कलाम है क्या

कलाम है क्या

ये गोल मोल मुहब्बत भरा कलाम है क्या
तमाम उम्र यहीं पर तेरा क़याम है क्या

कबूल कैसे मैं कर लूँ बता तेरी शर्तें
बिना ये जाने तुझे लेना मुझसे काम है क्या

जो बार बार मुझे हुक्म देता रहता है
समझ लिया मुझे तूने बता गुलाम है क्या

जो हर घड़ी चला आता है मुँह उठाये हुए
ये मेरा घर है या कोई सराय आम है क्या

अभी मैं उलझा हुआ हूँ ज़रा ठहर तो सही
समझ रहा हूँ तेरी आँखों का पयाम है क्या

ये अजनबी मुझे क्योंकर सलाम करने लगे
इन्हें पता है कि मेरा यहाँ मुक़ाम है क्या

जहाँ भी देखो वहाँ हो रही है मनमानी
अमीरे-शहर तुम्हारा यही निज़ाम है क्या

अदब नवाजी बुजुर्गों से सीख ले साग़र
बग़ैर सर को झुकाए भी यह सलाम है क्या

Vinay

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003

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