बिना तेरे 

Ghazal | बिना तेरे

बिना तेरे 

( Bina Tere )

 

बिना तेरे अब हमसे
और अकेले जिया नहीं जाता ।
तुम्हें भूल जाने का गुनाह भी तो
हमसे किया नहीं जाता ।

माना कि मेरे इश्क़े- इज़हार से
परेशाँ रहने लगे हो तुम;
पर अपनी पाक मोहब्बत को
गुनाह, हमसे कहा नहीं जाता ।

सीने में चुभन,आँखों में तड़प,
दिल में बेक़रारी रहती है;
इस हिज़्र का दर्द हमसे
अब और सहा नहीं जाता ।

हमें तेरी आँखों की झलकती
मय की हसरत है साक़ी;
यूँ मयख़ाने के जाम को
अब लब से छुआ नहीं जाता ।

दिल में हर वक्त
तेरे ही ख़्याल उठते रहते हैं;
अब तेरे सिवा इस दिल में
कोई और नहीं समाता ।

रंगी, चमकते, बनावटी चेहरे
बहुत देखे हमने, पर;
इनमें कोई तुझसा बेदाग़ अक्स
दूसरा नज़र नहीं आता ।

तेरी इक झलक पाने को
घंटों बेताब खड़े रहते हैं हम;
तुझे देखे बिना तो
तेरी गली से भी गुज़रा नहीं जाता ।

रोने का मन तो करता है,
पर आँसू वहीं सूख जाते -‘दीप;
आँखों में बसी तेरी तस्वीर को
अश्क़ से धोया नहीं जाता ।

बिना तेरे अब हमसे
और अकेले जिया नहीं जाता ।
तुम्हें भूल जाने का गुनाह भी तो
हमसे किया नहीं जाता ।

?

कवि : संदीप कटारिया

(करनाल ,हरियाणा)

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