सकूँ
विभु एक 15 वर्षीय लड़का था, जो अपने परिवार के साथ एक छोटे से शहर में रहता था। वह एक अच्छा लड़का था, जो हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था।
एक दिन, विभु ने अपने पिता से कहा कि वह नदी के किनारे घूमने जाना चाहता है। उसके पिता ने उसे 100 रुपये दिए और कहा कि वह अपने लिए कुछ खाने के लिए भी ले सकता है।
विभु नदी के किनारे गया और वहां उसने एक बुजुर्ग नाविक कमल को देखा। कमल एक गरीब आदमी था, जो अपनी नाव से लोगों को नदी पार करवाता था। लेकिन उस दिन, कमल को कोई सवारी नहीं मिली थी और वह बहुत परेशान था।
विभु ने नाविक कमल से पूछा-
“अंकल जी, मुझे नदी के उस पार ले जाने के आप कितने रुपये लोगे?”
“मैं लोगों को नदी पार कराने के बीस रुपये लेता हूँ। तुम छोटे हो, तुम दस रुपये दे देना।” कमल बोला।
“इस समय तो मैं अकेला हूँ। क्या आप मुझे अकेले नदी पार करवा सकते हैं? एक बार में आप अपनी नाव में कितने लोग ले जाते हो?” विभु ने सवाल किया।
“मैं एक बार में 5 लोगों को नदी पार करवा देता हूँ। लेकिन आज सुबह से कोई व्यक्ति नदी पार करने नहीं आया। पता नहीं क्यों? लेकिन तुम परेशान न होना, मैं तुम्हें अकेले ही नदी पार ले जाऊंगा। शाम होने को हैं, इसलिए हमें जल्द ही निकलना होगा ताकि मैं तुम्हें छोड़कर वापिस समय से आ सकूँ।”
विभु ने कमल से पूछा- “वह इतने कम पैसे में अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे कर पाते है?”
कमल ने बताया- “उसका परिवार बहुत गरीब है और वह अपने बेटे की मृत्यु के बाद से ही अपने पोते की देखभाल कर रहा है। उससे सिर्फ नाव चलानी ही आती हैं। इतनी उम्र में वह और कोई काम भी नहीं कर सकता, इसलिए मजबूरी में उसे यह सब करना पड़ रहा है। बस दो वक्त की रोटी का किसी तरह ईश्वर की कृपा से जुगाड़ हो जाता है।”
” यह तो बड़े दुख की बात है। आपके साथ ईश्वर ने बहुत गलत किया।”
अफसोस जताकर विभु ने आगे पूछा-
“अंकल जी, अगर वापसी में आपको कोई सवारी न मिली तो… आपको अकेले ही लौटकर वापिस आना पड़ेगा।”
“क्या कर सकते हैं बेटा, मजबूरी है।”
“अंकल जी, आप परेशान मत होइए। मैं आपको 5 सवारी के ही रुपये दूँगा। आप जल्दी से मुझे नदी के उस पार पहुँचा दो। अगर आप कुछ देर मेरा इंतज़ार कर सकें तो मैं काम निबटाकर वापसी में आपके साथ चलना चाहूंगा।”
“ठीक है बेटा, तुम इत्मीनान से अपना काम करके आ जाना। मैं इंतज़ार कर लूंगा।” कमल बोला।
विभु को नाविक कमल ने नदी पार करवा दी। विभु ने इधर उधर घूमकर 30 मिनट टाइम पास किया और फिर से नाव में बैठकर नदी पार करके वापिस आ गया। वापिस आने पर उसने नाविक को सौ रुपए दिए और अपने घर वापिस चला गया।
घर पर विभु की मम्मी दीपा और पापा रवि, उसका इंतजार कर रहे थे और उसके लिए चिंतित थे। विभु कुछ देर के लिए नदी किनारे घूमकर आने की बात बोलकर घर से निकला था, लेकिन अब वह 3 घण्टे बाद घर वापिस आया था।
विभु के देरी से आने पर उन्होंने उस पर गुस्सा भी किया, नाराज़गी भी जताई। उसके बाद विभु से देरी से आने का कारण पूछा। विभु ने बताया कि नदी किनारे एक बुजुर्ग नाविक कमल को सुबह से ही नदी पार ले जाने के लिए कोई सवारी नहीं मिली।
बेचारा बहुत परेशान था। उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी। घर में खाने के लिए राशन तक नहीं था। नदी किनारे घूमते समय मैंने देखा कि कमल का दस वर्षीय पोता अशोक उसके पास रुपये मांगने आया था लेकिन बेचारा उसे कुछ नहीं दे सका। अशोक के पिताजी नहीं हैं।
वे गत वर्ष एक दुर्घटना में खत्म हो गए थे। बुजुर्ग कमल ही अब घर का खर्चा वहन कर रहा था। मैने कमल को पोते अशोक से कहते सुना- “बेटा, ईश्वर हमें देख रहे हैं, वे हमें भूखा मरने नहीं देंगे। शाम होने में अभी 2 घण्टे बाकी है। रात होने से पहले ही राशन का इंतज़ाम हो जायेगा, मुझे पूर्ण विश्वास है।
मैं राशन का सामान ले आऊंगा। फिर हम सब लोग मिलकर इत्मीनान से भोजन करेंगे।” कमल की आँखों में मैं उसकी बेबसी देख पा रहा था। मैं नदी पार जाना नहीं चाहता था लेकिन उसकी परेशानी देखकर खुद को रोक न सका।
मुझे आपने जो जेब खर्च हेतु 100 रुपये दिए थे, वे रुपये मैंने नदी पार जाने और आने की मजदूरी के तौर पर कमल को दे दिए ताकि उसका परिवार रात को भूखा न रहे। जब मैंने उसको रुपये दिए, तब उसकी आँखों में खुशी के आंसू थे। वे रुपये लेकर उसने ईश्वर का तहे दिल से आभार व्यक्त किया।
यह देखकर मुझे भी बेहद सकूँ मिला। नदी पार जाना और वापिस आना…क्या मेरा सही था? मैंने सही किया न पिताजी? मैं गलती पर तो नहीं हूँ?”
“नहीं बेटा, तुमने बहुत अच्छा किया। तुमने एक बेहतरीन काम किया है। सबसे बड़ा धर्म यही है कि इंसान, इंसान के काम आए। दूसरों की पीड़ा देखकर जब खुद का हृदय द्रवित हो जाये और मदद के लिए वह आगे आये… तब आदमी… आदमी से इंसान बनता है। मुझे तुम पर नाज़ है।
तेरे इस काम से लगता है कि मैंने तुझे अच्छे संस्कार दिए हैं। तेरी परवरिश में कोई कमी नहीं की है। निश्चित ही तुम भविष्य में देश के एक अच्छे नागरिक बनोगे, ऐसा मुझे लगता है।” यह कहकर रवि ने खुशी से विभु को गले लगा लिया।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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