बोझिल सांसें
बोझिल सांसें

💦 बोझिल सांसें 💦

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रोज़ निकली दिल से ही आहें बहुत

आजकल बोझिल रहती सांसें बहुत

❣️

ढूंढ़ता ही मैं रहा राहें वफ़ा

बेवफ़ा मिलती रही राहें बहुत

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जख़्म कुछ ऐसे मिले अपनों से है

रोज़ अश्कों में भीगी आंखें बहुत

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प्यार की बातें नहीं वो करते है

अपने करते नफ़रत की बातें बहुत

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मैं भुलाना चाहता हूँ जीतना

रुलाती दिल को उतना यादें बहुत

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जान पे बन आयी है रब अब मेरी

हो गये घर में दुश्मन अपनें बहुत

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की हंसाने कोई भी आता नहीं

जिंदगी में रुलाने आयें बहुत

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क्या ख़ुशी आज़म मिलेगी जीस्त में

जीस्त में ग़म के भरे सायें बहुत

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शायर: आज़म नैय्यर

( सहारनपुर )

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