अनिंद्य सुंदरी | Anindh Sundari

“अनिंद्य सुंदरी”

( Anindh Sundari )

 

सदियों से
तुमसे दीप्त सूर्य
और प्रदीप्त होकर चांँद
भूधर पाकर
अपरिमित साहस
अवनि अनंत धैर्य
उर में धरती है
पग धरती हो तुम
उपवन में या मन में
पुष्पित हो जाती हैं
सुप्त कलियां
सज जाती हैं
मधुरम मंजरियांँ।

मुस्कुराने से तुम्हारे
फूट पड़ते हैं झरने
प्रकृति पहन लेती है
नव पल्लवों के गहने
ख्वाहिशों की
पंखुड़ियांँ झरने
लगती हैं तन
मन में झर -झर
मृदु हास सांँस में भर
गुंजन करने
लगते हैं भ्रमर।

विद्रुम अधर पर
मुकुंद की बांँसुरी बन
प्रेमराग गाती हो
कण-कण
लहर -लहर में
आल्हाद का संगीत
सजाती हो
इस गान से गात-गात में
स्फुंरण- पुलकन
ओ अपूर्व आनंद
आविर्भूत हो जाता है ।

तुम्हारी नेह दृष्टि से
इंद्रधनुषी हो जाते हैं
सारे आकाश
सुर्ख हो जाते हैं
तरु पलाश
सघन हो जाती हैं
पुष्प वल्लरियांँ
महक उठती हैं
मोहक मंजरियाँ
प्रकृति करने लगती है
जैसे महारास ।

तुम्हारे नूपुर नाद से
अखिल विश्व डोल जाता है
मनीषियों को भी यह
विलास -वैभव
भरमाता है
विश्वस्वामिनी ,चिरसुंदरी
यह तेरा विलास
कण-कण को
आता है रास
सभी पर वशीकरण
का मंत्र फूंँक
देकर अतींद्रिय सुख
अकस्मात इंद्रियातीत
हो जाती हो।

तुम्हारा ही विलक्षण रुप
यत्र- तत्र समाया
दिव्य आभा से परिपूरित
चारु ब्रह्मांँड
नव रूप में सजाया
हे ! स्वप्न देवी
अनिंद्य सुंदरी,महामाया।

 

@अनुपमा अनुश्री

( साहित्यकार, कवयित्री, रेडियो-टीवी एंकर, समाजसेवी )

भोपाल, मध्य प्रदेश

 aarambhanushree576@gmail.com

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One response to “अनिंद्य सुंदरी | Anindh Sundari”

  1. विजय महादेव गाडे Avatar
    विजय महादेव गाडे

    अभिव्यक्ति का परमोच्च उत्कर्ष
    बहुत बढ़िया

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