कागा की क़लम से | Kaga ki Kalam Se

जाति धर्म

जनता को नहीं बाटो जाति धर्म में ,
मुफ़्त रेवड़ियां नहीं बांटो जाति धर्म में!

चुनावों के चक्रव्यू में फंस धंस कर ,
दलगत दलदल नहीं बाटो जाति धर्म में !

लोभ मोह माया छोड़ शिक्षा मुफ़्त करो ,
अमीर ग़रीब नहीं बांटो जाति धर्म में!

ऊंच नीच छूआ छूत भेद भव बेकार ,
मानव को नहीं बांटो जाति धर्म में !

महिलाऐं बराबर की ह़क़दार राजनीति पटल पर,
स्त्री पुरूष नहीं बांटो जाति धर्म में !

दब्बे कुचले धर्म के कट्टर हितेषी ‘कागा’
वर्ण वर्ग नहीं बांटो जाति धर्म में !

चापलूस

चापलूस चमचे चाटूकार एक थेली के चट्टे बट्टे ,
चुग़ल चाल बाज़ एक थेली के चट्टे बट्टे !

चप्पल घिस आगे नहीं आये चाट की चाहत ,
चालाक़ दग़ा बाज़ एक थेली के चट्टे बट्टे!

चिकनी चुपड़ी करते मीठी बातें कान फूसी काम,
नालायक़ नादान नाराज़ एक थेली के चट्टे बट्टे!

झूठ मूठ का सहारा घुल मिल जुल जीना,
बाग़ी दाग़ी आवाज़ एक थेली के चट्टे बट्टे!

संघर्ष की भट्टी से निकल आते कुंदन होते,
पिछलग्गू ग़ुलाम अंदाज़ एक थेली के चट्टे बट्टे!

मुफ़्त की मलाई डकार ख़ुश होते मस्त मवाले ,
करते ख़ूब मसाज एक थेली के चट्टे बट्टे !

स्वाभिमान का सौदा करते एक घूंट पर ‘कागा’
बेच देते समाज एक थेली के चट्टे बट्टे!

पनघट

पनघट का दौर गया पानी भरती थी पणिहारी ,
सिर बग़ल पर मटकी पानी भरती थी पणिहारी !

सज धज संवर कर सोलह श्रृंगार संग सहेलियां ,
कानों में झुमका झूंबर पानी भरती थी पणिहारी !

आंखों में कजरा बालों में गजरा मांग सिंदुर,
चमके ललाट लाल बिंदिया पानी भरती थी पणिहारी !

हाथों रची महेंदी लहंगा महंगा चोली ओढ़ चुनरी ,
पग पायल छम छम पानी भरती थी पणिहारी !

मृग नैनी चाल हिरनी चलती जैसे मटक मोरनी ,
खन खन करती चूड़ियां पानी भरती थी पणिहारी !

घूंघट पट में सिमट बिखरी लट पनघट पर,
लाज में जाती लिप्ट पानी भरती थी पणिहारी !

हंंसती मुस्काती मचल जाती कूएं पर कामनी ‘कागा’
मर्यादा की मूर्त मोहनी पानी भरती थी पणिहारी !

राहगीर

पीछे मुड़ कर नहीं देख आगे चल बंदे,
मंज़िल कर रही इंतज़ार तेरा आगे चल बंदे!

तस़्वीर तक़दीर बदल जायेगी सफ़र होगा आसान चल,
राह बड़ी मुश्किल पग डंडी पथरीला चल बंदे!

हम सफ़र चले गये ज़रिया हाथी घोड़ा पालकी,
क़दम दर क़दम लुटेर खड़े पैदल चल बंदे!

चेहरे पर मुखोटा नकाब ओढ़ रहजन बन रहबर,
ह़ाल पूछते चाल बाज़ किनारा कर चल बंदे !

बद नियत बद मिज़ाज नादान अंदाज़ नेक नहीं ,
नहीं देना मुख़फ़ी राज़ सम्भल कर चल बंदे!

मंज़िल एक है रास्ते अलग कूच कर ‘कागा’
चुस्त दुरस्त चाल से ख़बरदार बन चल बंदे!

इश्क़ की आग

ख़ुद को खोजने निकला तेरी आंखों में पाया,
ख़ुदा को ढूंढ़ने निकला मेरी रूह़ में पाया !

नज़रों में नज़रें डाल जब देखा ग़ौर से ,
अक्स रूबरू मेरा हब्ह़ू तेरे नैनों में पाया!

रूह़ हमारा एक तरसते बग़ेर एक दूसरे के,
छलक पड़तेअशक बन दर्द दिल ने पाया !

चैन चुराया तुमने मेरा दिल अदल बदल कर,
दिल की धड़कन बोल उठी प्यार तेरा पाया !

हीर रांझा हम नहीं दिल लेलां मजनू जेसा,
जिया करे पिया पिया मिलन हुआ पिया पाया !

अनजान अजनबी दोनों दिल मिलने को बेताब ‘कागा’
इश्क आग का दरिया दोंनो जलते झुलसते पाया !

ग़ुलाम गिरी

पराये पेहलू में कब तक पड़े रहोगे ,
पराये भरोसे पर कब तक पंड़े रहोगे !

बड़े भोले भाले मतवाले निराले नादान हो
दोगली दलदल में कब तक गड़े रहोगे !

पीढ़ियां गुज़र गई ग़ुलामी की ज़ंजीरों में ,
मकड़ जाल में कब तक सिकुड़े रहोगे !

