावरण को बचाऐं,
प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाऐं।
सड़ी गली प्रदूषित वस्तुओं को
नही करें एकत्रित घरों में कोई।
दूषित वातावरण का होता है
जग में होता भयंकर प्रभाव।
मानव के मानस न हों –
दूषित विचार,
इससे उपकार व सत्संग का
होता वहां अभाव।
जीवन का हो यही आधार ,
दूषित विचार व व्यवहार का
करदें पार हर इंसान।
शिवरात्रि
शुभ शिवरात्रि आई
हृदय उमंग उल्लासित हुआ।
गौरी बनी सुभग सुहागिन
शम्भू बने औघड़ दुल्हा।
गले लपेटे सर्प माला,
बिच्छू कुंडल कर्णो में डाल।
बाघाम्बर में हैं दर्प अनोखा,
सजे विचित्र अनोखे रूप में,
गण सभी बराती घेरे हुए हैं।
अनोखी बारात लख माता मैना,
हो गईं हैरान,
पिता हिमालय चकित हो रहे,
विनती कर रहे जोड़ कर हाथ।
सोच रहे नही है गौरा संग मेल,
नारद जी ने भी किया सौंदर्य –
का बखान।
शिव हैं अजन्मे स्वयंभू नाथ,
आदि अनन्त जग के प्राण।
सभी जीवों के सार्वभौमिक प्राण,
कहलाऐं हैं पशुपति नाथ।
त्रिकाल के अवलोकन करते हैं,
सर्व सुख शांति के प्रदाता,
ऐसे प्रमुख ईश को करते हम-
कोटि-कोटि प्रणाम।
जय हनुमत, जय कपीस गुणसागर,

जय हनुमत,जय कपीस गुणसागर,
जय तीनों लोक उजागर।
अथाह ही हृदय में हर्षाऐं,
स्वागत श्रीराम के लाने आऐं।
हाथ जोड़ करें यह विनती,
विश्व के समूचे पापाचार मिट जायें।
सजी अयोध्या नगरी दुल्हन जैसी
अवध पुरी में सैंकड़ों दीप जगमगाऐं
घर घर आज बनी हैं स्वर्ग लोक जैसी।
बाजे ढोल, शहनाई ताशे,
केसरिया हो गई है अयोध्या –
अवध पुरी सारी।
जनकपुरी भी सज गई सारी,
दीपोत्सव से जैसे मन रही दिवाली।
जनक दशरथ और तीनों माताऐं,
स्वागत में नैन पांवड़े बिछाए।
झुक झुक लेत बल्लियां,
करत आरती माताऐं अनुपम –
सीयाराम की।
प्रिय हनुमत जी भी साथ पधारे,
सेवक और अंग रक्षक बन आऐं।
जय जय हनुमान गोसाईं,
कृपा करो सब पर गुरुदेव –
की नाई।
हर हर शम्भु

हर हर शम्भु ,जय जय शम्भु।
बेलपत्र और गंगा जल से करुं-
अभिषेक हर हर शम्भु।
याद करें हम अपना गौरव,
याद करें हम त्वं वैभव।
अजर अमर है मृत्युंजया,
हर हर शम्भु ,हर हर महादेव।
आदि सृष्टि के तुम निर्माता,
वेद उपनिषद के तुम दाता
तुम ही भारत के विधाता,
तुम भविष्य के स्वर्णोंदय।
हर हर शम्भु, हर हर महादेव।
कोटि कोटि कंठो का गर्जन,
कोटि कोटि प्राणों का अर्चन,
कोटि कोटि शीशों का अर्पण।
हर हर शम्भु , हर हर महादेव।
खड़ी आज भी शंका अविचल,
खड़ी आज भी लंका अविचल।
बजे तुम्हारा डंका अविचल,
रामराज्य हो पुनः उदय।
हर हर शम्भु , हर हर महादेव।
सवाल दिल में

सवाल दिल में सारे दफना दिए हमने,
सारे राज अपने जिगर में दफना दियें हमने।
शिकन सारे चेहरे के हमने छिपा लिये हैं,
रोशन फिर भी हमने चिराग को रखा है।
उम्मीदों की मंजिल अब दूर नही,
पाकर ही हम अब दम लेंगे।
मुसाफिर हूं पर थकता नही यारों,
दर पर दर चलता ही जाता हूं।
तिरंगें में लिपटा शहीद
मातृभूमि के लिए बलिदान हुए,
जो वीर जवान उनको शत शत
नमन है।
शहीद हुए जो सरहद पर,
तिरंगे में लिपट कर देखो वे-
अजर अमर हुए।
कोटि कोटि सलाम उनको हमारा।
नही दफनाई हैं यादें हमने,
क्योंकि उनकी लाशों पर चलकर
आजादी पाई है।
देश आज स्वतंत्र है,
उनकी ही कुर्बानी से।
इस पीढ़ी में गत पीढ़ी की,
भावनाओं को जगाना भी-
जरूरी है।
उनकी वीरता की गाथायें ,
आज गाना जरूरी है।
उन्हीं की कुर्बानी से आज,
देश हमारा जन मन को अति – प्यारा है।
इस पर जो शहीद हुए,
तिरंगे में लिपट ‘ वे ‘ स्वर्ग को – गमन हुए।
उन्हीं की शहादतों पर आज हम,
७६वां स्वतंत्रता दिवस मना- रहे हैं।
तिरंगे ध्वज का मान और शान,
बढ़ाकर मातृभूमि पर शहीद हुए।
नारी

स्त्री मन दिव्य अनुभूति है,
नारी सदा ही महान रही है।
पैदा किया ईश्वर ने सर्वगुण संपन्न,
अपना लक्ष्य चुनना उसका होता है मन।
प्रभु ने उसे सहज भाव दिया,
दूसरे की खुशी में अपनी खुशी देखना।
अपने पुरूष के अस्तित्व के लिए,
स्वयं का अस्तित्व गौड़ कर देतीहै।
स्त्री के मन में होती है शांति, प्रेम,
सहिष्णुता का भाव जन्मजात।
पुरूष के अंह को अपनी स्त्रीत्व – गुणों से,
अपनेआप में सहज समेट लेती है।
स्त्री त्याग की मूर्ति कहलाती है,
उसे खुशीयां चाहिए क्लेश नही।
इसमें जीवन की सार्थकता को समझती हैं,
अतएव जीवन का प्रयोजन यही,
होना चाहिए स्त्री के मन में।
इश्क
आंखों में यूं अश्क छुपाया नही करते,
दिलों की तह में इश्क यूं छुपाया नही करते।
जुबां पर जब कोई नाम आयें किसी का,
नैनों को यूं झुकाया नही करते।
आशिक हैं हम किसी के तबस्सुम के यारों,
इज़हारे मोहब्बत करके ही रहेंगे।
याद आता है वो घने कोहरे के बीच ,
तेरा लावन्य दमकता स्वरूप,
इश्क में हर लेती है मेरा चैन – सूकून।
बज्में हया से दूर भागूं मैं या,
तेरे इश्क ने मुझे बांधा है मजबूरन।
खुशी हो या गम हो सब मंजूर है
अब तो ना खुशी का ग़म है,
ना ही गम में खुशी का एहसास।
बेहिसाब पागल बना चुकी है,
यह जिंदगी मुझे।
जब हुआ जिक्र जमाने में
मोहब्बत का,
मुझे कुछ खुशी कुछ गम ने
रूलाया है।
अब तो ना खुशी का गम है,
न गम में कोई खुशी।
बेहिसाब पागल बना चुकी है
यह जिंदगी मुझे,
कभी सहर तो कभी शाम
खुशी दे गई मुझे।
उनकी याद कोई काम दे
गई है मुझे,
कभी खुशीयों भरी तराना
गुनगुना रहा है:
कोई गम की गजल गा रहा
है कहीं।
दिल तो दिल ही है जनाब,
कभी खुशी कभी गम के तराने
का माहौल बना गया कोई।
फूल गुलाब
देखकर गुलाब सोचता हूं,
कितना दुर्भाग्य है इसका।
खिलना था किसी सुकोमल
शाखा पर,
परन्तु खिलता है कांटों पर।
यह तो कांटों की खुशनसीबी है,
गुलाबों जैसे महकते कोमल –
पुष्प का वरदान मिला है।
जन जन के हृदय में होता है,
इसे ईश्वर के चरणों में चढ़ाने में।
पुष्पों में यह सरताज है,
सुकोमल लाल गुलाबी हैं।
महक इसकी बड़ी सौंधी है,
सभी का मन हर लेती है।
गुलाब पुष्पों में राजा,
रंगत इसकी है लाल गुलाबी।
हर कली इसकी होती न्यारी,
रंगों में जैसे सुर्खियां बटोरतीं।
कांटों के बीच यह खिलखिलाती,
हमें पुरजोर आकर्षित करतीं।
प्यार और मोहब्बत की निशानी,
हृदयों को मिलाती बनाती रूहानी।
हर अवसर पर बढ़ाता शांन है,
जश्न में लुटाता मान व शान है।
ईश्वर की पूजा हो या संकीर्तन,
गुलाब पुष्प सबों में शोभा बढ़ाता।
फूलों का राजा है महफिलों की –
शान है,
लोग इसे करते भरपूर इस्तेमाल।
लता दीदी

लता दीदी की देह पूर्ण हुई,
मां शारदे की अराधना एवं –
पूजा भी संपूर्ण हुई।
लगा जैसे मां सरस्वती पूजित हो
स्वयं विदा हुईं।
दीदी लता जैसे कोई मानव कवच
धारण कर शारदा स्वरूपा –
देवी पैदा हुईं।
बाल अवस्था से ताउम्र संगीत
की उपासक रहीं,
शौर्य,प्रणय,विछोह और देश-
भक्ति के गीतों की अधिष्ठात्री
प्रमुख रहीं।
मधुर सरल व दिव्य मुस्कान की
अनन्त धनी शख्सियत थीं वे।
संगीत था ईश्वर स्वरूप उसके
लिए तब,
चप्पल नही पहनती थीं वो।
बिना गुरूर के ३६ भाषाओं में,
सुर-ताल में मधुर मधुर गाती-
थीं वो।
आलौकिक पावन आत्मा थीं,
इस जग की उपहार थीं वो।
सादर अभिनन्दन करते हम,
आदरणीया लता दीदी को।
महाकुंभ स्नान
ज्योतिषी नक्षत्र गणना शास्त्र
सम्मत कुंभ आता है,
हिंदू जन संत सभी ऋषि इस
परम्परा के अनुयाईं हैं।
आस्था का आस्तिक का महा पर्व,
हरिद्वार इलाहाबाद प्रयागराज में
महाकुंभ है आता।
सनातन धर्म सुखदायी है यह शाही
स्नान,
गंगा में डुबकी लगाने पहुंचते हिंदू
वासी- प्रवासी।
मानव,देव ऋषि मुनि सभी इस –
स्नान से पाते हैं पावन मुक्ति।
१२ वर्षों के बाद आता यह योग,
हर मानव चाहता इस अवसर का
हृदयतल से उठाना लाभ।
गंगाजल में इस स्नान का अति
ही महत्व,
इस जल में सम्भावित होती हैं,
अमृत की बूंदें।
जन्म जन्म के पापों को धुल
जायेंगे,
आत्माऐं महाकुंभ स्नान से हो
जायेंगी विशुद्ध पावन।
मां शारदे इतना उपकार करों

मां शारदे इतना उपकार करों,
हम अज्ञानी अल्प बुद्धि हैं।
सुबुद्धि प्रदान करों है! मां,
हम पर इतना उपकार करों मां,
ज्ञान व अच्छाईयां प्रदान करों।
हम सबके अंतर्मन में,
झंकृत वीणा तार करों मां।
अंदर ऐसा भाव जगाओं,
करें जन जन का उपकार हम।
हम से यदि त्रुटि हो जायें,
उनको क्षमा करों शारदे मां।
हम पर उपकार करों मां,
सुबुद्धि का आगाज रहें तन में,
निर्मल तन और आत्मिबल हो।
शुद्ध करके तन-मन सारा,
सकल विकार मिटादों मां।
प्रज्ञा रूपी किरण पुंज हो मां,
हम तो निपट अज्ञानी हैं।
हल्लो हमारे मन बुद्धि के विकार,
ज्ञान एवं प्रबुद्धता की जोत हम-
नादानों में जगा दो मां।
मां शारदे इतना उपकार करों,
तन मन से हमें प्रबुद्ध और –
सात्विक बना दो मां।
सकल सृष्टि का करें हम कल्याण,
ऐसी दिव्य जोत हम में जगा दो मां।
मेरे मन का बसंत

बसंत है मेरे मन का,
पुष्पित हो जीवन महकाता।
क्षण क्षण खिलते इतराते,
चहुं ओर खुशबू फैलाते।
पीत रंगों की सरसों के पुष्प,
खेतों की रौनक बढ़ाते।
भंवरे, दादुर पपीहें कोयल
मस्त हो उन पर नाचते गाते
पल्लव कलीयां सभी पल्लवित
हो पीत रंगों की शोभा बढ़ाते।
देख देख बागों और खेतों की,
बसंती आवरण मन मेरा हर्षाए।
जाते हुए शिशिर फाग लाता है,
बसंती रौनक और बैसाखी –
होली व सरस्वती पूजा।
किंसुक-पलाश और टेसू के
पुष्प वृक्षों पर खिलतें।
मेरे मन का बसंत ऋतु आई,
बसंत पंचमी के पर्व को लाई।
पीत वसन पहनते पीत ही तब,
भोजन प्रशादी का ईश को हम-
भोग लगातें।
मेरे मन का बसंत हर्षाता,
मल्हार राग गाता – नाचता।
ऋतुराज बसंत मेरे मन को है
भाता ,
घर घर में पीले वस्त्र धारण कर
पीले प्रशाद भोजन ईश को –
चढ़ाते,
मां सरस्वती की पूजा करते हम
पीले पुष्प व पीत ही भोग –
लगातें।
मेरे मन का बसंत धूमधाम से
मनाते।
पथिक
मैं पथिक अनजाना हूं,
राह मेरी है अनजानी।
ढूंढता हूं गली गली मंजिल,
जाने क्यूं खंडहर नजर आता है।
मार्ग में अंधेरा व धूल -शूल हैं,
सम्भल सम्भल कर चलना ही
सम्भव नही होता है।
पथिक हूं मैं मंजिल मेरी मुश्किल है
चलते चलते थक गया हूं मैं,
मंजिल मेरी कहां है दिखती नही।
राह नही दिखती आसान आज,
आऐं शूल रास्ते में उनको नष्ट
करते जाना है।
आगे ही आगे बढ़ते जायेंगे,
सभी विपदाओं को नष्ट करते
जायेंगे।
अपनी है मंजिल को ढूंढ ही
लायेंगे,
खूब खूशी व हर्षोल्लास मनाएंगे।
नया प्रभात फिर प्रकाशित होगा,
समस्त विश्व में उजियारा होगा।
मंजिल मेरी मुझे मिल जायेंगी,
हंसी खुशीयों का अम्बार छा – जायेगा।
मेरी रचना
हां मैं कवि तो नही,
जकड़ा नही किसी बंधन में।
हवा की तरह स्वच्छंद निर्भिक
इंसान हूं मैं।
न सपनों से बंधा हूं,
न कल्पना का पुजारी हूं मैं।
न भावों में निर्बाध –
उड़ना वाला पंछी हूं।
भावों की भिन्न भिन्न रचना,
सृजन करना मेरा ध्येय है।
हां मैं कवि हूं,
किसी बंधन से जकड़ी –
नही हूं मैं।
स्वतंत्र हूं मैं
अपनी सोच की।
रोक सके न मुझे कोई,
नि: बन्धन कवि हूं मैं।
हूं अकेली भवसागर में,
सांसारिक रिश्तों में सहज
ही बंधी हूं मैं।
समायोजन से बना लोक-
परलोक का बन्दी हूं मैं।
हां मैं कवि हूं ,
जकड़ी नही किसी बंधन में।
निर्झर बहती कविता मेरी,
कोई शांत तो कोई प्रचंड –
सागर है।
मर्यादित हो कविता मेरी
यही सोच मेरी भारी है।
हां मैं कवि हूं,
जकड़ी नही किसी बंधन में।
महात्मा गांधी

जन्मे १८६९,२अक्टूबर को,
था वह राष्ट्र भक्त महात्मा गांधी।
राष्ट्र को स्वतंत्र पावन कर गए,
आज कोई नही है उन सा सानी।
सत्य के पथ पर चलते थे ‘वे ‘
किसी से नही डरते थे।
‘ अधिकार के खातिर दृढ़ता से,
अनशन भी करते थे ‘ गांधी ‘।
शान्ति, अहिंसा,सत्य व प्रेम की,
राह दुनिया को दिखाया उन्होंने।
हिंसा से जो दूर रहा वह तो,
कायर नही जग में इक बहादुर
वीर महात्मा था।
ईश्वर भक्त श्री राम के अनुयायी,
वैष्णव जन के हमराही थे।
तभी उन्होंने गाया था –
” वैष्णव जन तो तेने कहिए,
पीड़ पराई जाने रे” और
” ईश्वर अल्लाह तेरो नाम”-
गाया था।
राष्ट्र का उत्थान एवं स्वतंत्र
कराकर,
बना वह देश का ‘ राष्ट्रपिता “।
सत्य अहिंसा की मूरत था वह,
कहलाया साबरमती का संत।
चरखा और खादी है पहचान,
जन जन में वह ‘ बापू’ कहलाया।
आजादी के पुरोधा हैं,
पहचान सर्व भारत की।
नाम सदा सदा अमर रहेगा,
संत करमचंद गांधी बापू का।
अमर रहेगा सदैव जुबां पर
सभी देशवासियों के –
” देदी हमें आजादी बिना खड़क
बिना ढाल,
साबरमती के संत तूने कर
दिया कमाल”।
रघुपति राघव राजा राम
जय हिन्द जय भारत
तुम क्या हो
तुम क्या हो, कौन हो तुम
जरा तो मुझे बतलाओ।
कोई हूर या फरिश्ता या
इंसानों में कोई देव स्वरूप हो।
करूं तुम्हारी पूजा या इबादत
जरा तो मुझे बतलाओ।
रागों में तुम राग मल्हार हो-
पुष्पों में सुगंधित लाल गुलाब हो,
साजों में तुम सारंगी सी सरीले हो।
बागों में जैसे सावन की बहार हो
जरा तो बताओ तुम क्या हो।
कागजों में तुम्हें शब्द बना उतारूं
तो तुम पूरी किताब हो।
जीवन में बेहिसाब जवानी – हो तुम
इत्र में मेरे लिए तुम केवड़े
को खुशबू हो।
बताओं तुम क्या हो।
ख्वाबों में मेरे ईश्वर के भेजे हुए
दिलरूबा फरिश्ते हो।
तुम क्या हो जनाब!
तुम जो भी मेरे लिए खुदा से कम नही हो।
मेरे मन का बसंत
बसंत है मेरे मन का,
पुष्पित हो जीवन महकाता।
क्षण क्षण खिलते इतराते,
चहुं ओर खुशबू फैलाते।
पीत रंगों की सरसों के पुष्प,
खेतों की रौनक बढ़ाते।
भंवरे, दादुर पपीहें कोयल
मस्त हो उन पर नाचते गाते
पल्लव कलीयां सभी पल्लवित
हो पीत रंगों की शोभा बढ़ाते।
देख देख बागों और खेतों की,
बसंती आवरण मन मेरा हर्षाए।
जाते हुए शिशिर फाग लाता है,
बसंती रौनक और बैसाखी –
होली व सरस्वती पूजा।
किंसुक-पलाश और टेसू के
पुष्प वृक्षों पर खिलतें।
मेरे मन का बसंत ऋतु आई,
बसंत पंचमी के पर्व को लाई।
पीत वसन पहनते पीत ही तब,
भोजन प्रशादी का ईश को हम- भोग लगातें।
मेरे मन का बसंत हर्षाता,
मल्हार राग गाता – नाचता।
ऋतुराज बसंत मेरे मन को है भाता ,
घर घर में पीले वस्त्र धारण कर
पीले प्रशाद भोजन ईश को – चढ़ाते,
मां सरस्वती की पूजा करते हम
पीले पुष्प व पीत ही भोग – लगातें।
मेरे मन का बसंत धूमधाम से मनाते।
गणतंत्र दिवस
भाव यही है हृदय व मस्तिष्क में,
कुछ भी रहे या नही रहे जग में;
26जनवरी हमारी अमर सदा रहे।
राष्ट्र भक्ति की रस धारा प्रत्येक
जन के हृदय में बहती रहें।
गंगा जमुनी तहजीब के पुजारी,
हैं भारत के सभी जाति-प्रजाति।
गणतंत्र है देश है हमारा गौरव है, बेमिसाल,
वतनपरस्ती का जज़्बा आज हमारे दिल में।
राष्ट्र प्रेम का निर्मल झरना मन में बहाओं,
संस्कृति, सभ्यता एवं परम्पराओं
का अलख जगाओं।
छब्बीस जनवरी हमें सिखाता
कौम को काबिलों मत बांटो,
इस यात्रा को मीलों न बांटों।
राष्ट्र हमारी इक नदी समान है,
यहां बहती गंगा जमुना सरस्वती
बहती है यहां अविरल धारा।
इन तालों को झीलों में न बांटों
छब्बीस जनवरी को अमर-
ही रहने दो।
हर देशवासियों की आत्मा हो,
दिलों की धड़कन में हो यह
अप्रतिम गान।
” हर करम अपना करेंगे –
ऐं! वतन तेरे लिए,
दिल दिया है,जान भी देंगे
ऐं! वतन तेरे लिए।”
विहंसता तिरंगा
हिम्मत, शौर्य और ताकत,
विहंसते आज तीन रंग हर्षाया है।
सम्प्रभु हैं हम, है स्वराज हमारा
आजादी को शत शत नमन –
है हमारा।
जज़्बातों की बगिया में महकी है,
राष्ट्र -धर्म- अभिनंदन हमारा।
ज्ञान -विज्ञान एवं अंतरिक्ष भी,
जीत लिया है,
कला और साहित्य प्रगति के,
पैमाने को लाये हैं हम अग्रिम।
सम्प्रभु हैं हम 15 अगस्त 1947-
में लाए हम ।
अर्थ व्यवस्था, रक्षा, सेना सभी,
पराकाष्ठा के स्तम्भ पर लाये हम।
गंगा जमुनी तहजीबे हैं हम,
विश्व गुरु कहलाए हैं हम।
हाथों में तिरंगा, दिलों में गर्व,
मस्तक ऊंचा कर कहते हम-
आजाद हिंद के नागरिक हैं।
विश्व नही है कोई मेरे मातृभूमि-
समान,
तीन रंगों में सजा है राष्ट्र ध्वज –
हमारा न्यारा,
है ‘ तिरंगा ‘ झंडा प्यारा।
शीर्ष पर है रंग केसरी,
शौर्य का है प्रतीक।
श्वेत शांति का द्दोतक ,
हरा रंग उर्वरकता और-
विकास दर्शाता।
नहीं झुकें हैं, नही झुकेंगे,
परतंत्र के आगे।
स्वतंत्र हैं हम 15अगस्त ,
1947 से –
सदैव रखेंगे आन-मान-शान
ऐ! वतन तेरे लिए।
बेटियां
बेटियां नहीं होती हैं बोझ,
होती हैं फूलों की तरह –
खूशबू चंदन की तरह।
महकती हैं घर आंगन को,
चम्पा, चमेली पुष्पों की तरह।
स्वयं की चहल कदमों से करतीं,
आबाद गृह के सूनेपन को।
ईश्वर की दी हुईं बेटीयां बोझ नहीं,
हल्के करतीं माता पिता के –
जिम्मेदारियों को।
बेटों से कम नहीं होतीं है बेटी,
बेटों का दायित्व है माता पिता – की सेवा,
आधुनिकता की आड़ में बेटे;
कर जाते हैं माता पिता से दगा।
बेटीयां हमेशा बोझ नहीं,
दायित्व समझती हूं माता पिता – के प्रति।
जन्मते ही समाज में मार दी जाती हैं,
बोझ समझकर लड़कियों को।
पुरूष या बेटे अपने कार्य क्षेत्र में,
न पसंद दायित्व को बोझ समझते हैं।
समाज में बेटी को बोझ समझकर,
कोख में ही मार दी जाती हैं।
हिन्दू समाज में दान दहेज के भय से,
बोझ समझी जाती हैं लड़कियां।
निकम्मेपन में बोझ बन जाती है जिंदगी,
आत्महत्या करने को आमादा –
हो जाते हैं लोग।
सक्षम व शैक्षिक होते ही संतान
स्वावलंबी बन जाता हैं,
माता पिता के लिए नही होतीं संतानें।
जीवन में जीविकोपार्जन अति आवश्यक है,
वरन् बोझ बन जाती है – ज़िन्दगी
विद्वान हों या साधारण इंसान या हों संत ,
बिना जीवन के कार्यकलापों के
बोझ बन जाती है ज़िन्दगी।
मानव जीवन में कर्मठता है आवश्यक,
नही तो बोझ बन जाती हैं – परिस्थितियां।
सक्रिय रहना मानव का गुण होना चाहिए,
नही तो बोझ बन जाती है – स्वयं की जिंदगी।
सुभाष चन्द्र बोस

