डाॅ. ममता सिंह की रचनाएँ | Dr. Mamta Singh Poetry
भैया घर आई बहन
( दोहा ग़ज़ल )
भैया घर आई बहन, लेकर भाव अपार।
राखी बांधी प्यार से, करना तुम स्वीकार।।
बहना तुम सुसराल में, कहीं न जाना भूल,
बचपन की अठखेलियां, आपस की तकरार।।
रेशम का धागा बॅंधा, चमके तिलक ललाट।
निर्मल पावन है बहुत, राखी का त्योहार।।
भ्रात बहन के प्रेम की, अद्भुत बनी मिसाल।
रेशम के दो तार में, रिश्तों का संसार।।
बेटी को भी दीजिए, जग में पूरा मान।
इसके बिन सूना रहे, भाई का घर द्वार।।
सुख-दुख में भैया सदा, देना मेरा साथ।
वादा यह विश्वास का, है अनुपम उपहार।।
भैया तुम जुग-जुग जिओ,करती हूॅं अरदास।
दिन दूना बढ़ता रहे, आपस का यह प्यार।।
पर्यावरण ( सायली छंद )
उजड़ा
है मेरा
हरा -भरा संसार
मानव तेरे
कारण।
रोती
है प्रकृति
देख दुर्दशा अपनी
कौन पौंछे
आँसू।
समय
है अभी
संभल जा मानव
वरना पड़ेगा
पछताना।
जंगल
कट रहे
बेहाल हैं सब
पशु -पक्षी
अब।
आओ
करें श्रृंगार
धरा का पूरा
लगा कर
वृक्ष।
नशा न करना , नशा ज़हर है
नशा न करना , नशा ज़हर है
ले लेगा यह जान।
कदम-कदम पर इस दानव ने,
अपना जाल बिछाया।
भावी पीढ़ी को भी इसने,
देखो खूब फॅंसाया।
बचना इससे रखकर दूरी,
रहा नहीं आसान।
नशा न करना, नशा ज़हर है,
ले लेगा यह जान।
शुरू-शुरू में यह दुश्मन तो,
मन को बहुत लुभाता।
देकर फिर पीड़ा यह भारी,
जीवन नरक बनाता।
भीतर इसके छिपे हुए हैं,
कितने ही नुक़सान।
नशा न करना, नशा ज़हर है
ले लेगा यह जान।
घर-भर की खुशियां डस कर यह,
बदहाली है लाता।
तन-मन-धन, जीवन के गौरव,
नष्ट सभी कर जाता।
प्रीति लुटाता जो भी इस पर,
बन जाता शैतान।
नशा न करना, नशा ज़हर है
ले लेगा यह जान।
भटक गये जो पथ से अपने,
उनको वापिस लायें।
नशा-मुक्ति अभियान चला कर,
जीवन सुखी बनायें।
इससे युद्ध तभी जीतेगा,
मेरा हिन्दुस्तान।
नशा न करना, नशा ज़हर है ,
ले लेगा यह जान ।
वो तो मेरी जान हैं
मेरी धड़कन हैं वो तो मेरी जान हैं।
इस मुहब्बत के वो ही निगहबान हैं।।
खुशनुमा बन गए हैं नज़ारे सभी,
दौलत ए इश्क से हम भी धनवान हैं।
ज़िन्दगी अब न पहले के जैसी रही,
दिल में उठते यहां रोज़ तूफ़ान हैं।।
अक़्ल ओ होश सब कुछ गंवा बैठी हूॅं,
देख हालत मेरी लोग हैरान हैं।।
कुछ न कह कर भी ममता वो कह जाते सब,
इस अदा पर ही तो हम भी कुर्बान हैं।।
जलते हुऐ चराग़ बुझाते हो किसलिए
जलते हुऐ चराग़ बुझाते हो किसलिए।
तुम इस तरह से मुझको सताते हो किसलिए।।
करते नहीं हो फ़िक्र मेरी गर ज़रा भी तुम,
ये अश्क़ याद करके बहाते हो किसलिए।।
ये तो कहो कि दिल में तुम्हारे है क्या छिपा,
यूं नाम मेरा लिख के मिटाते हो किसलिए।।
वादा किया था साथ निभाने का हर क़दम,
अब अपना वादा तोड़ के जाते हो किसलिए।।
इज़हार कर लो इश्क़ का ममता से आज तुम,
ये दर्द और दिल का बढ़ाते हो किसलिए।।
होली का त्यौहार
चली हवा जब फागुनी, मोहक, मादक, मन्द।
गोरी भी लिखने लगी, प्यार भरे फिर छन्द।।
जब बासन्ती रंग से, धरा करे श्रृंगार।
भौंरें फिर करने लगे ,कलियों पर गुंजार ।।
मस्ती के त्यौहार पर, चढ़ जाये जब भंग।
लगें नाचने झूम के , तब होली के रंग।।
होली का त्यौहार ये, मन में भरे उमंग।
रोम रोम हर्षित करे, फागुन का ये संग।।
रंगों के इस पर्व पर, बाँटो जग में प्यार।
खुशियों से झोली भरे, होली का त्यौहार।।
नारी के अन्तस की पीड़ा ( गीत )
नारी के अन्तस की पीड़ा,
कौन समझ है पाया।।
सच है पढ़-लिख कर ही अब वो,
निर्णय खुद लेती है।
लेकिन अंदर-बाहर के फिर,
ताने भी सहती है।
दो पाटों के मध्य कहीं कुछ,
पिसी हुई है काया।
नारी के अन्तस की पीड़ा,
कौन समझ है पाया।।
रख पूजा-व्रत मांगे रब से,
सबकी जो खुशहाली।
लेकिन रह जाती उसकी ही,
क्यों फिर झोली खाली।
ठगी गई हर युग में पग-पग,
कैसी है यह माया।
नारी के अन्तस की पीड़ा,
कौन समझ है पाया।
कहो भले ही सबला इसको,
धीर बहुत धरती है।
मर्यादा की रक्षा के हित,
युद्ध नित्य करती है।
सम्मुख इसके फिर भी जग ने,
माया जाल बिछाया।
नारी के अन्तस की पीड़ा,
कौन समझ है पाया।
पुलवामा के शहीदों को नमन
वतन की आन पे तो जान भी क़ुर्बान है यारो।
क़फन गर हो तिरंगे का तो बढता मान है यारो।।
न आने देंगे इसकी शान पर हम आँच कोई भी,
वतन के नाम से ही तो मिली पहचान है यारो।।
रहे ऊँचा जगत में नाम मेरे देश का हर पल,
मिटा दूँ ज़िन्दगी इस पे यही अरमान है यारो।।
नहीं कर पायेगा दुश्मन हमारा बाल भी बाँका,
खुला उसको हमारा आज ये ऐलान है यारो।।
मिटा दे इसकी हस्ती को भला किसमें है दम ममता ,
वतन गीता वतन मेरे लिए कुरआन है यारो।।
कभी कभी ही सही
कभी कभी ही सही कुछ तो बात होती है।
यही वो दिन है कि ग़म से निजात होती है।।
गुज़र तो जाता है दिन याद के सहारे से,
बड़ी तवील अकेले में रात होती है।।
मुझे यूं देख तुम्हारा ये मुस्कुरा देना,
मिरे लिए तो वही क़ायनात होती है।।
हुई है आशिक़ी जब से तो सारी ग़ज़लों में,
बयां हर शेर में उस की सिफ़ात होती है।।
तुम्हारा शुक्रिया ममता करे भी तो कैसे,
तुम्हीं से आज भी रोशन हयात होती है।।

डाॅ. ममता सिंह
मुरादाबाद
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