हाथों में पहनी हथकड़ियां पैरों में बेड़ियां ,
गहना नहीं बंधन कब तक जकड़े रहोगे !

बेठने की इजाजत नही थक थर्रा रहे ,
हाथ जोड़ ख़ामोश कब तक खड़े रहोगे !

ग़ैर की सुनते ग़ोर से हमारी नही ,
अनाड़ी अनजान बन कब तक अड़े रहोगे !

ग़ैरत को जगा दो करवट बदल ‘कागा’
बेबस बन बिचारे कब तक उखड़े रहोगे !

बदले की भावना

बदले की भावना से काम हो रहा है ,
बदले की नियत से काम हो रहा है!

राजनीति के रंग ढंग रूप गिरगिट जेसे रंगीन ,
बदले विचार के अनुसार काम हो रहा है !

सब एक थेली के चट्टे बट्टे कम नहीं ,
किसी को नीचा दिखाना काम हो रहा है !

जनता पिस रही दो पाटों के बीच परेशान ,
कोई नहीं सुनता फ़रियाद काम हो रहा है!

मेरा तेरा का भूत सवार चढ़ा सिर बोलता ,
मनमाने त़ोर तरीक़े से काम हो रहा है !

नफ़ा नुक़सान को एक तराज़ू में तोलते ‘कागा’
नफ़रत का शिकार बन काम हो रहा है!

सुईंया धाम

चौहटन चलो भाई बहिनों सुईंयां मेला है ,
पोष मास तिथि अमावस सुईंयां मेला है !

सोम वार मूल नक्षत्र योग प्रमाण
पावन झरना फूहार निकली शुभ वेला हैं !

शुद्ध जल से अशनान करो शुभ महुर्त ,
नर नारी संग संत गुरु चेला हैं !

भयंकर भीड़ भरकम जहां देखो मनख घणा ,
बूढा बच्चा युवा रेली नहीं रेला है !

ज़ाब्त़ो चोखो घणो चाक चोबंद चोकसी,
गहमा गहमी गज़ब पांच कोस फेला है!

सुईयां की छाप लगाना ज़रूर भुजा पर,
सब तीर्थ से ऊंचा स्थान अकेला है!

मरू अर्द्ध कुमभ नाम सै चावो चौहटन,
मनो-कामना पूर्ण नहीं झुठ झमेला है !

कल युग का करामाती संगम उगम ‘कागा’
नहीं नहाया कोई नादान ग़ाफ़ल गैला है !

हम इंसान

हम है इंसान ग़लत़ियां होती रहती है ,
हम है इंसान गुस्तख़ियां होती रहती है!

ज़िंदगी का सफ़र मुश्कल राह ऊबड़ खाबड़,
हम है इंसान सख़तियां होती रहती है!

ज़िंदगी सरासर झूठ मौत का मार्ग सच्च ,
हम है इंसान तलख़ियां होती रहती है !

ज़िदगी में उतार चढ़ाव आते रहते दस्तूर,
हम है इंसान हस्तियां होती रहती है !

ज़िंदगी नाम चलते रहो जैसे सूरज चांद,
हम है इंसान गशतियां होती रहती है !

ज़िदगी का सफ़र आसगन करें मुस्कायें कागा’
हम है इ़ंसान सुस्तियां होती रहती है !

मज़ाक़

किसी की ग़रीबी का मज़क़ मत उड़ाओ,
किसी भी करीबी का मज़ाक मत उडा़ओ!

किसी ग़रीब की बेबसी को देखा कर ,
मदद करो मोह़ताज की मज़ाक़ मत उड़ाओ!

ग़रीब नवाज़ बन हमदर्दी करो दिल से ,
सौ गुना होकर मिलेगा मज़ाक़ मत उड़ाओ !

बद-दुआ नहीं देना कभी किसी को,
दुआ देते रहना सबको मज़ाक़ मत उड़ाओ !

देर है अंधेर नहीं मालिक के घर ,
दाता देता छप्पर फाड़ मजाक़ मत उड़ाओ!

राजा को रंक बनते देखा आंखों से ,
फ़र्श से अ़र्श ऊंचा मज़ाक़ मत उड़ाओ !

पल में प्रलय करता लम्ह़े में लबालब,
शाह से गद्दा बनाये मज़ाक़ मत उड़ाओ !

खो़फ़ रख ख़ुदा का बड़ा त़ाक़्तवर ‘कागा’
बंदा से केसा डर मज़ाक़ मत उड़ाओ !

दीन दुनिया

अच्छा हुआ मौत का कोई मज़हब नहीं ,
अच्छा हुआ मौत की कोई जाति नहीं !

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध जैना पारसी ,
अच्छा हुआ लहु का कोई मज़हब नहीं !

मठ मंदिर मस्जिद चर्च गुरू द्वारा स्तुप ,
अच्छा हुआ पत्थरोंं का कोई मज़हब नहीं!

मटकी में भरा पानी का मज़हब होता ,
अच्छा हुआ दरिया का कोई यज़हब नहीं !

आसमान ज़मीन आग हवा सबका बराबर होता,
अच्छा हुआ अनाज का कोई मज़हब नहीं !

इंसान ने अपना मज़हब ख़ुद बनाया ‘कागा’
अच्छा हुआ परिंदोंं का कोई मज़हब नहीं !