महान स्वदेश प्रेमी नेता,
वही हमारा सुभाष चन्द्र बोस था।
कोटि-कोटि नमन है उनको,
यही हमारा अव्दितीय नेता है।
विद्या के अपूर्व संयमी थे,
बने थे प्रथम ICS हाकिम
जीवन में।
देश भक्ति में नही उनका सानी,
स्वतंत्रता का अद्भुत सेनानी।
आजाद हिंद सेना का प्रवर्तक,
शत्रुओं का कट्टर दुश्मन थें वो।”
अंग्रेजो के थे कियें थे दांत खट्टे,
किसी से कभी नही ‘ वे ‘ हारे।
नई योजनाऐं बनाकर राष्ट्र को,
अंग्रेजों से किया था स्वतंत्र।
जय सियाराम
” जय सियाराम”
सखी री मोरे घर श्रीराम
पधारे आज।
मंगल गाओ बधावें गाओ
सखी री मोरे घर श्रीराम
पधारे आज।
चौक पुराओ अल्पना सजाओ,
बन्धनवार बंधाओ आज।
मोरे घर सियाराम पधारे आज,
चंपा, चमेली बेला व जूही –
मोगरा गुलाब महक रहें अंगना।
हीरे मोती जवाहरात जड़ित,
सोने चांदी का अनमोल सिंहासन-
सिता संग विराजे संग लिए;
लक्ष्मण भ्राता।
मोरे घर श्रीराम पधारे आज।
बेर सभी कंद मूल, छप्पन भोग,
प्रशादी और गंगा जल से करूं –
मैं मनुहार।
सहस्त्र कोटि दियों से करूं मैं
आरती,कर दंडवत प्रणाम।
सखी री मोरे घर श्रीराम पधारे आज।।
महाकुंभ स्नान
ज्योतिषी नक्षत्र गणना शास्त्र
सम्मत कुंभ आता है,
हिंदू जन संत सभी ऋषि इस
परम्परा के अनुयाईं हैं।
आस्था का आस्तिक का महा पर्व,
हरिद्वार इलाहाबाद प्रयागराज में
महाकुंभ है आता।
सनातन धर्म सुखदायी है यह शाही स्नान,
गंगा में डुबकी लगाने पहुंचते हिंदू
वासी- प्रवासी।
मानव,देव ऋषि मुनि सभी इस –
स्नान से पाते हैं पावन मुक्ति।
१२ वर्षों के बाद आता यह योग,
हर मानव चाहता इस अवसर का
हृदयतल से उठाना लाभ।
गंगाजल में इस स्नान का अति ही महत्व,
इस जल में सम्भावित होती हैं,
अमृत की बूंदें।
जन्म जन्म के पापों को धुल जायेंगे,
आत्माऐं महाकुंभ स्नान से हो
जायेंगी विशुद्ध पावन।
सवाल
सवाल दिल में सारे दफना दिए हमने,
सारे राज अपने जिगर में दफना दियें हमने।
शिकन सारे चेहरे के हमने छिपा लिये हैं,
रोशन फिर भी हमने चिराग को रखा है।
उम्मीदों की मंजिल अब दूर नही,
पाकर ही हम अब दम लेंगे।
मुसाफिर हूं पर थकती नही यारों,
दर पर दर चलती ही जाती हूं मैं।
हमें भी तो प्रयत्न करना है
हमें भी तो प्रयत्न करना है,
मजहब वालों को सिखाना है।
सनातन धर्म का करें वे भी सत्कार,
हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई
सभी हैं भाई भाई।
सभी हैं एक ईश्वर की संतानें,
फिर क्यूं करते हैं आपस में – लड़ाई।
एक ही ईश्वर बट गयें हैं
भिन्न भिन्न नामों में,
हैं यह है मानव की नादानी।
गंगा जमुनी
गंगा जमुनी तहजीब है
सभी हैं भाई भाई।
ईश खुदा एक ही हैं,
ये दूरियां हमने ही बढ़ायीं।
जाता पात पूछत नही कोई,
प्रभु जो भजे वह प्रभु को होई।
क्या सितम है के घटा
क्या सितम है के घटा ,
उठकर भी बरसती नही।
खुश्क खेतों पे बरसती नही,
हर रंग में हमने तूझे खूब –
ऐ! फितरते दुनिया देखली।
रवि बिन प्रात
रवि बिन प्रातः व दिन नही होता,
चांद व तारों के बिना रैन नही होती।
दिन के बिना कोई कार्य नही होता,
रात्रि के बिना विश्राम नही होता।
यह समय चक्र भी अजीब है मित्रों,
ईश के इन प्रहरों के बिना,
हम इंसानों का जीवन नही चलता।
रोटियां
सौगात में मिली हैं हमें ये रोटियां,
ऊपर वाले ने बदन को सुरक्षित
रखने को दी हैं ये रोटियां।
मन चित आनन्द की मूल हैं – यें रोटियां।
जीवन की हर खुशी का आधार हैं ये रोटियां,
ईश्वर की दी हुई नियाबत हैं ये रोटियां।
रोटियां न होतीं तो क्या कोई प्राणी जीवित रहता,
भूख से गोपाल का भजन सम्भव नही होता।
रोटियां ही तो आदम- इव को जोड़तीं,
रोटियां ही जीवन को सक्रिय – हैं रखतीं।
पेट दिया प्रभु ने हमें तो उसे,
क्रियाशील रखने के लिए – दी हैं ये रोटियां।
गुणगान करें हम हृदय से ईश का,
जिन्होंने हमें जीवित रहने के –
पेट के साथ साथ दी हैं रोटियां।
रोटी नियाबत
नादान है उम्र का,
दुनियादारी से अनभिज्ञ।
चला है करने जुगाड़,
दो जून की रोटी का।
पीठ पर लाद रद्दी का बोरा,
हाथ में कचरा के थैला।
भारी हैं कबाड़ से,
कुदरत की है मार।
ईश क्यों कराते बचपन में,
इंसान से ऐसे कार्य।
बोझ तले बना है जीवन,
माता पिता की मजबूरी में;
अपंग मां बाप की कर रहा सेवा।
बचपन बिना पढ़ लिखकर खोया,
नहीं होता पुस्तकों का ज्ञान।
कर्त्तव्य के आगे छूटा विद्या -ज्ञान
मजबूरी में रह गया बेचारा,
निरीह अज्ञान।
झुग्गी झोपड़ी ही सही घर,
परन्तु नहीं बना बोझ किसी पर,
मस्त रहता है बाल।
पंतग
चली चली रे मेरी पतंग
इतराती वो देखो बलखाती।
कुछ पीली, कुछ नीली और
कुछ लाल कुछ हरी मन को भाती।
श्वेत नील गगन पर उड़तीं,
भानु के रूपहर्ले और स्याम-
रूप का अवलोकन करतीं।
कटतीं तो किसी को परेशां करतीं
किसी के हाथ लगकर उनको – हर्षातीं।
जनमानस का मनोत्साह बढ़तीं।
भाईचारा और परिवारिक मेल- बढ़ातीं,
आपसी बेजोड़ सहयोग व – सानिध्य देती।
नाना प्रकार के व्यंजन मिष्ठान
का होता है आयोजन,
तिल गुड़ के लड्डू,तिल पट्टी
मेवों का रहता है इन्तेज़ाम।
सभी जन मिलजुल कर मनाते
यह पतंग उत्सव,
मेलजोल का है यह पर्व
मकरसंक्रांति
मकरसंक्रांति का पर्व
लाता पतंगों के संग।
नीले श्वेत आकाश में
प्रकाशित रहता है व्योम।
रंग बिरंगी स्वरूपों में,
नभ में लहरातीं पतंगे।
मनों को हर्षित करतीं,
लोगों को मनोरंजित करतीं।
बच्चों, वृद्ध और सभी लोगों को,
उत्साहित एवं सक्रिय रखती।
भारतीय संस्कृति का बेजोड़ पर्व,
मकरसंक्रांति हिंदूओं की आस्था बढ़ातीं है।
पतंगों के इस त्यौहार का नैत्रों की
ज्योति पर भी होता सकारात्मक प्रभाव।
सीख देती है हमें भाईचारा हो,
परिवार व सभी समाज के साथ।
विषम परिस्थितियों में भी जीवन,
रंगीन हंसता खेलता रहे सदा।
छोटे बड़े अमीर गरीब का ना हो भेदभाव,
सभी मिलकर हंसते गाते मनायें
यह मकरसंक्रांति का त्यौहार।
वो काटा यह काटा हंसते हुए,
पर्व का स्वागत करते हैं सब यार।
मेलजोल का यह अव्दितीय यह – त्यौहार,
मकरसंक्रांति का पावन त्यौहार।
दान पुण्य का अचूक है पर्व,
खीचड़ी, अन्न वस्त्र का करते – लोग दान।
लोहड़ी का त्यौहार
मुख्य पर्व में है यह त्यौहार,
सिखों व पंजाबीयों का हर्षोल्लास
का उमंगो का त्यौंहार।
समस्त देश व विदेशों में भी मनाते
सिख और पंजाबी यह त्यौहार,
नाम दूसरा भी लोहिता है।
श्रीकृष्ण ने राक्षसी लोहिता का
किया था संहार,
कंस ने श्रीकृष्ण के संहार करने
को किया उसका उपयोग।
दुल्ला भट्टी ने जब लड़कीयों का
हिंदूजनों से विवाह करवाया,
उसे पंजाब का नायक कहलाया।
याद की उसी के मनाया जाता है
लोहड़ी का त्यौहार।
सांयकाल आसपास के सभी जन
सपरिवार एक स्थान पर एकत्रित
हो अग्नि केम्प का आयोजन –
करते हैं।
रेवड़ी मूंगफली को अर्पण अग्नि
करते,
सभी जन परिक्रमा कर जल –
अर्पित करतें।
ढोल नगाड़ो की धुन में सभी जन
नाचते गाते।
ऐसे ही मनाते सभी जन लोहड़ी
का त्यौंहार।
स्वामी विवेकानंद

१२जनवरी १८६३को कलकत्ता में
जन्मा था,
भारत का एक प्रबुद्ध सपूत।
नरेंद्र नाथ कालांतर में प्रसिद्ध हुआ
स्वामी विवेकानंद नाम से यह हूर।
युवा होकर रामकृष्ण परमहंस के,
सान्निध्य में जुड़ा वह।
देश में नव जागरण की अलख
जगा दी थी उसने –
” उठो जागो,मत रूको
युवा तुम लक्ष्य पाने तक”
कहा स्वयं के लिए जीना पशुवत
जीना है,
समझाया राष्ट्र के नौजवानों को।
रामकृष्ण मठ स्थापित कर वे,
वे बन गये महान योगी और
संत बैरागी।
भारतीय हिन्दू धर्म से पश्चिमी देशों
को अवगत कराया था।
हिंदू धर्म एवं संस्कृति का किया
प्रचार व प्रसार,
सर्वधर्म मान्य हैं भारत और
विदेशीयों का समझाया।
ईश्वर को खोजना है तो जीवित
प्राणी एवं अपने ही दिल में
खोजों तुम।
ऐसे व्यक्तित्व वाले महान देशभक्त
विवेकानंद अब तक अब तक न
ही कोई दूसरा पैदा हुआ विश्व में।
शत शत नमन भारत-गौरव
लाल बहादुर शास्त्री
” पुन्य तिथि पर कोटि-कोटि नमन”
गुदरी के लाल को करते हैं स्मरण,
सन् पैंसठ में जिसने शत्रु को –
था ललकारा।
खेत और सरहद दोनों से प्यार अजूबा,
जय जवान जय किसान का गूंजा
था नारा।
गूदरी के लाल को नमन हमारा।
दिया था पाकिस्तान को तगड़ा झटका,
वह ताड़ से गिरा था और-
खजूर पर अटका।
छोटा कार्यकाल और बड़ी बड़ी
उपलब्धियां,
शत्रु सिर न उठा पाया फिर दुबारा।
दुनिया में बजाया था राष्ट्र का –
विजय का डंका,
किसी भी दिल में रही नही शंका।
दुबला पतला तन,गगन से था –
ऊंचा उसका मन,
चमका था आकाश में इक अद्भुत
सितारा।
ताशकंद में जो बनी थी दुखद –
गाथा,
नही भूल सकता है कभी हिन्दूस्तानी।
फर्श से अर्श तक का सफर रहा
शानदार,
सादगी में उन्होंने पूरा जीवन था
गुजारा।
पुन्य तिथि पर गुदरी के लाल को,
करते हम शत शत नमन।
‘ भारत रत्न ” की उपाधि से
इन्हें नवाजा,
राष्ट्र के अनमोल रत्न थे हमारे।
विश्व हिंदी दिवस
हिंद हैं हम, मातृभाषा है
हिंदी हमारी,
कौन कहता है, भाषा पिछड़ –
रही है हमारी।
भारत मां के माथे का ताज है
हिंदी,न कभी अस्तिव हीन थी,
न कभी मिटेगी इसकी पहचान।
इस पर है हमारा जन्मसिद्ध – अधिकार।
बढ़ा है इसका विदेशों में भी –
रूचि और सम्मान,
सीख पढ़ रहे हैं विदेशी ‘ इसे’ देकर मान।
विश्व में हो रहा है इसका -यशगान,
किन्तु विश्व – बन्धुत्व बनायें,
रखने हेतु रखना होगा हमें –
अन्य भाषाओं का भी मान।
अंग्रेजी भाषा है सेतु,
जिसके सहारे हम हिंदूस्तानी-
करते शासन, प्रशासन और व्यापार।
निति- कूटनिति,शासन एवं,
प्रशासन सभी चलते हैं –
दोनों ही भाषाओं के साथ।
अंग्रेजी पढ़ना सिखना, बोलना
नही हैं मातृभाषा का अपमान।
हिंद हैं हम, हिंदी पर है हमें नाज़
सदा रहेगा भारत माता के ताज।
हिंदी है सिरमौर अन्य भाषाओं, पर आज।
सुबह का है मनमोहक आलम

