कविताएँ

  • धोखा | Dhokha kavita

    धोखा ( Dhokha )   दे गये धोखा मुझे वो, बीच राह में छोड़कर। प्रीत का रस्ता दिखा, चले गए मुंह मोड़कर।   महकती वादियां सारी, फूल भी सारे शर्माने लगे। उनकी बेरुखी को हमें, अक्सर यूं बतलाने लगे।   मन में उठती लहरें सारी, अब हो चली उदास सी। कल तक वो बातें मीठी,…

  • चांद में चांद | Chand Kavita

    चांद में चांद  ( Chand mein chand )   दोषारोपण चाँद को स्वयं बनी चकोर है अवसर की तलाश में ताकति चहुओर है   प्रियतम रिझाने को सजने-संवरने लगी आभा लखि आपनी हुई आत्मविभोर है।   पायजेब की घुघरू छनकाती छन-छन चूड़ियाँ कलाईयों की खनक बेजोर है।   बिंदिया ललाट की चमकती सितारों सी गुलाबी…

  • दहकता कश्मीर | Kashmir par kavita

    दहकता कश्मीर ( Dahakata kashmir )   कभी फूलों का गुलशन था,दहकता आग बन गया। कभी धरती का जन्नत था, जो अब विरान बन गया।   कभी वो साज फूलों का, लो अब श्मशान बन गया। जो बसता है मेरे दिल में, वो नश्ल ए खास बन गया।   वो घाटी देवदारों की, जहां केसर…

  • कलमकार मस्ताना | Kavita kalamkar mastana

    कलमकार मस्ताना ( Kalamkar mastana )   मैं देशप्रेम दीवाना हूं मैं कलमकार मस्ताना हूं रंगों की लेकर छटा गीतों का मधुर तराना हूं   केसरिया ले निकला माटी का तिलक किया मैंने देशप्रेम में झूम पड़ा मैं कागज कलम मेरे गहने   सद्भावौ की धारा में जब गीत सुहाने गाता हूं राष्ट्रधारा अलख जगाते…

  • परिकल्पना | Kavita parikalpana

    परिकल्पना ( Parikalpana )   बाइस  में  योगी आए हैं, चौबीस में मोदी आएगे। भारत फिर हो विश्व गुरू,हम ऐसा अलख जगाएगे।   सदियों की अभिलाषा हैं, हर मन में दीप जगाएगे, हूंक नही हुंकार लिए हम, भगवा ध्वज लहराएगे।   सुप्त हो रहे हिन्दू मन में, फिर से रिद्धम जगाएगे। जाति पंथ का भेद…

  • यहाँ वहाँ बिखरे पन्नों पर | Hunkar poetry

    यहाँ वहाँ बिखरे पन्नों पर ( Yahan wahan bikhre pannon per )   1. यहाँ वहाँ बिखरे पन्नों पर, नाम लिखा हैं मेरा। धुधंली सी यादों में शायद, नाम लिखा हैं तेरा। शब्द शब्द को जोड़ रहा हूँ, मन मंथन बाकी है, याद नही कि कौन था दिल पे,नाम लिख दिया तेरा।   2. उड़ा…

  • नारी है अभिमान | Nari par dohe

    नारी है अभिमान ( Naari hai abhimaan )   नारायण की शक्ति का, नारी है अभिमान ! नारी है साक्षात इस, प्रकृति का अभियान !!   नारी का तप ही करे , पंच तत्व आव्हान कर प्राणों की सर्जना, जीवन का संधान !!   प्रकृति का साकार है , नारी ही उपमान उसमें होते समादृत,…

  • नारी | Poem on nari

    नारी ( Nari )   घर सुघर होता है जिससे पल्लवित है प्रकृति सारी। जन्मदात्री  होकर  अबला ही कही जाती बेचारी।। सूर्य चांद  सितारे ग्रह  नक्षत्र  सब  जन्मे हुये हैं। थे  अदृश्य  जीव  सारे  नारी  से  तन में हुये है। ब्रह्मा  विष्णु  महेश  नारी  साधना  में रत रहे हैं। जगत की अम्बा है नारी आगम…

  • मैं औरत हूँ | Kavita main aurat hoon

    मैं औरत हूँ ( Main aurat hoon )   मैं औरत हूँ मैं नारी हूँ मैं न चाहूँ मंदिरों में ग्रंथों में मैं पूजी जाऊँ   मैं तो बस इतना चाहूँ दिलों में सबके मैं बस जाऊँ   माधुर्य, ममता की मूरत कहलाऊँ धरती समान ‘गर जननी हूँ तो उसकी तरह न मैं रौंधी जाऊँ…

  • ईश्वर की मर्जी | Kavita Ishwar Ki Marzi

    ईश्वर की मर्जी ( Ishwar Ki Marzi )     ईश्वर  की  मर्जी  के आगे, कहाँ  किसी  की चलती है। विधि मिटे ना भाग्य बदलता, होनी  तो होकर रहती हैं।   सीता हरण हुआ राघव का,वधू वियोग पहले से तय था, दश आनन को मारा जाना, राम के हाथों ही निश्चय था।   श्रवण मरे…