अनबन

Kavita | अनबन

अनबन

( Anban )

 

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बदल गए हो तुम
बदल गए हैं हम
नए एक अंदाज से अब मिल रहे हैं हम।
ना रही वो कसक
ना रही वो ठसक
ना रहे अब बहक
औपचारिकता हुई मुस्कुराहट!
चहक हुई काफूर
बैठे अब तो हम दूर दूर!
जाने कब क्यूं कैसे चढ़ी यह सनक?
मिलें भी अब तो गर्मजोशी है गायब,
जाने कब कौन रोप गया मन में खलनायक?
मन ही मन मान चुके एक-दूजे को हम नालायक!
ना रही अब समझौते की कोई गुंजाइश,
हंसते-हंसते दबा रहे हम अपनी-अपनी ख्वाहिश?

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नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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