सुबह का है मनमोहक आलम,
बज रही है बंसी मधुर मधुर।
राधा संग मोहन हैं सम्मोहित,
सुध बुध खोकर बजा रहे हैं मुरली।
अनुपम सौंदर्य लावन्य तुम्हारा,
दिव्य स्वरूप हर लिया हमारा।
मोर मुकुट माथे पर सोहे,
मीना, रत्न जड़ित स्वर्ण-
आभूषण अंग पर सुशोभित।
शीत लहर की ऋतु है मनमोहन,
गर्म शाॅल से अपने आपमें रहना
देह की आखिरी सफर
श्वेत कफन में लिपटी निर्जीव
काया फूलों से सजा दी गई।
कुछ समय पूर्व वह आत्मियरिश्तों में बंधी थी।
एक प्रमुख पहचान लिये,
थी सजीव थी परिवार के मध्य में।
नाम था बहुत प्यारा,
सम्बोधन भी था अत्यंत प्यारा।
कुछ समय पहले सभी के हृदय
में बसी थी,
सांसों के तार चलते हुए,
आते जाते सभी से जुड़े हुए थे।
काल के पदचाप की पहचान,
नही किसी को मालुम थी।
यूं ही अचानक हाथ बड़ा उसने,
सांसों की तोड़ी थी डोर।
परिवार व सगे संबंधियों के समक्ष,
बुझ गई थी उसकी अन्तिम श्वास।
रिश्ते सभी छूट गये,
नाम पता सब लुप्त हो गए।
अंत में नाम का ही उसका,
पार्थिव शरीर ही रह गया।
आत्मा भी छूट गई तब ,
तन के बंधन से।
छूट गया तब काया का मोह,
उड़ चली तब आत्मा अनंत
की ओर।
सांसों की कड़ीयां अब टूट गईं,
ले चली उसे अन्तिम यात्रा पर।
रिश्ते नाते,सगे संबंधी व मित्रों
का अटूट साथ,
कोई भी नही रहा अन्त में साथ।
जीवन यात्रा समाप्त हुई,
अब यात्रा समाप्ति की ओर चली।
चल पड़ी चार कंधों पर हो सवार,
छोड़ दिया अब जग का साथ।
नया नाम अर्थी का लेकर,
खामोश चिर निद्रा में सो रही है।
अन्तिम यात्रा में चल पड़ी है,
संस्कार होंगे स्वर्ग में जाने को।
यादें
याद आता है वो घने कोहरे के
बीच तेरा लावन्य स्वरूप,
पंखुड़ियों की दमकती हुई मुस्कान
हर लेती है मेरा चैन।
रंगीन वादियों के बीच चलते –
यूं इतराना तेरा,
लगा जैसे कि तुमने मुझे इशारा
किया है।
बज्में हया से दूर भागा मैं कि
तेरे दिल ने पुनः मुझे बंदिश में
बांधा है मुझे।
जाने वाले लम्हे याद आने वाले लम्हे
लम्हे जो चले जाते हैं,
यादों के मेले छोड़ जाते हैं।
जाने वाले लम्हे यादें दे जाती हैं,
आने वाले लम्हे आशाओं के
स्वप्न संजोते हैं।
संघर्षो का जीवन दुखद होतें,
चैन से न सोने देते न ही जागने देते।
कभी जीविकोपार्जन की चिंता,
कभी समाज की मर्यादा।
जाने वाले लम्हे कितने ही –
कष्टप्रद हों पर,
आने वाले लम्हे सदैव सुखदायी होंगे।
राष्ट्र हमारा सदा ही सार्वभौमिक,
आने वाला लम्हे में होगा –
यह विश्व का अलौकिक ताज।
बीत गई सो बीत गई अब न,
परतंत्र का राज होगा।
याद आने लम्हे वाले हमारे सदा
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होंगे,
धर्म, सौहार्द व सार्वभौमिक
राज होगा।
जाने वाले लम्हों को दफनाओं,
आने वाले लम्हों को सजाओं।
ईश्वर,साधु -संतो और मुनियों
का यही संदेश,
” बीत गईं सो बीत गई,
आगे की सुध ले। “
अतः जाने वाले लम्हों को
जाने दो और,
याद आए लम्हों को सजाओं।
वर्ष २०२५
नया वर्ष आया है,
खुशीयों का खजाना लाया।
नही कभी कोई गम लाये,
सदा सुख शांति का पैगाम लाये।
प्रसन्नता ही रहे हरपल दिलों में,
नैत्रों में न कभी किसी के अश्रु – आए।
सर्वत्र सदा विजय का क्षण हों,
नववर्ष में हर्षोल्लास का नाम हो।
भूलाकर पिछले गीले शिकवें,
सभी गले मिले, मिलजुल कर – रहें।
वर्ष त्वष२०२५ को सौभाग्यशाली बनाऐं ।
संध्या जो यादगार बन गई
वर्ष के बीतने का हलका सा गम,
‘और ‘आने वाले नववर्ष की खुशी,
दोनों का मिला जुला एहसास – दे गई;
वो संध्या जो यादगार बन गई।
नृत्य,गजल और संगीत की
मनमोहक स्वर लहरी,
वातावरण को खुशहाल – बना गई।
वो संध्या………
मंगलमय वर्ष की कामना करती,
पटाखे आतिशबाजी से जन जन
स्वागत करते।
वह प्रखरसंध्या रोशनी से नहा गई
वो संध्या जो………………….
जाने अनजाने अपने कार्य
कलापों का,
लेखा जोखा,लेंन देन का-
हिसाब करती।
अपनों के मनों को टटोलती
खट्टी-मीठी एहसास देगई।
वह संध्या सभी को रास आ गई,
यह संध्या जो………………..
अतीत और भविष्य को मिलाती
जोड़ती,
मिलने व बिछुड़ने का सुख दुख-
अपने परायों का भेद मिटातीं ।
यह संध्या यादों को खुशनुमा –
किताब बन गई।
वह संध्या जो यादगार बन गई।
विदा दिसंबर
यह वर्ष भी कुछ खुशी
कुछ गम देकर चला गया।
सभी से मिलकर हंसाकरचला गया।
दिल की कोई आरज़ू खाली नही गई,
खूब मस्ती और हंसते हंसाते चला गया।
गाते खेलते नाचते खुशीयां दे गया,
मीठी मीठी सुहानी स्मृति दे गया।
अपनों के साथ कभी खुशी कभी गम ,
हौसलों के साथ सहन करते रहे हम सभी।
गुड़ का हलवा, मूंगफली खाते हुए समय बिताया,
गोंद के लड्डू और मेवे की
बर्फी खाते गुजर गया माह।
जाता हुआ दिसंबर में समेटे
खुशीयांऔर भूलादें सारे – गम हम सभी।
हंसी -खुशी से मनायें हम
इस जाते माह को,
अच्छी व मांगलिक यादों
के लिए इसे समेट लें हम।
जाता हुआ दिसंबर हमें यह
कहकर जा रहा,
” बांट लो सभी प्रेम के पुष्प
एवं शुभकामनाऐं फिर –
तुम मुझे विदा करना प्रिय।
नववर्ष का गर्मजोशी से –
स्वागत करना,
सदा ही प्रसन्न,स्वस्थ और
उन्नत रहेना।”
अलविदा ऐ!२०२४ दिसंबर।
दिल
हमें तुम से प्यार कितना यह
तुम नही जानते,
दिल सम्हालते सम्हलता नही
यह तुम जानते नही।
यादें तुम्हारी हरदम सताती हैं,
भूलना भी चाहें पर भूल नही पाते।
वो चांदनी रातें,
वो समंदर का किनारा-
तुम्हारे हाथों में हाथ हमारा।
वह इश्किया साथ हम –
भूला नही पाते।
सपनों में तुम्हारा आना जाना,
हमें खुश कर जाना हम
भूला नही पाते।
हमें तुम से प्यार कितना
यह तुम नही जानते।
दिल सम्हालते सम्हलता नही
यह तुम नही जानते।
आओ तुम अगर उजाले- दिन के,
नही छोड़ेंगे तुम्हें यह तुम नही जानते।
हमें तुम से प्यार कितना
यह तुम नही जानते।
मनमोहन सिंह
मनमोहन नही वो मन को,
मोह लेने वाले व्यक्तित्व थे।
ज्ञान का भंडार थे वो,
अपना अस्तित्व को लुप्तकर
ब्रह्मलीन हो गए सदा सदा।
विश्व विख्यात अर्थज्ञ कांग्रेस के
अपूर्व संयमी विलक्षण नेता।
सन् २००४ से २०१०तक देश में,
विकास का अभूतपूर्व कार्य –
किया।
वैश्विक आर्थिक मंदी के काल में,
मात्र संवारा ही नही वरन् सक्षम
गति भी दी थी।
निष्कपट एवं सादगी रहने सहन
था उनका,
देश का एक असाधारण नायक
आज खो दिया हमने।
जाने वाले लम्हे : याद आने वाले लम्हे
लम्हे लम्हे लम्हे,
यादों के लम्हे।
कुछ लम्हे जीवन के,
यादगार बन जाते हैं।
लम्हे कुछ जाते जाते,
नयें रिश्ते जोड़ जाते हैं।
ज़िन्दगी रूकती नही,
किसी के आने जाने से।
कुछ लम्हे खामोश हो जाते हैं,
कुछ लम्हे आनंदित कर देते हैं
किन्हीं के आने से।
कुछ लम्हे आनंदित करतीं है,
कुछ लम्हे जीवन में यादें –
छोड़ जाती हैं।
बिछुड़ने वाले लम्हे हमें,
रूला जाती हैं,
आगमन किसी का हमें खुशी
का लम्हा दे जाता है।
ज़िन्दगी अपनों में ही बसती है,
इन्हीं के स्मरण में लम्हें हमारे
गुजरते हैं।
आने वाले लम्हे व जाने –
वाले लम्हे,
सुख दुख का जोड़ा है प्रिय।
कुछ अधूरे किस्सों को हम,
नयी कहानीयों से जोड़ते हैं।
कुछ लम्हे ज़िन्दगी के,
यादों से जोड़ दिए जाते हैं।
श्री अटल बिहारी वाजपेई
राजनीति में संत थे,
राष्ट्रवाद के थे सिरमौर।
शुचिता का जीवन जिया,
ख़ामोश हो गया वह शोर।
धुमकेतु थे साहित्य के,
राजनीति में थे वे संत।
अटल,अचल अविराम थे,
मेधा अमिट अनन्त।
जीवन को आहूत किया,
रखा राष्ट्र को स्वतंत्र।
अंतर की व्यथा को दबाकर,
लिखें काव्य अनेक।
संघर्षो के संग रार किए,
रहे संयम अटल एवं विवेक।
अन्तिम यात्रा पर चले गए,
दे राष्ट्र को स्वाभिमान।
राष्ट्र सदा ही ऋणी रहेगा,
हैं सदा शांतिदूत अवतार।
जाने वाले लम्हे : याद आने वाले लम्हे
लम्हे जो चले जाते हैं,
यादों के मेले छोड़ जाते हैं।
जाने वाले लम्हे यादें दे जाती हैं,
आने वाले लम्हे आशाओं के
स्वप्न संजोते हैं।
संघर्षो का जीवन दुखद होतें,
चैन से न सोने देते न ही जागने देते।
कभी जीविकोपार्जन की चिंता,
कभी समाज की मर्यादा।
जाने वाले लम्हे कितने ही – कष्टप्रद हों पर,
आने वाले लम्हे सदैव सुखदायी होंगे।
राष्ट्र हमारा सदा ही सार्वभौमिक,
आने वाला लम्हे में होगा –
यह विश्व का अलौकिक ताज।
बीत गई सो बीत गई अब न,
परतंत्र का राज होगा।
याद आने लम्हे वाले हमारे सदा
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होंगे,
धर्म, सौहार्द व सार्वभौमिक राज होगा।
जाने वाले लम्हों को दफनाओं,
आने वाले लम्हों को सजाओं।
ईश्वर,साधु -संतो और मुनियों
का यही संदेश,
” बीत गईं सो बीत गई,
आगे की सुध ले। “
अतः जाने वाले लम्हों को
जाने दो और,
याद आए लम्हों को सजाओं।
कुछ लफ्ज़ हमारे
उसने वफा न की तो, बुरी बात क्या हुई,
मजबूरीयां भी होंगी,वो दिल का बुरा नही।
जिंदगी क्या खबर , कहां ले जाए,
के तुम मेरा, इंतजार मत करना।
मेरे रोने पर छुप छुप कर
उनका रोना रोना हाय रे हाय।
पोंछकर उमड़े आंसू,
वो आंचल का भीगोना यारब।
दिल थाम के लोगें जब भी मेरा नाम तुम,
इक आह बनकर आऊंगी लब
पर तेरे,जब भी आऊंगी मैं।
हम उम्मीद रखते हैं वफा की उनसे,
जो नही जानते वफ़ा क्या है।
दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूं आई,
के जगमगा उठे जिस तरह मंदिरों में चिराग़।
किसान
किसान नही यें धरती के
भगवान हैं।
हालत इनकी देश में,
दयनीय भारी है।
फटा फटा है धोती -कुर्ता,
पगड़ी सिर पर फटी फटी।
अन्न,साग,फल से भरते,
पेट हम इंसानों का।
अन्नदाता कहें हम इनको,
या कहें इन्हें हम जीवन दाता।
दोनों ही नामों से क्यूं न करें,
सजदा हम इनका।
इंसान नही भगवान सा,
है स्वरूप इनका।
लाचारों में गिनती करदी,
आज हमारे किसानों की।
अनुदानो को इनकी खा जाते हैं
सरकारी नुमाइंदे और अफसर।
नही कोई नियंत्रण इन पर,
सरकारी सम्राट का।
झूठे सपने झूठे वायदें करते,
प्रगतिशील राष्ट्र के विधाता।
आत्महत्या कर रहे हैं केई,
हमारे मजबूरन अन्नदाता।
आओं मिलकर बनायें,
हम इक नया विधान;
न्याय मिले,फले फूले,
हमारे पूजनीय किसान।
दाल बाटी चूरमा
दाल बाटी चूरमा खायेंगे ,
जाड़े को भगाऐंगे ।
कंपकंपाती काया को,
स्थिर सुखद बनायेंगे।
संग साथ में मित्रों के हम,
प्रभु के गुण गायेंगे।योग
है योगेश्वर है विश्वेश्वर,
तुमने दिया है यह वरदान;
करें योग दूर करें सभी रोग-
जीवन हो सुदृढ़ व आसान।
है मिला यह ईश्वर से योग,
सुधर जातें हैं लोक -परलोक।
त्रिविध संतापों से करता मुक्त,
जगाता आलौकिक शक्तियों
संजोग।
आओ सब सिखें मिलकर,
स्वस्थ एवं निरोगी होकर;
अर्पण करें योगेश्वर को
अपना तन और मन।
दिव्य शरीर बनाता योग,
ईश्वरीय शक्ति का है प्रदाता।
रोग- चिंता व तनाव से देता,
मुक्ति है यह दिव्य योग।
आनंदित – प्रफुल्लित करता,
मानव को ईश्वर से जोड़ता।
दिव्य शक्ति बन परमात्मा में
मिल जाता,
आओ सभी मिलकर सिखें योग
प्रभु से मिलन का बनाऐं
संजोग।
सरदार वल्लभ भाई पटेल

