Bojh Swabhiman ka

बोझ स्वाभिमान का | Bojh Swabhiman ka

बोझ स्वाभिमान का

( Bojh swabhiman ka )

 

भर लिए भंडार ज्ञान का
सर पर लादे बोझ स्वाभिमान का
दब गई बेचारी विनम्रता
संशय हर बात पर अपमान का

बढ़ गई अकड़ दंभ से
मिलने का मन बहुत कम से
आंकने लगे कीमत और की
बढ़ी औकात खुद की सबसे

अदब, लिहाज सब छोटे हुए
चलते सिक्के भी खोटे हुए
स्वयं की बोध में सब फीके हुए
रहता ख्याल अब स्व सम्मान का

छाई सर्वश्रेष्ठ की गलतफहमी
दिखती नहीं अब अपनी कमी
लगा मिलने सम्मान जब
कमतर सभी हो गए तब

नदिया छोटी , भर बह चली
उसके आगे व्यर्थ सब कह चली
थोड़े दिन में ही बदला मौसम
बेचारी अब खुद में ही सूख चली

मोहन तिवारी

( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

विकल्प | Vikalp

Similar Posts

  • कर्म से तू भागता क्यों | Kavita Karm

    कर्म से तू भागता क्यों ?   क्या बंधा है हाथ तेरे कर्म से तू भागता क्यों? पाव तेरे हैं सलामत फिर नहीं नग लांघता क्यों? नाकामियों ने है डराया वीर को कब तक कहां ? हार हिम्मत त्याग बल को भीख है तू मांगता क्यों ? मानता तू वक्त का सब खेल है बनना…

  • दर्द की रेखा | Dard ki Rekha

    दर्द की रेखा ( Dard ki rekha )   जुडा हो जिसका रिश्ता दर्द से वही समझ सकता है किसी का दर्द मिली हो वसीयत जिसे पुरखों की उसे संस्कार भी मिला होना चाहिए सभ्यता तो देन है शिक्षित ज्ञान की व्यवहार भी देखकर सीख जाते हैं संस्कार ही पहचान कराते हैं ज्ञान की कपड़े…

  • लाली उषा की | Lali Usha ki

    लाली उषा की ( Lali usha ki )   युगों की रची सांझ उषा की न पर कल्पना बिम्ब उनमें समाये बनाये हमने तो नयन दो मनुज के जहाँ कल्पना स्वप्न ने प्राण पाये। हंसी में खिली धूप में चांदनी भी दृगों में जले दीप मेघ छाये। मनुज की महाप्रणता तोड़कर तुम अजर खंड उसको…

  • और जीवन | Jeevan par kavita

    “और जीवन“ ( Aur jeevan )   ऐषणाओं के सघन घन और जीवन। आनुषांगिक भी न हो पाया अकिंचन और जीवन। शांत पानी इतने कंकड़। अंधड़ो की पकड़ में जड़, आत्मा ह्रासित हुई बस रह गया तन और जीवन।। ऐषणाओं.. कहते हैं सबकुछ यहां है, यहां है तो फिर कहां है इतनी हरियाली में बसते…

  • हाॅं हम है ये आदिवासी | Adivasi

    हाॅं हम है ये आदिवासी ( Han hum hai adivasi )    हाॅं हम है ये आदिवासी, खा लेते है रोटी ठंडी-बासी। रखतें हाथों में तीर-कमान लाठी, क्यों कि हम है इन वनों के ही वासी।। हाॅं हम है ये आदिवासी, बोड़ो भील कहते है सांसी। मर जाते, मार देते जो करें घाती, जंगल, ज़मीं…

  • गाय | Gaay par Kavita

    गाय ( Gaay )    जहां नंदिनी वहां माधव को भी आना पड़ता है। गोमाता की रक्षा खातिर चक्र उठाना पड़ता है। धेनु भक्त ग्वालों की पीर दर्द हर जाना पड़ता है। खुशियों से झोली सबकी भर जाना पड़ता है। बजे चैन की मधुर मुरलिया गीत गाना पड़ता है। मुस्कानो के मोती मनमोहन बरसाना पड़ता…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *