आज बीमार दिल की दवा ही नहीं
आज बीमार दिल की दवा ही नहीं
आज बीमार दिल की दवा ही नहीं ।
क्या लबों पे किसी के दुआ ही नहीं ।।
बन गये आज हैं वहसी इंसान सब ।
क्या कहूँ आज उनमें खुदा ही नहीं ।।
खत लिखे प्रेम के लाख जिसके लिए ।
बाद उसमें सुना फिर वफ़ा ही नहीं ।।
बात मेरी सदा याद रखना यहाँ ।
एक रघुनाथ जिसमें खता ही नहीं ।।
आ गये चाय पर आज घर वो मेरे ।
बात दिल की कहें तो बुरा ही नहीं ।।
तोड़कर आज दिल वो गये मयकदे ।
कह रहे ज़ाम हमने छुआ ही नहीं ।।
ढूंढ लेंगे सितारे हमें एक दिन ।
वक्त होता सदा बेवफ़ा ही नहीं ।।
आज कैसे करे प्रेम दूजा प्रखर ।
दिल किसी के लिए ये बचा ही नहीं ।।

महेन्द्र सिंह प्रखर
( बाराबंकी )