सुगंध जिसकी से महका
सारा हिन्दुस्तान,
वो थे वल्लभ भाई पटेल
भारत की शान।
प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी
भारत की आजादी के नायक
थे वे महान।
आजादी के बाद बिखरी –
रियासतों का भी,
किया एकीकरण, लौह पुरुष
कहलाये थे ।
स्वाध्याय से प्रारम्भिक शिक्षा
ली थी लंदन जाकर,
बैरिस्टरी की पढ़ाई में प्रथम
स्थान था पाया।
बारडोली सत्याग्रह की सफलता
के पश्चात,
‘ सरदार ‘ की उपाधि पाई थी।
शत्रुओं के लिए लौह पुरुष थे,
मरणोपरांत भारतरत्न कहलाये
हैं वे।
हृदय कोमल, आवाज सिंह –
दहाड़ थी,
भारतीय राजनीति के थे वे
प्रखंड विद्वान।
शत शत नमन ऐसे महान युग
पुरूष को,
थे वे हमारे राष्ट्र की आन मान
शान।
युवाओं की शक्ति
युवाओं में शक्ति हो,
युवाओं में जोश हो;
बादल सा उनमें गर्जन –
घोष हो।
ज्वाला सी जोश हो,
फिर क्यों पड़े मदहोश हो।
अम्बर है आवास तुम्हारा,
मत भटकों तुम इन गलियों में।
तुम बिन सूना आकाश सारा,
सितारों का संग है सभा तुम्हारा।
अभिलाषा हो तुम भविष्य –
के तुम,
भूखे अनाथों के सूत्रधार हो –
तुम।
राष्ट्र के गौरव हो तुम,
बल-पौरूष की परिभाषा –
हो तुम।
स्वाभिमान है शस्त्र तुम्हारा,
इसका संधान करो तुम।
योग व साधना से तुम,
सर्वशक्तिमान बन जाओ।
प्रयास करो धर्म सुरक्षित रहे ,
फल की चिंता त्याग कर;
लक्ष्यों को साधो तुम।
अपनी शक्ति पहचानों तुम,
इस धरा की आन मान शान
हो तुम।
युवाओं अपनी शक्ति पहचानों
तुम,
जोश के अम्बार हो तुम।
हास्य काव्य
करना है कुछ काम तो
कुछ ऐसा कार्य करो।
घर घर बैठे बैठे लम्बी लम्बी,
बात करो जिसका आदि- अन्त न हो।
हवा में बात उड़ाते जाओ,
झूठ भी सच लगे ऐसे बकबक करते जाओ।
करने धरने में क्या रखा है,
जो व्यर्थ बात बनाने में है।
होंठों को हिलाने में जो रस है,
वह हाथ हिलाने में कभी नही।
जीवन जागृति में क्या रखा है,
जो रखा है बात बनाने में।
सच्चे योगी वें ही है शायद,
जो बेफिक्री से घंटों सोते हैं।
अरे भाई!किस चक्की का आटा खाते हो,
तोंद अपनी काया से लाए हो।
क्या रखा है उपदेशों में,
दौड़ धूप में क्या रखा है मित्र;
आराम करो आराम करो।
आराम जीवन की कुंजी हो,
इससे तपेदिक नही होती।
विश्राम सुधा की बूंद बूंद,
मानव को क्षीण शरीर से – बचाती है।
आराम शब्द का ज्ञाता बन,
योगी होने में क्या रखा है।
जीवन तो क्षणभंगुर है,
आराम करो, स्वच्छंद रहो।
करना चाहते हो तो न उत्पात करो,
घर में बैठे बैठे लम्बी लम्बी – हांका करों।
खुशी हो या गम हो सब मंजूर है
अब तो ना खुशी का ग़म है,
ना ही गम में खुशी का एहसास।
बेहिसाब पागल बना चुकी है, यह जिंदगी मुझे।
जब हुआ जिक्र जमाने में मोहब्बत का,
मुझे कुछ खुशी कुछ गम ने रूलाया है।
अब तो ना खुशी का गम है, न गम में कोई खुशी।
बेहिसाब पागल बना चुकी है यह जिंदगी मुझे,
कभी सहर तो कभी शाम खुशी दे गई मुझे।
उनकी याद कोई काम दे गई है मुझे,
कभी खुशीयों भरी तराना गुनगुना रहा है:
कोई गम की गजल गा रहा है कहीं।
दिल तो दिल ही है जनाब,
कभी खुशी कभी गम के तराने
का माहौल बना गया कोई।
आध्यात्म क्या है?
अपने आत्म तत्व को पहचाना।
स्वयं को जानना एवं प्रेम का
अवलोकन करना।
पहचानने की पहली सीढ़ी,
और जब स्वयं को अध्ययन –
करने की ओर प्रथम कदम हम
बढ़ाते हैं।
तभी प्रेम एवं आध्यात्म मिलकर,
सत्य का जीवन दर्शन कराते हैं।
यही आत्मबोध का होता दर्शन,
आत्मबोध ही है आध्यात्मिक
जीवन का रहस्य।
जहां प्रेम की सीढ़ी पर रखते
ही पांव,
आध्यात्मिक प्रगति के
खुले द्वार।
स्व स्वरूप ही नजर आता है,
यही है आध्यात्मिकवाद।
” यादों में एक खत “
मुझे याद है,लिखे खत तुम्हें
कागज कागज शब्द सजाऐं,
दिल ने मेरे, तेरी याद में।
प्यार में गमजदा हूं मैं-
तेरी गैरहाजिरी में।
मेरे अरमान तो मेरे दिल में-
ही जल गयें,
याद तेरी दिल में ही दफन हो गईं।
कितनी भी खुश रहने की कोशिश –
करुं मैं,
सच कहूं तो बहुत रूलाती हैं यादें
मुझे दिन और रातों में।
हर पल जब भी खुश होती हूं मैं
मेरी हर हंसी होती है यह सोचकर –
कि अभी भी हूं मैं तेरे साथ यादों में।
यही मानकर यादों को तेरी मैंने,
पनाह दे दी है अपने दिल जिगर में।
आखिर हमने मोहब्बत की थी,
तेरी मासूम शख्सियत से।
किट किट करते दांत
किट किट करते दांत,
शीत में जम जाते हाथ पांव।
ऊनी स्वेटर गरम कोट पहनने-
की रहती चाहत दिन रात।
गरम गरम चाय काफी ,
पीने की चाहत।
सनसनाती शीत हवा,
तन मन को सताती है।
रोजमर्रा के काम रूक जातें
दिल और दिमाग को दुखातीं।
दिन के उजाले वक्त में,
चहुं ओर अंधेरा घनेरा;
छाया है घना कोहरा।
बादल झूम झूम कर आतें
सर्दी का मल्हार गातें।
शिशिर में नहाने का नही,
है मन करता।
पर मौसम लगता है सुहाना,
जब सर्दी में जलते अलाव।
बनते घर घर में मेवे के लड्डू,
गोंद,बादाम और पिस्ते डालकर।
मीठी स्वादिष्ट पंजीरी,
मिलकर खाऐं साजन सजनी।
बच्चें पहने हैं स्वेटर टोपी
दिन ढलता है जल्दी – जल्दी।
रातें हो जातीं लम्बी – लम्बी।
सो जाते हैं सभी खींच,
कम्बल और रजाई।
घर
मेरा घर घर नही,
स्वर्ग की प्रतिमूर्ति है।
रिश्ते में इसमें सभी,
प्रेम व दायित्वों से जुड़े हैं।
बड़ा परिवार इन्द्रधनुष सा है,
सातों रंगों में रंगा पगा है।
कभी जश्न तो कभी ग़म ,
सभी मिलकर इसे करते सम्पन्न।
सच्चे एहसास व प्रेम की
कहानी है,
सभी मिलजुल कर करते
घर में अनुभव।
घर मेरा माटी गारा का महल,
परन्तु समस्त परिवार इसमें –
समा जाता है।
आंगन कच्ची मिट्टी का ,
तुलसी, गेंदा, चम्पा चमेली से
महकता।
घर छोटा पर सम्पूर्ण सदस्यों से,
हंसी ठहाकों से गूंजता रहता।
मेरा मन तो फूला नही समाता,
पिता छत हैं घर के
माता हैं अन्नपूर्णा देवी।
खिलखिलाते रहते सब,
क्योंकि घर मेरा है धूप प्रकाश,
रातें हैं इसमें चंदनिया।
जाड़े की धूप सुहाती है
जाड़े की धूप सुहाती है
ठीठुरती काया को आराम देती है।
गरम नरम धूप निकली
सभी सुगबुगाऐं,
हटाकर रजाई- कम्बल,
चले सभी धूप खाने।
भोर की गरम नरम धूप में,
चलों सभी हम तुम इसमें नहायें।
जूटे हैं धूप में यहां सभी जैसे लगा मेला,
कठीन ठंड से यह सबकों बचाती,
नई नवेली दुल्हनिया की भांति- शर्माती।
रखती तन को सम्पूर्ण स्वस्थ,
मन को हर्षित करती जाड़े – की धूप।
जब बादल के पीछे चंद्र की
भांति छुप जाती जाड़े – की धूप।
