कविताएँ

  • सिया के राम | Poem Siya Ke Ram

    सिया के राम ( Siya Ke Ram )   सिया के राम जन्म लेकर, पतित का नाश करेगे अब। ताड़का खर दूषण के संग, नाराधम मारेगे वो अब।   धरा पर पाप बढा जब,नारायण राम रूप सज धज, मनोहर रूप भुजा कोदंड, धरा से पाप मिटेगा अब।   प्रकट भयो नवमी को श्रीराम,पूर्णिमा जन्म लिए…

  • चांद फिर निकला | Poem chand phir nikla

    चांद फिर निकला ( Chand phir nikla )   चांद फिर निकला है लेकर रवानी नई। मधुर इन गीतों ने कह दी कहानी नई।   बागों में बहारें आई कली कली मुस्कुराई। मन मेरा महका सा मस्त चली पुरवाई।   चांद सा मुखड़ा देखूं थाम लूं तेरी बाहों को। चैन आ जाए मुझको सजा दो…

  • तपती दोपहरी | Poem tapti dopahar

    तपती दोपहरी ( Tapti dopahar )   सन सन करती लूऐ चलती आसमां से अंगारे। चिलचिलाती दोपहरी में बेहाल हुए पंछी सारे।   आग उगलती सड़कें चौड़ी नभ से ज्वाला बरसे। बहे पसीना तन बदन से पानी को प्यासा तरसे।   आंधी तूफां नील गगन में चक्रवात चले भारी। गरम तवे सी जलती धरा फैले…

  • तेरी हर बात | Poem teri har baat

      तेरी हर बात ( Teri har baat )     कभी चैत्र- बैसाख की पवित्र गरिमा लिये कभी गर्म लू सी ज्येष्ठ- आषाढ़ की तपन लिये   कभी सावन-भादों सी छमाछम पावस की बूंदें लिये कभी त्योहारों सीआश्विन-कार्तिक के मीठे नमकीन लिये   कभी मार्गशीर्ष-पौष की कड़कड़ाती रातों की सर्दी लिये कभी माघ- फाल्गुन…

  • हमारी विरासत हमारी धरोहर | Poem hamari virasat

    हमारी विरासत हमारी धरोहर ( Hamari virasat hamari dharohar )     शौर्य पराक्रम ओज भरा दमकता हो भाल जहां। हम उस देश के वासी हैं बहती प्रेम रसधार यहां।   पुरखों की पावन संस्कृति रग रग में संस्कार भरा। दूरदर्शी सोच ऊंची विनयशीलता गुणों भरी धरा।   दुर्ग किले हमारी विरासत हमारी धरोहर प्यारी…

  • बाजार | Geet bazaar

    बाजार ( Bazaar )   नफरत का बाजार गर्म है स्वार्थ की चलती आंधी। निर्धन का रखवाला राम धनवानों की होती चांदी। बिक रहे बाजार में दूल्हे मोटर कार बंगलो वाले। मांगे उंचे ओहदे वालों की संस्कार जंगलों वाले। आओ आओ जोत जलाओ कलम का जो धर्म है। नफरत का बाजार गर्म है -2  …

  • भूले से चेहरे | Geet bhoole se chehre

    भूले से चेहरे  ( Bhoole se chehre )     भूले  से  चेहरे  कितने  ही, आँखों में घिर आए हैं ! अपना भी चेहरा है उनमें, या हम फिर भरमाए हैं !!   प्रातः कीआशा बन आये, हैं जग में कब से उजियारे लेकिन अबभी अन्धियारों से,भरे हुए घरके गलियारे मैं अपने आँगन में बैठा…

  • पत्थर दिल | Poem pathar dil

    पत्थर दिल ( Pathar dil )   पत्थर फेंक दो मेरे यार पत्थर दिल मत बनो। जोड़ो दिलों के तार बिना बात भी मत तनो।   मत बिछाओ राहों में कंटको के ढेर कभी। मुस्कुरा कर थोड़ा देखो खिलेंगे फूल तभी।   कमियों को नहीं तारीफों के पुल सजाओ। प्यार के मोती सुहाने प्रेम से…

  • डॉक्टर भीमराव अंबेडकर | Poem Dr. Bhimrao Ambedkar

    डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ( Dr. Bhimrao Ambedkar )   संविधान निर्माता नमन वंदन हे राष्ट्र रतन भारत पंचशील सिद्धांत अपनाया बौद्ध धर्म में हुये रत   समानता भाईचारा मानवतावाद के पथ प्रदर्शक छुआछूत मिटाने का प्रचार प्रसार किया भरसक   पत्रकार संपादक बने कलम के सजग सिपाही समता समाचार निकाला पक्षधर दीन ए इलाही  …

  • मंजिल | Poem manzil

    मंजिल ( Manzil )   मंजिल अपनी निश्चित है,और भाव भी मन मे सुदृढ़ है। रस्ता तय करना है केवल,जो मंजिल तक निर्मित है।   जो मिलता ना रस्ता तो फिर, खुद ही नया बनाएगे। कर्मरथि हम मार्ग बनाकर, खुद मंजिल तक जाएगे।   टेढी मेढी हो पगदण्डी या फिर कंटक राहों मे। हम पर्वत…