आया राम गया राम

कौन करता है किसको याद जाने के बाद,
कौन करता है किसको याद मरने के बाद!

रस्म अदा करते है परम्परा चली आई पुरानी ,
होती रात अंधेरी सूरज ढल जाने के बाद!

जलाते दीपक अंधेरा दूर भगाने वास्ते डाल तेल ,
स़ुबह़ बुझाते फूंक मार रोशनी होने के बाद !

बच्चा खेलता रंग बरंगी खिलोनों से खुश होकर,
तोड़ देता यकदम दिल बहल जाने के बाद !

बेवफ़ा चांद चांदनी से अमावस को उगता नहींं,
पूनम का चांद चमकता एक महिने के बाद !

दादा गया पोता आया चक्र चलता रहता ‘कागा’
आया राम गया राम एक दूसरे के बाद!

नया साल

नया साल आने वाला पुराना जाने वाला मुबारक,
पुराना से विदाई नये का स्वागत बधाई मुबारक!

बारह महिनों का अलग अंदाज़ खट्टे मीठे अनुभव, ,
दिसम्बर हो गया रुख़्स़त जनवरी का महिना मुबारक़!

जयंती जश्न जलसे मनाये महान विभूतियों के जोरदार ,
चुनावी हलचल हुई ख़तम कामयाब को जीत मुबारक़ !

नया साल नई बोतल मधुशाला पुरिनी दारू हथकढ़ी ,
चंडाल चौकड़ी चापलूस चुग़ल दिलो जान से मुबारक़ !

चाल चेहरा चरित्र चित्र बदले नहीं दस्तूर पुराना ,
जिसकी लाठी उसकी भेंस ज़ोर ज़ुल्म सितम मुबारक़ !

नये साल में चाल बदल मकड़ जाल तोड़ें ,
पुराना ढ़र्रा छोड़ नया इतिहास सृजन करें मुबारक !

गीत गाना तराना साज़ो सामान सब पुराना ‘कागा’
मोर मुक्ट मोरनी के सिर ताज तख़्त मह़ल मुबारक़ !

चाय पर चर्चा

आज कल चाय पर चर्चा होती है ,
विभिन्न मसलों मुद्दों पर चर्चा होती है !

कप थाम हाथों में गर्मा-गर्म चाय ,
मीठी फीकी लेते चुस्की चर्चा होती है !

कभी संगीन कभी रंगीन कभी ग़मगीन पेहलू,
राजनीति कूटनीति रणनीति पर चर्चा होती है !

बद-नीति से प्रेरत होकर रचते षड़यंत्र ,
नीति चोथ वस़ूली पर चर्चा होती है !

हथकंडे हज़ार होते साय दाम दंड भेद ,,
नोट मिले चाहे चिल्लर चर्चा होती है,!

भागते भूत की लंगोट भली मिलनी चाहिये,
मुफ़्त का माल ह़लाल चर्चा होती है !

नैतिकता का पतन हो चुका मानवता नहीं ,
कोयले ने कालिख छोड़ी चर्चा होती है !

चोर लुटेरे मोसेरे भाई बंदर बांट करते ,
सब दूध से धुले चर्चा होती है !

दलाल बड़े दबंग कमीशन बटोर लेते ‘कागा’
भनक नहीं लगती ज़रा चर्चा होती है !

जग नाश्वान

हम चले जायेंगे अपने घर देखते रह जाओगै,
हम चले जायेंगे अपने मुल्क देखते रह जाओगै !

यह मुल्क घर पराया कुछ दिन का ठिकाना,
हम छोड़ जायेंगे मुसाफ़र खा़ना देखते रह जाओगै!

महमान बन कर आये थे साथ मिला आपका ,
रोते आये थे रुला जायेंगे देखते रह जाओगै !

थह संसार किसी का नहीं आवा गमन चालू,
कोई आज कोई कल जायेंगै देखते रह जाओगे !

अपना भाग्य मुठ्ठी भर बंद कर लाये साथ ,
ख़ाली हाथ सब छोड़ जायेंगे देखते रह जाओगे !

बिना नहाये आये थे बिना एक अदद लंगोटी,
नहला देना कफ़न ओढ़ जायेंगे देखते रह जाओगै !

राम रावण कंस कृष्ण आये चले गये ‘कागा’
जग नहीं किसी की बपोती देखते रह जाओगै !

राही

खोने को कुछ नहीं पाने को ज़माना हैं ,
रोने से कुछ नहीं ज़माने को पाना है !

इंसान आया जग में रोता भूखा प्यासा नंगा ,
सोने से कुछ नहीं खाने को कमाना है !

मंज़िल पाने वास्ते चलना पड़ेगा क़दम दर कदम ,
राहगीर रहबर मिले चाहे अकेला चलते जाना है !

उंगली पकड़ चलना सीखो दोड़ो हाथ छोड़ कर ,
अपनी त़ाक़्त को ज़ोर शोर से आज़माना है !

मां की गोद पिता के कंधो छोड़ना होगा ,
शून्य से शिखर पाना अस़ल अपना निशाना है !

मंज़िल तेरी राह देख रही बेस़बरी से ‘कागा’
स्वागत के लिये खड़ी है तैयार जाना है !

काश

काश मेरी ह़क़ीक़त को जान लिया होता ,
काश मेरी अस़लियत को जान लिया होता !

जैसी नज़र वैसा नज़रिया हूब्हू नज़र आता ,
काश मेरी फ़ज़ीलत को जान लिया होता !

