हल्ला बोल

हल्ला बोल | Kavita

हल्ला बोल

( Halla Bol )

 

बोल मजूरे, हल्ला बोल !
खोल के रख दे सबकी पोल
सारी दुनिया हो रही डाँवाडोल
सोई जनता की आँखें खोल
बोल मजूरे, हल्ला बोल ।

पहले तोल, फिर कुछ बोल
दिमाग़ों के बंद दरवाज़ें खोल
अब ना होने देंगे कोई झोल
अंदर-बाहर के सच को टटोल ।
बोल मंजूरे ,हल्ला बोल !

 

शक्कर में आटा, दाल में काला
हर तरफ़ है मिलावट का बोलबाला
कालाबाज़ारी,मुनाफ़ाखोरी लगातार बढ़ रही
अंधे कानून ! ज़रा अपनी आँखें खोल ।
बोल मजूरे , हल्ला बोल !

मज़दूर-किसान दिन-रात काम करता
फिर भी मेहनत का पूरा दाम न मिलता
लाखों के मालिक बन बैठे पूंजीपति
जो चढ़े नहीं कभी किसी खेत की डोल ।
बोल मजूरे , हल्ला बोल !

चुनाव से पहले पाँवों में पड़ जाते,
वोट की ख़ातिर गधे को भी बाप बनाते ,
5 साल तक जीभर जनता को लुटना है
यही है देश के नेताओं का अंतिम गोल
बोल मजूरे ,हल्ला बोल !

जब से यह निजीकरण की स्कीम आई
दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही महंगाई
बढ़ी बेरोज़गारी,काम धंधे हुए ठप
बेईमानी-शोषण हो रहा आऊटआफ कंट्रोल
बोल मजूरे , हल्ला बोल !

भूख, बिमारी, मंहगाई से मर रही जनता
लाशों से नेताओं को कोई फ़र्क नहीं पड़ता
इन अव्यवस्थाओं ने खोल के रख दी
भ्रष्ट-निकम्मे जुमलेबाज़ों की पोल ।
बोल मजूरे, हल्ला बोल !

?

कवि : संदीप कटारिया

(करनाल ,हरियाणा)

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