शहरों की हकीकत !
शहरों की हकीकत !

शहरों की हकीकत!
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जेठ की दुपहरी
प्रचंड गर्मी थी पड़ रही
लगी प्यास थी बड़ी
निकला ढ़ूंढ़ने सोता
पर यह शहरों में कहां होता?
भटका इधर उधर
व्याकुल होकर
दिखा न कहीं कोई
कुंआ , तालाब
धुल उड़ रही थी
हालत हो रहे थे खराब।
भागते लोगों से पूछा कई बार,
मिला न उतर,
छोड़ दिए थक-हार।
उनको तेजी थी
आगे जाने की जल्दी थी
सुनने /उत्तर देने की फुर्सत न थी।
निराश हो वहीं बैठ गया,
समझो प्यासे ही मर गया!
इतने में आगे आकर लगी एक कार
निकला उसमें से एक वृद्ध सवार,
पूछा बैठे क्यों हो बेकार?
बोला प्यास लगी है-
बहुत ढ़ूंढ़ा पर नहीं मिला कहीं पानी,
याद आ रही मुझे मेरी नानी।
कोई देने को भी नहीं तैयार,
प्यासे तड़प रहा हूं कब से यार?
पूछा गांव से आए हो?
‘हां’ में सिर हिलाया
बोला,
यहां पानी मुफ्त में नहीं मिलता!
बिकता है, बिकता….!!
सब खरीदकर पीते हैं,
तुम भी खरीदकर पी लो!
पैसे हैं?
‘ना’ में सिर हिलाया
पाॅकेट से निकाल कर दिए कुछ पैसे,
बोला ये लो !!
खरीद कर पी लो।
अच्छा होगा कि कोई काम धंधा ढ़ूंढ़ो-
कमाओ,
व्यर्थ न समय गंवाओ।
यहां मुफ्त में कुछ नहीं मिलता!
सब बिकता है, बिकता….
खरीद कर तुम भी खाओ पीयो!
या लौट जाओ शीघ्र गांव,
वहां इंसानियत अभी जिंदा है-
सुख चैन से जिंदगी बिताओ।

 

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नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

 

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