बेबुनियाद इलज़ाम मढ़ लिये मेरे सिर पर ,
काश मेरी मुस़ीबत को जान लिया होता !

अपने गिरेबान में झांका देखा तक नहीं ,
काश मेरी ख़ास़ियत को जान लिया होता !

ग़रीब ज़रूर है बेग़ैरत बेज़मीर बेशऊर नहीं ,
काश मेरी ह़ेस़ियत को जान लिया होता !

ख़िदमत का ख़ुलूस़ था जोश जुनून जज़्बात ,
काश मेरी नस़ीह़त को जान लिया होता !

फ़िरश्ता बन डोल रहे हो अफ़लात़ून अक़ाबर ,
काश मेरी क़िस्मत को जान लिया होता !

नफ़रत की निगाह से देखते हो ह़ास़द ,
काश मेरी अ़क़ीदत को जान लिया होता !

मददगार हमराही हमदर्द बन मदद करते ‘कागा’
काश मेरी हिम्मत को जान लिया होता !

आंखों का सागर

आंखों का सागर सूखा नहीं ख़ुशी हो चाहे ग़म ,
आंखों का समुंदर भरा रहा लबरेज़ नहीं होता कम !

लहरें उठती छू कर आकाश लोट आती वापिस किनारे ,
सपने संजोए सलोने सोच विचार कर रहती आबाद हरदम !!

झुक जाती बरस बूंदे बन कर पलकें छलक भीग ,
दर्द का घूंट पी लेती अमृत मान निर्मल नम !

दर्द देख लेती दोंनों मिलती नहीं आपस में कभी ,
दोनों सगी बहिनें रोती एक साथ मिल हम दम!

दिल से दोनों का रिश्ता नाता गहरा निभाती ज़रूर ,
विरह का बर्फ़ पिघल जाता सदा रहता ह़य्या शर्म!

काजल बह लग जाता किनारे टपक बूंदें वर्षा ‘कागा’
लाल गाल काले पड़ जाते छलक छींटे छम छम!

यकम जनवरी

यकम जनवरी योमे पैदाईश मेरी ,
ख़ुश ख़बरी पोमे पैदाईश मेरी!

वालदा सांझी वालद रामचंद्र प्रभानी,
सकूनियत भाडासिंधा बनी आराईश मेरी ,

बच्चपन जवानी की दहलीज़ तक ,
ढाट में गुज़रा गुंजाईश मेरी, !

ह़िजरत हुई अलविदा किया यकदम ,
चौहटन में क़ायम रिहाईश मेरी !

जदोजह़द कशमकश कोशिश जज्बा जुनून ,
खि़दमत ख़लकध की नुमाईश मेरि !

क़ौम का किरदार दमदार वास्ते,
जानदार शानदार रहे ख़्वाहिश मेरी,

ख़ुदार बन ख़बरदार रहा ‘कागा’
फ़हमीदा फ़साना फ़ज़ीलत फ़रमाईश मेरी !

बाबा अम्बेडकर


राजनीति शुरू हो गई अम्बेडकर के नाम पर ,
राजनीति के रंग रूप अम्बेडकर के नाम पर !

संविधान बदलने का मुद्दा सिर चढ गूंजने लगा ,
माह़ोल में गर्मा गर्मी अम्बेडकर के नाम पर !

अम्बेडकर के नाम पर दिल में नफ़रत बसी ,
राजनीति रोटियां सेंकने लगी अम्बेडकर के नाम पर !

आरक्षण पर लटकाई तलवार कच्ची डोर में बांध ,
बिगड़े बोल बदल जाते अम्बेडकर के नाम पर !

पिछले द्वार से होने लगी भर्तियां लगातार चालू ,
आरक्षण का गला घोंटा अम्बेडकर के नाम पर !

अम्बेडकर की मूर्तियां तोड़ी हटाई जाती आम बात ,
वोट गोटियां फैंकने लगे अम्बेडकर के नाम पर !

जय भीम का नारा गूंजने लगा बुलंद ‘कागा’
बहुजन की एकता जिंदाबाद अम्बेडकर के नाम पर !

नफ़रत

नफ़रत की आग धधक रही दिल मे़ं ,
हसद की ज्वाला भभक रही दिल मे़!

ज़ुबान से ज़हरीला बन धूंआ निकल रहा ,
कर माह़ोल आलूदा सुलग रही दिल मे़ !

बद हज़़मी की आती खट्टी डकारें हरदम ,
क़ीय बन बदबू उगल रही दिल में !.

बे-आबरू बन बेठे तेरी बज़्म में बेअदब ,
बे-इज़्ज़त का घूंट निगल रही दिल में !

आग की लपटें शोला बन जल रही ,
चका चौंध चमक दमक रही दिल में !

दिल घुट रहा देख धूंआं चमनी से ,
मन की म्यूरी ठुमक रही दिल में !

मोर नाच रहा मद मस्त मुस्काये ‘कागा’
नफ़रत का निशाना कुचल रही दिल में !

डा, भीमराव अंबेडकर


दबे कुचले शोषित वंचित का मसीह़ा अंबेडकर ,
दबे निचले बहुजन समाज का मसीहा अंबेडकर !

युग बीते चौबीस अवतार आये जग में ,
सहारा नहीं बना कोई एक मसीहा अंबेडकर !