कंपकंपाती झकझोर देती,
निश्चल काया को जाड़े की – सुहाती धूप।
रोग व आलस्य लाती है वहीं,
जहां नही आती है जाड़े – की धूप।
है सुखदायी व मंगलदायनी,
यह जाड़े की धूप।
” क्या खूब लिखा है “
आहिस्ता चल जिंदगी, अभी
केई कर्ज चुकाने बाकी हैं।
कुछ दर्द मिटाना बाकी है,
कुछ फर्ज निभाना बाकी है।
रफ़्तार में तेरे चलने से
कुछ छूट गए कुछ रूठ गए,
रूठो को मनाना बाकी है,
रोतों को हंसाना बाकी है।
कुछ रिश्ते बनकर टूट गयें,
कुछ जुड़ते जुड़ते छूट गए।
उन टूटे-छूटे रिश्तों के ज़ख्मों
को मिटाना अभी बाकी है।
कुछ हसरतें अभी अधूरी हैं
कुछ काम और जरूरी है।
जीवन की उलझ पहली को
पूरा सुलझाना बाकी है।
जब सांसो को थम जाना है,
फिर क्या खोना, क्या पाना है।
पर मन के जिद्दी बच्चे को –
यह बात बताना बाकी है।
आहिस्ता चल जिंदगी अभी
केई कर्ज चुकाना बाकी हैं,
केई दर्द मिटाना बाकी है।
कुछ फर्ज निभाना बाकी हैं।
भारत मां को समृद्ध खुशहाल
बनाना बाकी है।
जरा आहिस्ता चल जिंदगी
अभी केई कर्ज -फर्ज चुकाना –
निभाना बाकी है।
देश में छाई अराजकता व,
संवेदनहीनता का उन्मूलन –
करना बाकी है अभी।
जरा आहिस्ता चल जिंदगी
अभी केई कर्ज चुकाने – बाकी है।
कुछ फर्ज कर्ज बाकी हैं,
कुछ दर्द मिटना बाकी है।
जरा आहिस्ता चल ऐ! जिंदगी,
अभी केई कर्ज चुकाने बाकी है।
खुशहाली का जशन मनाना – बाकी है,
रामराज लाना बाकी है।
रीति गागर लें चलो सखीयों
रीति गागर लें चलो सखीयों,
पनघट पर मिलेंगे गिरधर।
पानी भरने आईं लें मटकी हाथ ,
राह अकेले में डर लागे है,
सखी तू भी चल साथ।
बात मानकर सभी सखीयां,
चलीं पनघट की ओर।
उत मन में हर्षित हो बंसी,
बजा रहे मनमोहन श्याम।
ग्वालों को छुपने को बोला,
नही मचावें शोर।
पानी भरके सभी ने अपनी
गागर शीश पर धर लई।
चली सभी संखीयां गातीं हुईं,
संग राधा के बतियातीं।
पहुंची कुछ दूरी पर गोपीयां,
नटखट मोहन ने फोड़ दई –
मटकीयां कोरी कोरी।
खट्टी-मीठी यादों वाला है,
यह पनघट अलबेला।
घड़ा उठाए छोटी सी वह,
हम से नयन मिलायें है।
होंठ सभी सीले थें परन्तु ,
नैनों से सभी बातें कह जाते हैं।
नारी
इनमें इतनी क्षमता
आंधी को पी जाऐं।
तूफानो में भी मुस्कराना
आता है इनको।
युगों युगों से नव निर्माण का
सृजन करती हैं वों।
इन हाथों का कौशल दिखाना
है हमकों।
नारी बिना विकास है अधूरा
संसार में,
जैसे पति-पत्नी पूरक होते हैं
जीवन में।
नारी समाज का उध्दांग है,
आधे अंग से विश्व अस्वस्थ व
अविकसित रहता।
यदि नर शिव है तो नारी शक्ति,
यदि पुरुष विश्वास है तो हैं
श्रद्धामयी।
नर यदि पौरूषमय है तो
नारी लक्ष्मी, शारदा व दुर्गा है।
किसी भी दृष्टि से कम नहीं,
यही शाश्वत सत्य है।
ख्वाहिश
सौ सौ ख्वाहिशे होती है
दिलों मे,
इनके भी चरित्र होते हैं ।
चाह नही आकाश में
उड़कर जाऊँ मैं-
चाँद पर अपना घर बनाऊँ मैं।
तारों के संग अठखेलियाँ-
कर आऊँ मैं।
चाह नहीं पंछियों के संग संग-
दूर क्षितिज तक घूम आऊँ,
डाल डाल पर फुदक फुदक कर
नृत्त्य करूँऔर मीठे मीठे —
फलों का रसस्वादन कर
आऊँ मैं ।
चाह नही मंगल ग्रह की
सैर कर आऊँ मैं ।
चाह नहीं पहाड़ों पर बैठकर
तप कर आऊँ मैं ।
ख्वाहिश हैं तो बस यही
जरूतमंदो की सेवा मे-
काम आऊ मैं ।
भूखे-प्यासे, अर्थ-हीन ,पैदल-
हजारों मील चलकर जाने वालों,
की हर सुविधाओं का भंडार;
बन जाऊँ मैं ।
चाह है आपदा की घड़ी में,
हर समाधान बन जाऊँ मैं ।
गुरू
सच्चिदानंद घन करने आते,
पुनः पुनः भक्तों का उद्धार करने;
गुरू रूप में लेते श्री हरि अवतार।
ओंकार स्वरूप,अखंड मंडलाकार- रूप में,
पृथ्वी पर हैं, गुरु रूप भगवान।
गुरू ही ब्रह्मा, सृष्टि कर्ता करते पावन धरती को।
गुरू ही विष्णु,पालन करते शिष्यों का।
गुरू ही शिव हैं, करते संहार – दुर्जनों का।
होते भक्तवत्सल ‘ श्री गुरू ‘महान।
कृपा कर, श्री गुरू देव देते जब -दृष्टि दिव्य दान।
सूक्ष्म रूप आत्मा के दर्शन तभी हो जाते हैं आसान।
वेदों के समुदाय शिरोमणि वेदांत -रूप कमल के दिनकर।
पूज्य श्री श्री १००८श्री सदगुरु को,शत शत, कोटि कोटि नमन।
भोग व मोक्ष प्रदाता श्री गुरूदेव को
भूषित करते चौबीस तत्वमाला-अलंकार।
चरणोंदक गुरू का करता भव-सागर पार।
सप्तसागर, साढ़े तीन करोड़ तीर्थ के स्नान,
श्री गुरु के चरणोंदक देता फल-समान।
गुरू ही पूजा, गुरू ही तप , गुरू से
स्मरण से ही, जीवन नैया होती पार।
गुरू चरण कमल में आश्रित चारों धाम,
गुरू सेवा सब तीर्थ समान।
गुरू पद पूजा,श्री हरि पूजा समान।
शिष्य नही कर पाता गुरू की- तलाश,
सद्गुरु स्वयं करते अपने शिष्य का चुनाव।
ईश रूठे तो गुरू शरण जाइए,
गुरू रूठे तो नही है ठिकाना।
विश्व शांति बहुत जरूरी है
विश्व शांति बहुत जरूरी है,
वरन् आजकल बढ़ी दूरी है।
हर किसी को जग में मोह,
जमीन से अति बढ़ी है।
भले ही जिंदगी चार दिन की है,
फिर भी बढ़ी भूख मजबूरी है।
शांति नही मिलती जब तक,
धरा का थोड़ा सा भी कब्जा –
मिल जाए।
स्वार्थ की तो बात दूसरी है,
हवस ज्यादा की बढ़ती जाती है।
भूमाफियाओं को जैसे हर क्षण,
ज़मीं की हर पल रहती है हवस।
कारण तब विश्व युद्ध का बन-
जाता है,
चहुं दिशाओं में अशांति और
हिंसा का आलम बन जाता है।
माया मोह के कारण अशांति एवं
हिंसा छा जाती है,
शांति रखने के लिए जन मानस
में संयम नियम का हो आगाज।
नारी, नदी समान
नारी नदी सी हैं दो किनारे,
एक किनारा ससुराल दूजी ओर- होता मायका।
दोनों ही मेरे अपने फिर भी
जायेके हैं अलग-अलग।
एक ओर मां जिसकी कोख का मैं हिस्सा,
दूजी ओर सास जिनके ‘ लाल ‘
के संग जुड़ा मेरा जीवन भर – का नाता।
एक ओर पिता, जिनसे है अपनत्व की रेशमी धाक।
दूसरी ओर ससुर जी,जिनकी हैं सम्मान की साख।
मायके का आंगन जन्म की- किलकारी,
सुसराल का आंगन, बच्चों की
किलकारी।
मायके में भाई बहन हमजोली,
ससुराल में ननदें, शक्कर सी- मीठी गोली।
मायके में मामा,काका हैं पिता सी मुस्कान,
ससुराल में देवर जेठ हैं तीखे में मिष्ठान।
मायके में भाभी है ममता की चाबी,
ससुराल में देवरानी जेठानी होतीं
बहती नदी का पानी।
मायके में भैय्या एक आस जो,
बनेगा दुख में नैया।
ससुराल में प्राणप्रिय सैंया,
जो हैं जीवन नैया के खेवैया।
मायका – ससुराल हैं नदी के किनारे,
एक नारी के हृदय में समाकर,
बनाती उसको सागर सा – शीतल सौम्य गहरा।
गणपति

