बचपन का प्यार

बचपन का प्यार

बचपन का प्यार


जब मैं 8 साल का था तब मुझे पहली बार प्यार हुआ।
उसने मुझको मैंने उसको देखा आँखों से इकरार हुआ।

बचपन में तब मैं कितना भोला कितना नादां था,
इसे प्यार कहते हैं यह भी नहीं समझता था।

मैं अपनी चॉकलेट उसको खाने को देता,
उसकी झूठी पेस्ट्री भी बड़े शौक से लेता।

उसकी पेंसिल टूट जाने पर अपनी पेंसिल देता,
उसकी कॉपी गुम जाने पर तो अपनी कॉपी देता।

उसके आगे के टूटे दाँत को देख मेरी हँसी निकल जाती थी,
उसकी मुस्कान में मेरी मुस्कान बन जाती थी।

उसका रोता देखकर मैं भी कितना रोता था ,
जब टीचर उसे डांटती उनसे मन में लड़ता था।

बचपन में तब मैं कितना भोला कितना नादां था,
इसे प्यार कहते हैं यह भी नहीं समझता था।

कवि : सुमित मानधना ‘गौरव’

सूरत ( गुजरात )

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