क्या खता थी नजर मिलाना था
क्या खता थी नजर मिलाना था

क्या खता थी नजर मिलाना था

( Kya Khata Thi Nazer Milana Tha )

 

 

क्या  ख़ता  थी  नजर मिलाना था,
लेके  खंजर  खड़ा  ज़माना  था।।

हादशा   हुआ   तो   हुआ   कैसे,
कुछ ही लोगों का आना जाना था‌।।

मैं ही खुशबू हूं उनके गुलशन की,
उनका  हरदम  यही  बहाना था।।

बहुत  सम्भाला  मगर  टूट गया,
वो  जो  रिश्ता बहुत पुराना था।‌।

जला  के  दीप  कौन चला गया,
आज  तूफान  भी  तो आना था।‌।

प्यार से देखा और कुछ न कहा,
शेष  ये  वार  कातिलाना  था।।

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कवि व शायर: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-नक्कूपुर, वि०खं०-छानबे, जनपद
मीरजापुर ( उत्तर प्रदेश )

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