गणपति राय: ने जब माता पिता की
चारों दिशाओं से परिक्रमा लगाया,
सकल ब्रम्हांड को नाप लिया।
विश्व को मिला यह ईश्वरीय संदेश,
माता पिता ही हैं मानव का -संसार।
प्रथम पूज्ये गुरु, माता पिता,
तत्पश्चात-किजिऐं सर्वधर्म सर्वकाज।
माता पिता ही होते हैं भगवान,
जीवन हमारा सुधारते देकर –
ईश्वरीय लाड़ दुलार।
नही होने देते हमें हताश,
भोर उठ सर्व प्रथम नमन करें हम;
माता पिता को, तत्पश्चात करें – दूजे काज।
” गंगगणपतियै नमः”
प्रेम क्या, क्यों और कैसे
प्रेम क्या है यह हमने
तुम्ही से जाना।
दिल का एहसास है,
कोई तो है अपना।
पहले हम थे अजनबी,
मित्र बन बन गये प्रेमी बाद में।
ऐसा क्यों होता है,
जाना हमने स्वार्थवश बनाया
सम्बन्ध प्यार में।
कैसे पहचाना हमने जब क्षमा
किया इक दूजे की गलती – अनजाने में।
प्रेम के खातिर ‘ अहम ‘ एवं
स्वाभिमान को त्याग दिया है हमने।
सखा
है! सखा इतने दिन से तुमने,
न मेरी सुध ली न अपना ही बताया।
बचपन की मित्रता की याद में तुम्हारी,
मैं सदा रो लेता था।
आज तुम आए धन्य हैं भाग्य हमारे,
बाहों में अपनी भर कंठ से लगाया।
बिठा ऊपर दीवान पर सखा को ,
स्वयं बैठे धरती पर कान्हाई।
उल्हाना देते हुए मित्र को,
छुपा न पाये टीस अपने आत्मा की।
देख घाव पांव के अश्रु न रोक –
सके रघुवीर।
धोते धोते पग सखा से बोले कृष्ण
काहे आयें तुम पैदल कटीले-
पथ से।
मोहे खबर देते मैं आ जाता-
तुम से मिलने।
आलिंगनबद्ध हो दोनों सखा,
अपनी अपनी गाथा सुनाई।
भेंट में लायें भूनें चने सुदामा,
मित्र श्याम को खिलायें।
दोनों सखा मिल आजीवन,
परम निहाल हुऐं ।
गुफ्तगू
फूलों को कांटों पर चलना पड़ता है,
इश्क में जीना इश्क में मरना पड़ता है।
औरत बनकर जीना कोई – खेल नही,
सूरज बनकर रोज निकलना पड़ता है।
बातचीत में लोग अक्सर क्या से क्या कह जाते हैं।
शब्द ही तो होते हैं मायने क्या से क्या निकल – जाते हैं।
शब्द गूंगे नही होते सुनने वालों के दिलों में, अक्सर शोर कर जाते हैं।
कुछ प्रशंसा और कुछ, आलोचना कर जाते हैं।
प्रशंसा उत्साहित कर जाती है, आलोचना सुधार कर जाते हैं।
बातचीत में लोग अक्सर, कैसे कैसे लाभ दे जाते हैं।
जमाने में लोग अक्सर क्या से क्या कह जाते हैं।
नारी
नारी तू महान है,
भगवान नही जहां,
तू उसका पर्याय है –
नारी तू महान है।
वृक्ष की भांति ठंड छांव है,
छांव की तेरी,हर इंसान लेता-
सुख शांति की सांस है।
हैं नारी गुरु,मित्र और संरक्षिका,
अभाव में इनके हैं इंसान अधूरा।
सिखा है इसने वृक्ष की भांति,
सुख की छांव वाला दुलार।
ज्यूं धूप व वर्षा सहना है
वृक्ष की प्रकृति,
कष्ट पाकर भी सब कुछ सहना
है इसकी नियति।
हैं! नारी अपार शक्ति,
बेटी,बहू मां और पत्नी;
हर स्वरूप में रिश्ते निभाती है।
सखी रूप में अत्यंत कल्याणी,
नही है इसका कोई सानी।
नारी है जहां, भगवान है वहां,
दिव्य शक्ति,रखती दूर दृष्टि –
पुज्यनीय और सम्मानित है।
परिवार, समाज एवं संसार की,
आन,मान व शान है।
नारी तू महान है,
भगवान नही जहां,
है उसका पर्याय वहां।
जमी चल रही है आसमां चल चल रहा है
जमी चल रही है आसमां चल चल रहा है,
ये किसके इशारे, जहां चल रहा है।
चली जा रही है, जमाने की नैया,
नज़र से न देखा, किसी ने खेवैया।
न जाने ये चक्कर, कहां चल रहा है,
ये किसके इशारे, जहां चल रहा है।
जमीं चल रही, आसमां चल – रहा है।
ये हंसना ये रोना,ये आशा निराशा
समझ में न आए क्या है तमाशा।
ये रात दिन कांरवा चल रहा है,
ये किसके के इशारे जहां चल रहा।
अजब है यह महफिल,अजब दास्तां है,
न मंजिल है कोई,न कोई निशांं है।
तो फिर क्यों कारवां चल रहा है।
ये किसके इशारे पर जहां चल – रहा है,
ज़मीं चल रही है, आसमां चल चल रहा है।
भटकते तो देखे हजारों सयाने,
मगर राज कुदरत का कोई भी – न जाने,
ये सब सिलसिला बेनिशां चल रहा है।
ये किसके इशारे पर जहां चल चल रहा है,
जमीं चल रही है, आसमां चल रहा है।
मन की आंखें
दुनिया सबसे खूबसूरत पौधा है,
मन की आंखों से देखो हर दिल में उगता है।
हृदय के आईने में है तस्वीर माशूका की,
मन की आंखों से देखों, विसाले मीत मिल ही जायेगा।
ख्वाबों में नही हकीकत में देखा
मन की आंखों से मैंने उनको।
बेहिसाब है रोनक चेहरे पर उनके,
देखते ही मन की आंखें चकाचौंध-हो गईं।
कोई हूर हैं या कोई फरिश्ता,
मन की आंखों से ही इबादत -हमने करतीं।
सुगंधित लाल गुलाब हैं वो,
रागों में राग मल्हार हैं वो।
बागों में सावन की बहार हैं वो,
कागजों में शब्द बना उतारू ।
मन की आंखों ने बना दी पूरी,
हुस्नें किताब उनकों।
मन की आंखों ने बैठाया है,
हृदय में ईश बनाकर उन्हें।
विचारों का जाल
हृदय में बुनती हूं,
विचारों का जाल।
खुद ही उलझ जाती हूं
इस उधेड़बुन में।
कभी पाती हूं खुद को दोषी,
कभी बरी कर लेती हूं उधेड़बुन में।
कुछ लोग कहते हैं सब कुछ
निश्चित होता है,
परन्तु इसी उधेड़बुन में उलझ जाती हूं मैं।
विधी का विधान कहा है कि
क्या सही है क्या गलत है,
इसी उधेड़बुन में रह जाती हूं।
हमारे कर्म उचित हों,
ऊपर वाले पर छोड़ दें क्या?
उसके हाथों की कठपुतली है हम
इसी उधेड़बुन में रह जाती हूं।
जग है खेल-तमाशा प्रभु का,
अपने अपने किरदार निभाना है हमें।
क्या सही है क्या गलत है,
इसी उधेड़बुन में रह जाती हूं।
किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती हूं,
जब समस्याओं में घिर जाती हूं मैं।
किसी की पराजय किसी की जीत है,
इसी जुगत में फसा है समस्त संसार।
सोच सोच कर हो रही नित,
उधेड़बुन की शिकार।
नदी की भांति बह रही हूं,
पर्वत के भांति जीवन हुआ स्थिर ।
उधेड़बुन की शिकार हुई मैं,
जिंदगी की हकीकत नही – समझी मैं।
सारे विश्व की सभ्यताऐं,
मार्ग दर्शक बनी हुई हैं।
किसे अपनाओं किसे छोड़ू,
इसी उधेड़बुन में फसी- रहती हूं।
संविधान नही यह है हमारा
विधी एवं विधान का ग्रंथ हमारा।
अति पावन व अमूल्य दस्तावेज है,
करता जो देश की अराजकता से रक्षा।
समूचे राष्ट्र को एकता में है बांधा,
वरन् विश्व में एकसूत्र में है बंधा।
स्वतंत्रता व समानता का विधाता
न्याय और नैतिकता का अनन्य पुजारी।
सभी मानव हैं राष्ट्र में एक समान
नही है इनमें कोई भेदभाव।
जात पात, धर्म व रीति-रिवाज
में नही होता इसमें कोई – भेदभाव।
संविधान हमारा नही सिखाता
आपस में बैर रखना,
हिन्द हैं हम हिन्दोस्तान हमारा।
अधिकार सभी को समान – दिये हैं,
कोई ऊंच नीच नही हैं यहां, चाहे हों नर नारी।
सर्व धर्म और संस्कृति का है इसमें सम्मान,
विश्व में सर्वोच्च है हमारा संविधान।
जय हनुमान
जय हनुमत,जय कपीस गुणसागर,
जय तीनों लोक उजागर।
अथाह ही हृदय में हर्षाऐं,
स्वागत श्रीराम के लाने आऐं।
हाथ जोड़ करें यह विनती,
विश्व के समूचे पापाचार मिट जायें।
सजी अयोध्या नगरी दुल्हन जैसी
अवध पुरी में सैंकड़ों दीप जगमगाऐं
घर घर आज बनी हैं स्वर्ग लोक जैसी।
बाजे ढोल, शहनाई ताशे,
केसरिया हो गई है अयोध्या –
अवध पुरी सारी।
जनकपुरी भी सज गई सारी,
दीपोत्सव से जैसे मन रही दिवाली।
जनक दशरथ और तीनों माताऐं,
स्वागत में नैन पांवड़े बिछाए।
झुक झुक लेत बल्लियां,
करत आरती माताऐं अनुपम – सीयाराम की।
प्रिय हनुमत जी भी साथ पधारे,
सेवक और अंग रक्षक बन आऐं।
जय जय हनुमान गोसाईं,
कृपा करो सब पर गुरुदेव – की नाई।
हर हर शम्भु
हर हर शम्भु ,जय जय शम्भु।
बेलपत्र और गंगा जल से करुं-
अभिषेक हर हर शम्भु।
याद करें हम अपना गौरव,
याद करें हम त्वं वैभव।
अजर अमर है मृत्युंजया,
हर हर शम्भु ,हर हर महादेव।
आदि सृष्टि के तुम निर्माता,
वेद उपनिषद के तुम दाता
तुम ही भारत के विधाता,
तुम भविष्य के स्वर्णोंदय।
हर हर शम्भु, हर हर महादेव।
कोटि कोटि कंठो का गर्जन,
कोटि कोटि प्राणों का अर्चन,
कोटि कोटि शीशों का अर्पण।
हर हर शम्भु , हर हर महादेव।
खड़ी आज भी शंका अविचल,
खड़ी आज भी लंका अविचल।
बजे तुम्हारा डंका अविचल,
रामराज्य हो पुनः उदय।
हर हर शम्भु , हर हर महादेव।
आवाज का जादू
आवाज का जादू सिर पर चढ़कर बोलता है।
सुरीली आवाज कर देती है मंत्रमुग्ध,
मीठी बोली आकर्षकित करती है -सभी को।
आवाज का जादू हर नर को ले
जाता इच्छित लक्ष्य तक पहुंचाता-है।
मीठी वाणी करती है जादूई असर,
कर्कश आवाज बना देती है शत्रु।
जिनके हृदय श्रीराम बसे
जिनके हृदय श्रीराम बसे,
वे औरों को नाम लियो-
या न लियो।
मांगें चाहे कंचन सी काया,
चाहे मांगें असिमित माया।
जिन कृपा का दान दियो,
हृदय जिनके श्री राम बसें,
उन औरों को नाम लियो-
न लियो।
राम ही सब हृदय में समाया,
तिन औरों को नाम लियो-
न लियो।
कोई घर बैठा नमन करें,
हरि मंदिर में बैठ भजन करें।
या गंगा यमुना में जा स्नान करें,
काशी जाकर ध्यान करें।
जिनके हृदय श्रीराम बसे,
उन लोग राम को नाम लियो-
के न लियो।
रघुनंदन व्यापक है नाम अनन्त,
उन नारायण को नाम लियो-
न लियो।
हृदय जिनके श्री राम बसें,
वे औरों को नाम लियो-
न लियो।
जीवन में साहित्य का महत्व
जीवन है तो साहित्य भी है और जहां साहित्य है वहां जीवन है। मानव जीवन में साहित्य का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। साहित्य ही मनुष्य के जीवन में ज्ञान व अच्छाईयों का दर्पण है। युगों से साहित्यिकारों द्वारा साहित्य लिखा जा रहा है। साहित्य के माध्यम से ही हमें विज्ञान, साहित्य, इतिहास पत्र पत्रिकाओं का गद्दा पद्द के माध्यम से हमें विषयों पर जानकारी प्राप्त होती हैं। साहित्य के अनेक विधाऐं
हैं: –
१.खंड काव्य
२. कहानी, कथायें
३. नाटक
४. महाकाव्य आदि आदि।
साहित्य के अभाव में मानव जीवन अधूरा है। साहित्य से लोगों के जीवन की खुशीयां, विषाद और कष्ट से आच्छादित होता है। साहित्य के माध्यम से ही व्यक्ति अच्छा बोलना और लिखना सिखता है।
वार्तालाप में भी मानव साहित्य के माध्यम से निपुण होता है।सही ग़लत का ज्ञान भी साहित्य से ही प्राप्त होता है।
व्यक्ति का अनुभव एवं ज्ञान की नींव भी साहित्य के स्तम्भ पर टिकी हुई है।
साहित्य द्वारा मनुष्य के विकारों का क्षीण होना सम्भव होता है और सदभावनाऐं मजबूत होती हैं। अनेक साहित्यिकारों का मानना है कि साहित्य ही समाज को संस्कार, सभ्यता का जानकारी देता है।
साहित्य के माध्यम से ही हमें हमारी पौराणिक एवं प्राचीनकाल की घटित घटनाओं को पढ़ने व सीखने का अवसर मिलता है। समाज में साहित्य का प्रतिबिंब दिखाई देता है। जातिवाद, भेदभाव जैसी कुरीतियों को समाप्त करने में भी साहित्य का अभूतपूर्व योगदान रहा है।
विगत समस्याओं विकारों के कटु अनुभवों से साहित्य में गद्द-पद्द के माध्यम से सुधारा जा सकता है।
साहित्य में हमें समाज का प्रतिबिंब नजर आता है। साहित्य के माध्यम से हम हमारी संस्कृति, सभ्यता को
रूढ़िवादिता से आसानी से बचा सकते हैं। साहित्य के माध्यम से ही
हम आधुनिकरण जीवन में व समाज में लाकर एक सुंदर वातावरण बना सकते हैं। साहित्य का मानव जीवन में अटूट विश्वास एवं महत्व है।
कवि क्या है जानिए
कवि क्या है जानिए ,
कर्म उसके भरमार हैं।
कवि एक राज है
भावों का शिल्पकार है।
साहित्य का द्वार है,
कल्पनाओं की खिड़की बेशुमार हैं।
ज्ञान का भंडार है,
कवि आसमान है,
वह कलम की उड़ान है।
कवि के कर्म खेत में जैसे,
बीज डालकर पौध विकसित –
होता है,
वैसे ही भावनात्मक क्षण को,
अपनी कल्पना से रचना को
विकसित कर्म करता है।
कवि हर्षित भाव में कविता,
रचता है,
जब रोता है उदवेग में होता है,
तब भी कविता रचता है।
कर्म ही इनकी कविता है,
चाहे विद्रोह की हों या
समाविष्ट की हों।
कवि का कर्म है काव्य,
के माध्यम से राष्ट्र का उत्थान,
विकास एवं भावनात्मक –
एकता व समानता का संदेश दें।
मेहनत व लगन से कार्य करे,
इंसान तो क्या काम है मुश्किल।
कर्म पथ पर चलें तो भाग्य तो,
क्या हाथों की लकीरें बदल-
जायेंगी।
कवि का कर्म जग को अपने,
रचनाओं के माध्यम से जन जन
में राष्ट्रीय भक्ति के भाव –
जागृत करें।
गणपति

गणपति राय: ने जब माता पिता की
चारों दिशाओं से परिक्रमा लगाया,
सकल ब्रम्हांड को नाप लिया।
विश्व को मिला यह ईश्वरीय संदेश,
माता पिता ही हैं मानव का –
संसार।
प्रथम पूज्ये गुरु, माता पिता,
तत्पश्चात-
किजिऐं सर्वधर्म सर्वकाज।
माता पिता ही होते हैं भगवान,
जीवन हमारा सुधारते देकर –
ईश्वरीय लाड़ दुलार।
नही होने देते हमें हताश,
भोर उठ सर्व प्रथम नमन करें हम;
माता पिता को, तत्पश्चात करें –
दूजे काज।
” गंगगणपतियै नमः”
दिल का रिश्ता
दिल तो दिल है जनाब,
प्यार और वियोग उसे-
सहना आता है।
कैसा है यह दिल का रिश्ता,
ना पूरा ना अधूरा,
ना सम्बन्धों का बन्धन;
ना ही कोई वादा।
फिर भी सुख दुख का है साथी,
बनाता है मन का मीत।
ना ही कोई जीवन मेरा,
ना ही कोई मन का मीत।
फिर भी ना जाने क्यों बना,
हमारे दिल का रिश्ता।
मिलता फिर भी तुम से,
मुझे बेशुमार प्रीत।
पढ़ना लिखना तुम से सिखा,
विकट समय से लड़ना सिखा।
दिल से दिल की रिश्ता जोड़ा,
अपना दम भरना सिखा।
समय पर चलना सिखा,
दिल का रिश्ते को मित्र बना बैठा।
गुरु ही बना दिल का रिश्ता,
माता पिता और ईश्वर सम ही-
मैंने दिल के रिश्ते को बना बैठा।
दिल का रिश्ता ही है मेरे,
जीवन की संवेदना, करूणा
और ममता का आधार।
दिल के रिश्ते से ही किऐं,
जीवन सागर में नैया पार।
तुम क्या हो
तुम क्या हो, कौन हो तुम
जरा तो मुझे बतलाओ।
कोई हूर या फरिश्ता या
इंसानों में कोई देव स्वरूप हो।
करूं तुम्हारी पूजा या इबादत
जरा तो मुझे बतलाओ।
रागों में तुम राग मल्हार हो-
पुष्पों में सुगंधित लाल गुलाब हो,
साजों में तुम सारंगी सी सरीले हो।
बागों में जैसे सावन की बहार हो
जरा तो बताओ तुम क्या हो।
कागजों में तुम्हें शब्द बना उतारूं
तो तुम पूरी किताब हो।
जीवन में बेहिसाब जवानी –
हो तुम
इत्र में मेरे लिए तुम केवड़े
को खुशबू हो।
बताओं तुम क्या हो।
ख्वाबों में मेरे ईश्वर के भेजे हुए
दिलरूबा फरिश्ते हो।
तुम क्या हो जनाब!
तुम जो भी मेरे लिए खुदा से
कम नही हो।
भगवान होते हैं
जो बुद्धि, वाणी, इन्द्रियों से परे है,
अजन्मा, माया, मन और गुणों के पार है।
वहीं सच्चिदानंदघन ईश हमारा,
भगवान का अवतार है।
सृष्टि का नायक, ब्रम्हांड को चलाता है,
हमारे चक्षु व मस्तिष्क के परे- अज्ञात है।
वही तो भगवान होते हैं,
कहीं मुरली बजाता है व-
कहीं पर नृत्य करता है।
सोलह कलाओं को बादशाह,
सभी रूपों में सुशोभित वो ही-
हमारा भगवान होता है।
भगवान तो स्फटिक मणि समान है,
सभी जीवों की आत्मा में – वास करता है।
कहीं चींटी के रूप में तो कहीं, हाथी के रूप में;
प्रतिबिम्ब अपना देता है – वही भगवान होता है।
वह अलक्ष्य है उसकी ही,
कांति अप्रत्यक्ष हम हर जीव – में देखते हैं।
कण कण में है उसका वास,
ईश रूप अप्रत्यक्ष है उसमें।
क्यूं बिना ईंधन के पत्थर में – आग है,
वैसे ही भगवान का प्राग्यट सर्वत्र व्याप्त है।
यदि भगवान नही होते तो,
सातों समंदर में अपार जल,
पृथ्वी पर कण और नभ
पर सूरज, चांद सितारे ना होते।
श्री गुरू
बिना ज्ञान जियूं कैसे,
अथाह ज्ञान हैं जग में।
बिन गुरु ज्ञान पाऊं कैसे,
दियो ज्ञान मोहे गुरु –
हरि गुण गाऊं मैं।
पाया ज्ञान गुरु से मैंने,
कहलाई मैं ज्ञानी।
ज्ञान मिला धर्म -कर्म करने का,
लक्ष्य बनाया अपने जीवन में –
कहलाई ज्ञानी मैं।
बंधी नही मैं प्राचीन परंपराओं से
दिखावा व झूठी संवेदनाओं से,
भ्रान्ति की डोरी से,
निरंकुश मानसिकता से,
एवं सामाजिक रूढ़िवादिता से।
हैं संस्कार मुझ में शालिनता के,
अतः मैं ज्ञानी हूं।
जो ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं,
मैं वो ज्ञानी हूं,बंधी नही मैं –
किन्हीं भ्रामक विचारों से।
दीन दुखियों के कष्टों-पीड़ाओं
का सहज और प्रेम से,
सेवा करती हूं।
उनके दिलों में बसने की –
तमन्ना रहती हैं मेरे मन में।
असहाय लोगों को सेवा देती हूं,
मैं अपने दिल व दिमाग में;
कभी अंहकार आने नही देती-
क्योंकि मैं ज्ञानी हूं।
ग्रंथो के संग्रहालयों की,
खुशबू रिझाती है मुझे।
ज्ञान का भंडार ढूंढती हूं उनमें
क्योंकि मैं ज्ञानी हूं।
ध्यान व परिश्रम से ज्ञान,
पाया है मैंने उसी ज्ञान से;
सम्पूर्ण जीवन बिताया मैंने।
मैं ज्ञानी हूं यह समझ अतिशय,
ज्ञात है मुझे,
बिना संसाधन के ही साधक
हो जाती हूं मैं।
राह असम्भव या दुर्गम हो,
उसे आसान बना लेती हूं मैं;
क्योंकि मैं मैं अज्ञानी नही,
ज्ञानी हूं मैं।
चाचा नेहरू
फूल गुलाब खिलेगा बागों में जब जब,
जिन्दा रहेगा चाचा नेहरू नाम तुम्हारा।
जब तक है धरती पर चंदा सूर्य का उजियारा,
अमर रहेगा तब तक नाम तुम्हारा।
चाचा नेहरू तुम्हें सलाम,
अमन, शांति का जग को दिया – पैगाम।
जग को जंग से बचाया,
बच्चों का दुलार से साथ निभाया।
जन्मदिन बच्चों के नाम किया,
चाचा नेहरू तुम्हें सलाम।
प्रगति को दिया तुमने इनाम,
चाचा नेहरू तुम्हें करते सलाम।
परिवर्तन
समय का चक्र घूमता रहता है,
तीव्र गति से निरंतर।
पीछे छूटे पदचिन्हों को,
आकुलता होती है मन को।
निकल गया एक बार जो समय,
कभी लौटकर नही आता।
परिवर्तन सार्वभौमिक है,
पल पल क्षण क्षण समय चक्र –
बदलता रहता है।
निकल गया जो एक बार समय
लौटकर कभी वह कभी नही आता।
करके आवाजें सभी अनसुनी,
दूर कहीं खो जाता है।
चलता रहता है समय चक्र,
करता रहता है जड़ चेतन में -परिवर्तन।
ज्यों नदियों का जल ठहरता नही एक जगह,
वैसे ही समय नही ठहरता एक सा जीवन में।
समय है परिवर्तनशील,
जैसे आयु बढ़ती है क्षण क्षण।
जीवन में खुशियों का होता है आलम,
कभी कभी दुखों का होता -है झमेला।
कभी अकेला जीता जीवन में,
कभी होता है लोगों का मेला।
जगत है एक सफर हम उसके हमराही,
लगी रहती है इंसानो की आवा- जाही।
बनते हैं सम्बन्ध नये नये,
छूट जाते सम्बन्ध कभी पुराने
कभी नयों में परिवर्तित हो हो जातें हैं।
परिवर्तन समय कभी ऐसा भी आता है,
छूट जाते हैं जन्म जन्म के – नाते।
बचपन से यौवन और यौवन से बुढ़ापा आता है,
मानव जीवन व प्रकृति में
आजीवन परिवर्तन का – नाता है।
दृश्यमान सभी हैं इक दिन – सभी को जाते हैं,
शाश्वत सत्य तो यही है समझे इसे सभी,
जग तो परिवर्तनशील है मिल जुलकर रहें सभी।
चंद्रयान 3
इसरो का शुक्रिया,
पहुंचाया हमें चांद पर।
चंद्रयान 3 ने यह सम्भव कराया,
ऊंचा कर शीश हम जगत में –
कर रहे हैं स्वाभिमान से।
अंतरिक्ष में गूंज उठा है आज,
विजयी गान चंद्रयान के –
सम्मान में।
हम भी गायेंगे जन गण मन,
इसके अप्रतिम सम्मान में।
चंद्र भी रंग जाएगा तिरंगे –
के रंग में,
राष्ट्र ध्वज का स्वरूप लिए।
शीश ऊंचा किये हम देशवासी
खड़े हैं हम स्वाभिमान से।
हृदय हर्षित हुआ असीम,
चांद अब हमारा हुआ।
पास उसके जाकर अब देखेंगे-
घूर कर,
अब नही कहेंगे हम –
चंदा मामा दूर के।
कहेंगे मामा अब रहेंगे हम,
तेरे स्थल पर अपना घर –
बनाकर।
हमारे देश के वैज्ञानिकों
आप सभी हो गौरव हो –
हमारे राष्ट्र के।
शीश ऊंचा कर हम सब ,
खड़े हैं आज स्वाभिमान से।
जय हिन्द जय भारत
श्रीमती उमेश नाग

श्रीमती उमेश नाग
जयपुर, राजस्थान
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बहुत सुंदर कविताएँ है। आपकी रचनाधर्मिता समसामयिक है।
सुन्दर प्रस्तुति
समसामयिकता इसके प्राण है!!
बहुत बहुत बधाई!!!