मूल भूत अधिकार दिलाये शूद्र वर्ग को ,
ज़र ज़मीन का मालिक बनाया मसीहा अंबेडकर !

विधा अर्जित नहीं कर सकते थे अनजान ,
पोथी फढ़ना कठिन था सच्चा मसीहा अंबेडकर !

तन पर वस्त्र नहीं नंंगा रहता शरीर ,
प्यासे भूखे तड़पते नगर डगर मसीहा अंबेडकर !

जाति बंधन में जकड़े ग़ुलाम आज तक ,
अपमान का घूंट पीते प्याला मसीह़ा अंबेडकर !

जीने का ह़क़ दिया अंबेडकर ने ‘कागा’
संविधान जैसा पवित्र ग्रंथ पढ़ो मसीह़ा अंबेडकर !

बेचैनी

नैन मिले चैन चला गया दिल बड़ा बेचैन ,
आंखों में उदासी मुखड़ा मायूस दिल बड़ा बेचैन !

ह़ादस़ा हो गया अन-चाहे अचानक एसा ,
नैनों से नैन मिले क्या दिल बड़ा बेचैन !

चैन चुराया किसने कोई अता पता नहीं बेख़बर ,
काजल बन बस गया नैनों दिल बड़ा बेचैन !

बेचैनी ने बेक़रार कर रखा दिलो जान बेज़ार ,
अंंदर से निकली उफ़ आह़ दिल बड़ा बेचैन !

रात रोते गुज़री इंतज़ार में ज़ार ज़ार सिसक ,
दिन कटता नहीं बड़ी मुश्किल दिल बड़ा बेचैन !

दिल भी क्या चीज़ ख़ून का क़त़रा नहीं ,
बहता अश्क बन इश्क़ में दिल बड़ा बेचैन !

इश्क़ में इम्तहान होते जान के सोदागर ‘कागा’
चलना पड़ता ख़ंजर की नोक दिल बड़ा बेचैन !

ह़ालात

मजबूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते है ,
ग़रीबी जह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते है !

ग़ुरूर नहीं कर मग़रूर धन दोलत त़ाक़त पर ,
माज़ूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देतेहै।

सिकंदर क़लंदर बन गये वक़्त के थपेड़ों से ,
ह़ुज़ूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते है!

ग़रीब का कोई हमदर्द नहीं होता रिश्ते नाते ,
बेशऊरी ह़ालात इंसान को मोहताज बना देते हैं।

ग़रीब के जनाज़े को नहीं देते कंधा अमीर ,
अधूरे ह़ालात इंसान को मोहताज बना देते है !

ग़रीब को देखते नफ़रत की निगाह से ‘कागा’
मज़दूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते हैं !

दर्दमंद

बड़े संग दिल हो दर्द देते रहते हो ,
बड़े तंग दिल हो दर्द देते रहते हो !

दो नैन मिले प्यार हुआ चैन चला गया ,
बड़े फत्थर दिल हो दर्द देते रहते हो !

चैन चुराये चले गये हम रोये रैन सारी ,
बड़े रह़म दिल हो दर्द देते रहते हो !

इशारा कर आंखों का लोट नहीं आये दोबारा ,
बड़े बुज़ दिल हो दर्द देते रहते हो !

दर्द झेले पुकार रहा रूह़ राहत नहीं मिलती ,
बड़े बेदर्द दिल हो दर्द देते रहते हो!

कहते हो हमदर्द हम सहते दर्द सहम कर ,
बड़े गर्म दिल हो दर्द देते रहते हो !

मौम की त़रह़ दिल जल पिघल जाता पागल ,
बड़े मौम दिल हो दर्द देते रहते हो !

पतंग जान देता जल कर शम्मा पर ‘कागा’
बड़े बुलंद दिल हो दर्द देते रहते हो !

ह़ालात

मजबूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते है ,
ग़रीबी जह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते है !

ग़ुरूर नहीं कर मग़रूर धन दोलत त़ाक़त पर ,
माज़ूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देतेहै।

सिकंदर क़लंदर बन गये वक़्त के थपेड़ों से ,
ह़ुज़ूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते है!

ग़रीब का कोई हमदर्द नहीं होता रिश्ते नाते ,
बेशऊरी ह़ालात इंसान को मोहताज बना देते हैं।

ग़रीब के जनाज़े को नहीं देते कंधा अमीर ,
अधूरे ह़ालात इंसान को मोहताज बना देते है !

ग़रीब को देखते नफ़रत की निगाह से ‘कागा’
मज़दूरी ह़ालात इंसान को मोह़ताज बना देते हैं !

दर्दमंद

बड़े संग दिल हो दर्द देते रहते हो ,
बड़े तंग दिल हो दर्द देते रहते हो !

नैन मिले प्यार हुआ चैन चला गया ,
बड़े फत्थर दिल हो दर्द देते रहते हो !

चैन चुराये चले गये हम रोये रैन सारी ,
बड़े रह़म दिल हो दर्द देते रहते हो !

इशारा कर आंखों का लोट नहीं आये दोबारा ,
बड़े बुज़ दिल हो दर्द देते रहते हो !

दर्द झेले पुकार रहा रूह़ राहत नहीं मिलती ,
बड़े बेदर्द दिल हो दर्द देते रहते हो!

कहते हो हमदर्द हम सहते दर्द सहम कर ,
बड़े गर्म दिल हो दर्द देते रहते हो !

मौम की त़रह़ दिल जल पिघल जाता पागल ,
बड़े मौम दिल हो दर्द देते रहते हो !

पतंग जान देता जल कर शम्मा पर ‘कागा’
बड़े बुलंद दिल हो दर्द देते रहते हो !

अंधेर नगरी

गुस्ताख़ी करो माफ़ी मांगो मामला रफ़ा दफ़ा ,
गुनाह़ करो माफ़ी मांगो मस़ला रफ़ा दफ़ा !

जान-बूझ ज़ुल्म सितम करते ग़रीबों पर ,
मजबूरी का फ़ायदा उठाते हल्ला रफ़ा दफ़ा !

ख़फ़ा होकर जफ़ा देते ज़ोर ज़बरदस्ती ज़ालिम ,
इंस़ाफ़ अदल होता नहीं सिलसला रफ़ा दफ़ा !

चंडाल चोकड़ी चुग़ल चापलूस चाटूकार बन बदमाश ,
हेरा फेरी सीना ज़ोरी हमला रफ़ा दफ़ा !

उतार चढ़ाव आते रहते ज़िंदगी में दस्तूर ,
बिना नफ़ा होते बेवफ़ा गिला रफ़ा दफ़ा !

हाकम बड़ा बेदर्द सुनता नहीं फ़रियाद ‘कागा’
घोटाला कर घूस दो घपला रफ़ा दफ़ा !

जीवन सफ़र

जन्म से शिशु तक सफ़र त़य्य किया ,
शिशु से बच्चपन तक सफ़र त़य्य किया !

जीवन का सफ़र जारी हर पल घड़ी ,
बच्चपन से पच्चपन तक सफ़र त़य्य किया !

चक्कर चलता रहता रुकता नहीं पल भर ,
शून्य से शिखर तक सफ़र त़य्य किया !

जोश जल्वा जुनून जज़्बात जवानी चली गई ,
बदह़ाल से ख़ुशहाल तक सफ़र त़य्य किया !

पच्चपन से पिचहत्तर तक सफ़र आसान रहा ,
क़दम रखे अस्सी तक सफ़र त़य्य किया !

सिंध से पलायन प्रवेश किया हिंद में ,
विदाई से जुदाई तक सफ़र त़य्य किया !

लिखा बिछोड़ा क़िस्मत में फ़रियाद कहां करें ,
छाछरो छोड़ अब तक सफ़र त़य्य किया !

जन्म भूमि भाडासिंधा पिया दूध छठ्ठी का ,
एक घूंट घुट्टी तक सफ़र त़य्य किया !

चौहटन में चमत्कार हुआ राजनीति रंग लाई ,
नोकरी से नेतागिरी तक सफ़र त़य्य किया !

प्रीत निभाई दूध पानी की भांति भरपूर ,
दिल से दिल तक सफ़र त़य्य किया !

दाग़ लगने नहीं दिया दामन पर ‘कागा’
उज्जवल अंदर बाहर तक सफ़र त़य्य किया !

इमदाद

कर मदद ग़रीब की स़वाब मिलता हैं ,
कर एक अ़दद की बेह़िस़ाब मिलता है !

चंद अदद दाना बीज बोते ज़मीन में ,
खेतों में खुशी़ अनाज लाजवाब मिलता है !

नेकी कर जहान में बाक़ी सब बेकार ,
भलाई का भाड़ा अ़जीबो ग़रीब मिलता है !

ख़ून के धब्बे धोते नहीं ख़ून से ,
नफ़रत का नतीजा निहायत ख़राब मिलता है !

नेक नियत स़ाफ़ रख दिलो जान से ,
ज़िंदगी का निचोड़ हिस़ाब किताब मिलता है !

उलफ़त ईमान अरमान रख कुलफ़त नहीं ‘कागा’
आख़रत में सख़ावत का बाब मिलता है !

इम्तहान

ह़ालात केसे भी गंभीर हो घबराना नहीं,
सवालात कैसे भी गंभीर हो घबराना नहीं !

ओक़ात का इम्तहान ज़माने का ज़िंदगी में ,
शरारत केसी भी नाज़ुक हो हड़बड़ाना नहीं !

इनाम एजाज़ मिलते सज़ा जुर्माना यदा-कदा ,
सौग़ात केसी भी मामूली हो गड़बड़ाना नहीं !

क़दम दर क़दम मिलते राहों में कांटे ,
ख़ुराफ़ात केसी भी ख़राब हो बड़बड़ाना नहीं !

जान-बूझ करते लोग परेशान लुच्चे लफंगे ,
मुश्किलात केसी भी भंयकर हो लड़खड़ाना नहीं !

बुरा वक़्त रफ़ू-चक्कर हो जाएगा ‘कागा’
इलज़ामात केसे भी संगीन हो गिड़गिड़ाना नहीं !

शरद ऋतु


शीत लहर का क़हर जारी थार थर्रा उठा ,
ठंड में ठिठुरन क़हर जारी थार थर्रा उठा !

पोष माघ के दोनों महिने दहला देते दिल ,
कांप जाता तन मन भारी थार थर्रा उठा !

रेतिले धोरे टीले बालू जमी रेत कोहरा छाया ,
धूजणी छूटी जो़र बर्फ़ बारी थार थर्रा उठा !

जाड़े का मुंद शीत काल धुंध का धमाल ,
ओस की बूंदें बरसी फूहारी थार थर्रा उठा !

चमन में चहक रही चिड़िया महक रहे फूल ,
बुलबुल त़ोता मीना तितली फुलवारी थार थर्रा उठा !

अन्नदाता ने जलाये अलाव सैंक रहे अपने हाथ ,
सूरज की पहली किरन प्यारी थार थर्रा उठा !

पशु पक्षी जीव जंतु चुप चाप कोयल ‘कागा’
घरों में कांपे नर नारी थार थर्रा उठा !

कौन

तेरे बिना मेरा जग में कौन ,
मेरे बिना तेरा जग में कौन !

हम दो आंखें बीच में नाक ,
सू़रत एक हमारा जग में कौन !

चोट लगती एक को रोते दोनों ,
बहती अश्रु धारा जग में कौन !

हम दो दृष्टि एक देखते समान ,
दो होते तारा जग में कौन !

दोनों एक फिर भी मिलन नहीं ,
देखें दृश्य सारा जग में कौन !

नदी चलती बहती जल अमृत धारा ,
होते दो किनारा जग में कौन !

जिया जलन पिया मिलन समुंदर से ,
जिसका जल खारा जग में कौन !

सिक्का एक दो पेहलू ऊपर नीचे ,
होता एक पिटारा जग में कौन !

चांद चकोर की चाहत अधूरी ‘कागा’
मन चित्त हारा जग में कौन !

प्रकृति

प्रकृति से प्रेम नहीं वो मानव नहीं दानव ,
प्रकृति से हेत नहीं वो मानव नहीं दानव !

प्रथ्वी के पटल पर विभिन्न प्रकार के प्राणी ,
प्रकृति से प्यार नहीं वो मानव नहीं दानव !

आंधी त़ूफ़ान वर्षा ओले ओस प्रकृति की देन ,
प्रकृति से लगाव नहीं वो मानव नहीं दानव !

अकाल चक्रवात सुनामी भूकंप कोहरा प्रकृति की उत्पति ,
प्रकृति से मेल नहीं वो मानव नहीं दानव !

पहाड़ पठार धोरा टीला नदी नाला समुंदर खारा ,
प्रकृति पर भरोसा नहीं वो मानव नहीं दानव !

जल थल अग्न गगन पवन पांच तत्व पुतला ,
प्रकृति पर आस्था नहीं वो मानव नहीं दानव !

कीड़ी मकोड़ी सांप छछुंदर शेर सियार जंगली जानवर ,
प्रकति पर विश्वास नहीं वो मानव नहीं दानव !

पैड़ पौधे फल फूल पत्ते झड़ते बनते बिगड़ते ,
प्रकृति पर यक़ीन नही वो मानव नहीं दानव !

प्रकृति से होती छेड़-खानी आधुनिक दौर में ,
प्रकृति से मोह़ब्त नहीं वो मानव नहीं दानव !

कुल्हाड़ी से काटते वन वृक्ष आरा साथ उठाये ,
प्रकृति का क़द्र नहीं वो मानव नहीं दानव !

पर्यावरण को प्रदूषित करते मटिया मेट दरिंदे ‘कागा’
प्रकृति का एह़सान नहीं वो मानव नहीं दानव !

शीत लहर

ठंड में ठिठुर रहे हाड कांप रहे ,
स़ुबह धुंध शीत लहर में कांप रहे !

जाड़े का मौसम ऊनी वस्त्र ओढ़ रखे ,
बिस्तर में दुबक रजाई कम्बल ओढ़ रखे !

दांतों की कट कट मुठ्ठियां भींच धीमी आवाज़ ,
सिसक रहे शांत स्वभाव हवा सरसर करती आवाज़ !

खाने को मन करता गर्मा-गर्म व्यंजन चाय ,
घर से बाहर निकलते नहीं बिना काफ़ी चाय !

पैड़ पौधे ढक गये बर्फ़ जम गई परत ,
बूढे बच्चे जवान परेशान बर्फ़ जम गई परत !

‘कागा’ कांपे माल मवेशी थर्र धूजणी होने लगी ,
ग़रीबों की झुग्गी झौंपड़ी में धूजणी होने लगी !

मां बाप की सेवा

मां बाप की सेवा कर तन मन से ,
मां बाप की चाकरी कर मधुर वचन से !

अड़सठ तीर्थ यात्रा मात पिता के चरणों में ,
पाठ पूजा आराधना अर्चना प्रार्थना आरती चरणों में !

आशीष आशीर्वाद चिरंजीवी भव दया दुआ दिल में ,
जन्नत मन्नत मनो-कामना का परिणाम दिल में !

मां बाप की ममता क्षमता शक्ति का भंडार ,
अटूट अनूठी अखंड अनोखी उज्जवल शक्ति का भंडार !

गंगा जमना सरस्वती संगम मात पिता की सेवा ,
ब्रह्मा विष्णु महेश कृपा मात पिता की सेवा !

‘कागा’ धन सम्पति विधा मां बाप से मिलते ,
जब अंतर्रात्मा के कंवल मन प्रसन्न से खिलते !

दिल में आप

मेरी दिल में आप बसते ओर नहीं कोई ,
मेरे दिमाग़ में आप बसते ओर नहीं कोई !

तेरा ह़सीन चेहरा चमके जैसे चांद की चांदनी ,
मेरे ज़हीन मे़ आप बसते ओर नहीं कोई !

काजल बन आंखों की शन बढ़ाई हुए फ़िदा ,
मेरे नैनों में आप बसते ओर नहीं कोई !

नदी चलती बहती अमृत धारा कल कल करती ,
मेरे जीवन में आप बसते ओर नहीं कोई !

जिस्म में बहती रक्त धारा हर पल घड़ी ,
मेरी नसों में आप बसते ओर नहीं कोई !

हलचल होती हर अंग में बे-रोक टोक ,
मेरी सांसों में आप बसते ओर नहीं कोई !

खोया होशो ह़वास जोश जल्वा जुनून जवानी ‘कागा’
मेरे ख़्यालों में आप बसते ओर नहीं कोई !

दुनियादारी


दुनिया में बसते लोभी लालची लोग ,
भोले भाले चुस्त दुरस्त आलसी लोग !

दुनिया सागर स़ेहरा बहता हुआ दरिया ,
माणक मोत अंदर ज़रूरत का ज़रिया !

ऊंचे पहाड़ पर्वत पठार दलदल रन ,
जल जंगल झाड़ी हरियाली छाई वन !

बाग़ बग़ीचे गुलिस्तां खेत खलियान ख़ूब ,
इंसान का अंदाज़ ख़ून ख़राबा ख़ूब !

प्यार नफ़रत का पैमाना नहीं त़य्य ,
मह़फ़िल सजती पीते प्याला भर मय्य !

एशो अ़शरत के आ़दी बड़े दीवाने ,
खाने पीने के शोक़ीन मोज मस्ताने !

चोर लुटेरे चापलूस चाटते पराये तलवे ,
चाटुकारी कर चुग़ल दिखाते अपने जल्वे !

ख़ुद का वजूद नहीं बेज़मीर बेशऊर ,
रोब रुतब्बा वाला करते बड़ा ग़ुरूर !

‘कागा’ कोई पीर फ़क़ीर फक्कड़ क़लंदर ,
होते ह़ाकम दरबान घुमकड़ अकड़ सिकंदर !

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा

पूर्व विधायक

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • मानव अधिकार

    मानव अधिकार स्वतंत्रता,समता अनेकों अधिकार मिला,मानव को न मानव अधिकार मिला,घर में मतभेद बच्चों -बूढो मेंरिश्ते नातों से बस घाव मिला,कौन लड़ें ,किससे कहें दिल कि बातेंअपनो से न अब वो भाव मिला,किस अधिकारों के लिए लड़ेंजब कहने, सुनने तक का न अधिकार मिला,घर से हो रही राजनीति देश तक जा मिला,हर परिवार को निगलने…

  • श्रीमद्भागवत कथा | Shrimad Bhagwat Katha

    श्रीमद्भागवत कथा ( Shrimad Bhagwat Katha )  ( 3 )  भागवत कथा आह्लाद, झाझड़ के उत्संग में *********** शेखावाटी अवस्थित झाझड ग्राम, सप्त दिवसीय भागवत कथा आयोजन। श्री मोहिनी सती माता मंदिर ट्रस्ट सौजन्य, सर्व सुख समृद्धि वैभव शांति प्रयोजन । मृदुल स्वर श्री कमल नयन जी महाराज, भक्त वत्सल प्रभा जनमानस तरंग में। भागवत…

  • Hindi Poetry On Life | मै इक सोनार हूँ

    मै इक सोनार हूँ ( Main Ek Sonar Hun )   मै इक सोनार हूँ जिसकी चाहत जग वैभव से भरा रहे। इस  जग  के  सारे  नर नारी स्वर्ण आभूषण से लदे रहे। ** मेरी शुभ इच्छा रही सदा हर इक घर में मंगल गीत बजे। या  तेरी  हो  या  मेरी  हो  माँ  बहन  बेटियाँ …

  • आओ हम दिवाली मनाएं

    आओ हम दिवाली मनाएं आओ हम-सब साथ मनाएं दीवाली त्यौंहार,तमस की उमस दूर करें जलाएं दीप अपार।जगमग कर दे घर ऑंगन हो समृद्धि बौछार,सुखमय हो सबका जीवन महकें द्वार-द्वार।। इसदिन ही संपूर्ण हुआ श्री राम का वनवास,सीता-राम और लखन पधारे अपने निवास।झिलमिल करते दीप-जलाएं पर्व बना ख़ास,तब से चली आ रही परंपरा कार्तिक-मास।। इस अमावश…

  • जीवन की कहानी

    जीवन की कहानी जीवन की कहानी अनकही है,हर मोड़ पे एक नयी रहनी है।आंसू और मुस्कान साथ चलते,सपने भी कभी टूटते, कभी पलते। हर दिन नया संघर्ष दिखाता,कभी हलचल, कभी सन्नाटा।हर रात खुद से सवाल करता,क्या खोया, क्या पाया, क्या अब करना। धूप-छांव में ही पलते हैं,राहों में कांटे बिछते हैं।मंज़िल दूर होती है कभी,पर…

  • कथा सम्राट | Katha Samrat

    ‘कथा सम्राट’ ( Katha samrat )   सरल व्यक्तित्व के धनी नाम था धनपत राय, लमही गांव में जन्मे प्रसिद्ध कथाओं के सम्राट, संघर्षो से भरे जीवन को लेखनी में ऐसा ढाला। कालजयी हो गई फिर उपन्यासों की हरेक धारा, रचनाओं में जन- जीवन को गहराई से था उतारा। समाज की अव्यवस्थाओं पर किया कड़ा…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *